Thursday, November 6, 2014

यही सच है और मछलियाँ : एक  तुलनात्मक अध्ययन
 '' उसे लगा कि जैसे इस बीच विजी ने अपने को थोेड़ा -सा और दूर हटा लिया  है। दोनों के बीच की दुरी , अनकही बातों की दीवार बढाती जा रही है। ''  - 95
           कहानी के ये संवाद  वे बिंदु हैं जहाँ से कहानी के कई आयाम खुलते हैं।

'' वाशिंगटन में मैंने  एक नाटक देखा था ,  जो बहुत पसंद आया।  'छोटी मछली , बड़ी मछली' . जिसमे  बड़ी मछली छोटी मछलियों को निगलती रहती है। तब से कभी कभी सोचती हूँ कि  क्या छोटी मछली उलटकर वार  नहीं कर सकती ?'' -- ९५
नत्रजन विजी से पूछता है -- ''घर में सब ठीक है? पिता, भाई -बहन.?
वीजी ने इस पर्श्न पर चकित आँखें उठायी और कहा , '''"वे लोग मुझे चिट्ठी ही कहाँ लिखते हैं .'' -- ९५

'' अच्छा नटराजन , वह तुम्हें वह बहुत पसंद है ?बहुत अच्छी लगती है ?'' - ९५

यह स्थिति क्यों है।  क्यों वह मनीष  का इंतजार करना चाहती हैै? क्यों चाहती है कि नटराजन शादी न करे।  क्यों  नटरान मूकी और वीजी किसी के भी साथ सम्पूर्णतः अटैच  नहीं है। कुछ ऐसी  ही स्थिति वीजी की  भी  है।  क्यों?

ऐसा क्यों है कि अपने दोस्त की गर्ल फ्रेंड  के प्रति   आकर्षण  को लेकर नटराजन के मन में कोई नैतिक बोध नहीं  है? यह जानते हुए भी कि मनीष अच्छा लडका नहीं वह उससे दोस्ती नहीं तोडता क्यों? वह  वीजी को भी मनीष का सच क्यों नहीं बताता ? वीजी मनीष  का सच जानकर भी उससे अलग क्यों नही हो पाती ?  यह अवचेतन में निहित भोगवाद है या ह्रदय जगत का मूल्य विहिन हो जाना है अथवा प्रेम  है ? अवचेतन मन से काटकर इस कहानी को   नहीं पढा जा सकता , क्योंकि नटराजन और वीजी दोनों में कम्प्लेक्स हैै।  उनके इस काम्प्लेक्स में उनकी उलझन का  एक बडा रहस्य छिपा है।  मनीष  और मूकी में यह कम्प्लेक्स नहीं है। इसीलिए वे जटिल उलझन में नहीं हैं।  प्रमाण कि नटराजन सोचता है कि उसमें ऐसा है क्या कि वह मूकी को रिझा सके , बांध सके ?  मनीष  के प्रति सब सहज आकृष्ट  हैं ,। मनीष  इन दोनों लड़कियों को भोग चुका है। जरा सोचिये यह बात सोचकर ही  नटराजन  को कितनी फ़्रस्ट्रेशन होती होगी ? फ़्रस्ट्रेशन इसलिए कि  नटराजन  तेज है , प्रतिभावान है , मेहनती है , अछा और ईमानदार इंसान  है , सचा है , कमिटेड है , यानि मनुष्यता  की कमी नही फिर भी उपेक्षित है , इसके विपरीत मनीष  धोखेबाज़ है  , हर लड़की को केवल भोग की निगाह से देखता है  , किसी के प्रति कमिटेड नही है, गुणवान और कामयाब भी नही है , केवल सुन्दर है और इस एक क्वालिटी पर  सारी  मनुष्यता कुर्वान ?   विजय लक्ष्मी मनीष के  लिए पागल है , घर और  अपनों को छोड़कर उसके पीछे भागी आई , मुकी भी मनीष के ही  पीछे- पीछे घूमती रही। इसमें   में नटराजन  को क्या मिला? मनीष का फेका जूठा ! अगर नटराजन  जैसे लड़के इन्हे अपनाने से इंकार कर दें तो इधर ये गहरे अकेलेपन की शिकार होंगे   और उधर वे  गहरी  अकेलेपन की  शिकार होंगी  ! सवाल मूल्यों के  विगलन का है। बाजार और पूंजी के खेल ने दुनिया को भोगवादी बना दिया है। जीवन के केंद्र में मूल्यों  की  जगह भोग स्थापित हो गया है।  फलस्वरूप शरीर , रूप और पैसा जीवन के केंद्र  में आ गये हैं  और बाकी  हर चीज गहरे तौर पर उपेक्षित हो गयी है। पूरी दुनिया भोग वनाम मूल्य के संघर्ष से गुजर रही  है।  चुकि  शक्ति पूंजी केंद्रित है और पूंजी भोग के दर्शन को बढ़ावा देती है फलस्वरुप  जीवन की ये सारी  विसंगतियां मनुष्य की अनेकशः कुंठाओं और उपेक्षाओं  से भर रही है। सवाल यह  नही कि  जिनके पास रूप और पैसा है वे सबकुछ हासिल कर लेंगे , और जिस इस खाने में फिट नहीं बैठते उन्हें कुछ नहीं मिलेगा बल्कि एक वक्त के बाद विजी और मुकी जैसी हर लड़की  उपेक्षा की शिकार होगी क्योंकि  रूप और भोग की दुनिया ही ऐसी है कि जहाँ  कोई लॉन्ग लाइव नही होता। यहाँ जो ज्यादा चमकता है उसीकी मार्केट  होती है , चमक फीकी पड़ी ,बाजार से आउट। ऐसा इसलिए की इस बाजार में मूल्य नही चमक देखी  जाती है। यह स्त्री मुक्ति का ऐसा प्रलोभन है  जहाँ  सबसे अधिक दर्द  स्त्रियों को ही मिलता है ,सबसे अधिक वही  उपेक्षित होती  हैं , बाजार से आउट डेटेड होती हैं।
नटराजन को यह सवाल बहुत परेशान करते हैं , शायद नटराजन  जैसे हर पुरुष को करेंगे -- ''और ऐसी साधना मनीष के लिए ! मनीष , जिसने की एक दिन बहुत ठंढे , अनासक्त भाव से कह दिया था : विजी के   लिए मेरे मन में अब कुछ नहीं बचा।  सीधी , सरल , अनकम्प्लीकेटेड  लड़की है। मुझे बांध सके , संतुष्टि दे सके ऐसी मानसिक गहराइयाँ नहीं हैं उसमे।मुझे पत्नी चाहिए तो मुकी जैसी  कलात्मक , स्फूर्तिदायक , इंटलैक्टुअल। ' फिर उसे मुकी भी  बांध न सकी। '' - ९७
सवाल है कि  स्त्रियों को  मनीष जैसे लोग अधिक क्यों पसंद हैं ? उनकी आँखों में मनीष के लेकर ही  क्यों दर्द है? ? उनका अंतर्जगत   मनीष  के दर्द को क्यों संजोये है (मुकी) . समाज मनीष के रास्ते पर क्यों चल पड़ा है? मनीष का मार्ग ही एक मात्र सत्य क्यों बनता जा रहा है आज के समय में ?नटराजन  के रास्ते के लिए कितनी  जगह बची है आज की दुनिया में ?
विजी नटराजन से कहती है --'' न जाने क्यों तुम्हें सम्मुख पाकर मैं बिखरने लगती हूँ --  जो कुछ  तहों में छिपा छिपाकर रखती हूँ , तुम्हारे आगे चीख-चीख कर कहना चाहती हूँ। -  - ९७
मुकी नटराजन और बीजी की तरह पूरी दुनिया ही साथ रहते हुए भी गहरे अकेलेपन से भर गयी है। इसके पीछे का कारण  क्या है?  बीजी और नटराजन  बेस्ट फ्रेंड हैं , हर बात  शेयर करते हैं , मुकी उसकी पत्नी बनने जा रही है,  , फिर भी सब  अकेलापन क्यों फील कर रहें हैं ? इसकी गहराई   में गए बिना आप भारतीयों समाज की इन विकट  समस्याओं को समझ नहीं सकते।

Thursday, June 19, 2014

मोदी महाभिनिष्क्रमण

जशोदा बेन SAID ----

                  राजनीतिक महाभिनिष्क्रमण पर जाते
                  प्रिय हमसे पूछकर न सही
                  कहकर तो जाते।
क्या मुझको अपनी पथ-बाधा  ही पाते ?
                 संघ के महाबोधि के निचे ,
                 अपने पाया कुर्सी का मार्ग,
                 आप मेरे लिए पलभर भी नहीं पछताते ,
                 प्रिय ! एकबार कहकर तो जाते।
वर्षों रहे सन्यास जीवन में ,
राजनीतिक सत्य तलासते।
गोधरा ने दिया वह मार्ग
                जनसंहार के लिए तनिक न पछताते
                 प्रिय ! एकबार कहकर तो जाते।
हिंदुत्व  और साम्प्रदायिकता
का मिला सत्य महान
आपने दिया राष्ट्र को
नव हिंदुत्वा का नया मार्ग
                  गर्व से आपकी पीठ राजनाथ थपथपाते
                  प्रिय ! एकबार कहकर तो जाते।
आडवाणी की कुर्सी छीनी ,
अडानी को गले लगाया
देश की महिलाओं को सुरक्षा देते
बस भूल गए हमारा मार्ग
                एकबार इधर भी तो आते
                प्रिय ! एकबार कहकर तो जाते।
मैं आपकी  सफलता के लिए करती उपवास
करती कठोर कई व्रत
तीर्थ करती निभाती रही पतिव्रत
              क्या आपकी  आँखों में कभी आंसू नहीं आते
              प्रिय ! एकबार कहकर तो जाते।
मोदी---
राजनीतिक महाभिनिष्क्रमण पर जाते
गोपा , हम तुम्हे कैसे ले जाते ?
जशोधरा ----
                 राहुल तू निर्णय कर इसका
                 न्याय पक्ष लेता है किसका
               माँ मेरी क्या बानी
               मैं तो बस देख रहा कहानी


नेताजी तुम्हरे घर पैसा कहाँ से आया ?

नेताजी तुम्हरे घर पैसा कहाँ से आया ?
देशभर में बेकारी ने है मुँह फैलाया ,
                 नेताजी तुम्हरे घर .............
गरीबों के बच्चे हैं भूखे ,
प्रसूतियों के होठ हैं सूखे ,
अपने भविष्य से नवयुवक हैं हताश ,
महंगाई ने है अपना रंग दिखलाया ,
नेताजी तुम्हरे घर सोना-चांदी कहाँ से आया ?
                     नेताजी तुम्हरे घर .............

लुटती इज्जत से युवतियाँ हैं हताश ,
अपनी सुरक्षा से खुद पुलिस भी है निराश ,
हर जगह असुरक्षा ने है मुँह फैलाया ,
नेताजी तुम्हरे लिए जेड (z) प्लस कहाँ से आया ?
                    नेताजी तुम्हरे घर .............

युवकों को मिलता नहीं रोजगार ,
सब लूट लेता है बाजार ,
बाजार की माया ने है जाल फैलाया ,
नेताजी तुम्हरी  मुट्ठी में  बाजार कहाँ से आया ?
                   नेताजी तुम्हरे घर .............

क्यों सब (जनता ) तुम्हरे जैसा नहीं ,
बस-भाड़े के पैसे नहीं पब्लिक को,
यह राज समझ नहीं आया कि
तुम्हरे निकम्मे लाडले के पास
मर्सिडीज कहाँ से आया ?
नेताजी तुम्हरे घर इतना माल कहाँ से आया ?
                नेताजी तुम्हरे घर .............

गाँव में हमारे एक जिगरी दोस्त हैं -- सुशील शास्त्री। उन्होंने बच्चन जी की कविता पढ़कर अपनी कविता बना डाली है।  खुश होकर उन्होंने फोन पर मुझे सुनाया, सोचा आपसब से शेयर करूँ।

इस पार प्रिय तुम हो
इस पार प्रिय तुम हो , मोबाईल है ,
उस पार न जाने क्या होगा !
तुम भेजकर मैसेज मेरा मन बहला देती हो ,
तुम्हारे बिना जीवन का हश्र न जाने क्या होगा!
तेरे मैसेज से दिल की धड़कन बढ़ जाती है
सोचो  तेरे कॉल से क्या होगा !
अभी तो इतनी ख़ुशी है , चहक है ,
फिर न जाने क्या होगा !
आँखें देख जहाँ तक पाती हैं,
तुम ही तुम नज़र आती हो ,
तुम लहराकर अपना नीला दुपट्टा
मेरा मन -सागर लहरा देती हो ,
इस पार प्रिय ....

तुम्हारी तस्वीर
आंसुओं  से खाली हो जाती हैं जब आँखें
उनमें भरने की कोशिश करता हूँ
तुम्हारी तस्वीर।
दिल में जगह नहीं हैं
वहाँ ठूस - ठूस कर भरी हैं
तुमसे जुड़ीं तमाम भावनाएँ।  

Thursday, June 5, 2014

दंगे और उनके कारण ( riots and their causes/ data of riots )

   दंगे और उनके कारण

सन ------------  सितम्बर 1924
 स्थान ------------ पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त
मृतकों की संख्या --------------155
कारण ------------- यह एक हिन्दू-विरोधी उपद्रव था , कारणों का मुझे ठीक ठीक पता नहीं।

 सन ------------  1926 अप्रैल से जुलाई के बीच 3 दंगे हुए।
 स्थान ------------ कोलकाता
मृतकों की संख्या --------------138
कारण -------------

सन ------------  1924
 स्थान ------------ ढाका , पटना , रावलपिंडी , दिल्ली 
मृतकों की संख्या --------------
कारण -------------

सन ------------ 1923 -1927  ( 91 दंगे )
 स्थान ------------  संयुक्त प्रान्त ( यह उस समय सर्वाधिक दंगा प्रभावित इलाका था )
मृतकों की संख्या-------
कारण ------------- हिन्दू कहते थे कि गो-हत्या बंद हो और मुस्लिम कहते थे कि मस्ज़िदों के सामने बाजे न बजाएं जाएं। कितना नॉनसेंस झगड़ा था।  क्या कोई पढ़ा-लिखा समाज इन नॉनसेंस बातों के लिए सैकड़ों की जानें ले सकता है ?

सन ------------  
 स्थान ------------ 
मृतकों की संख्या-------
कारण -------------

सन ------------  
 स्थान ------------ 
मृतकों की संख्या-------
कारण -------------

संस्कृति और सौंदर्य -- डॉ० नामवर सिंह ( culture and aesthetics )

संस्कृति और सौंदर्य -- डॉ० नामवर सिंह 

'दूसरी परम्परा की खोज' नामवर जी की प्रसिद्द पुस्तक है। इस पुस्तक में नामवर जी द्विवेदी जी को दूसरी परम्परा का जनक मानते हुए उनके समस्त सैद्धांतिक और व्यवहारिक आलोचना का सारगर्भित विवेचन प्रस्तुत करते हैं।  इसी क्रम में उन्होंने 'संस्कृति और सौंदर्य' नामक निबंध में  द्विवेदी जी के संस्कृति एवं सौंदर्य सम्बन्धी दृष्टिकोण की व्यापकता और प्रासंगिकता का उद्घाटन किया है। इस लेख में डॉ० नामवर सिंह ने दो बातों -- संस्कृति और सौंदर्य पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया है ।सन्दर्भ उन्होंने द्विवेदी जी का ही दिया है , मगर उसी बहाने इन विषयों पर डॉ सिंह ने अपना  विचार  भी रखा है जो इन  विषयों को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं। यह अनायास नहीं है कि प्रत्येक प्रगतिशील विचारकों के लिए संस्कृति और सौंदर्य का प्रश्न प्रमुख रूप से विचारणीय रहा है , क्योंकि इनपर संस्कृति-विरोधी होने के साथ साथ सौंदर्य विरोधी होने का भी आरोप लगता रहा है। असल में ये न तो कभी संस्कृति विरोधी रहे और न ही सौंदर्य विरोधी। बल्कि ये इन दोनों में जो अभिजात्यपन का अतिरेक था या यूँ कहें कि संस्कृति और सौंदर्य को अभिजात्य का हिस्सा मान लिया गया था , उससे इनका विरोध था। इनकी विवेचनाओं से संस्कृति और सौंदर्य का असली रूप सामने आया और पारम्परिक गलत व्याख्याओं और धारणाओं से मुक्ति मिली।
              संस्कृति को लेकर समय समय पर तरह- तरह से विचार -विमर्श होता रहा है। कुछ राजनीति प्रेरित तो कुछ स्वार्थ प्रेरित।  इस विमर्श में द्विवेदी जी ने संस्कृति के जिन बुनियादी गुणों की ओर इशारा किया था , उसपर पर्दा डालकर सभी विश्लेषक खुद को संस्कृति के  नए विमर्शकार के रूप में स्थापित करने लगे।एक राजनीति से प्रेरित होकर दिनकरजी ने ''संस्कृति के चार अध्याय'' की रचना की और मिश्र संस्कृति के स्वरुप को स्थापित किया तो दूसरी राजनीति के तहत अज्ञेय ने संस्कार-धर्मी संग्राहक संस्कृति की वकालत की। नामवरजी लिखते हैं -- '' यदि दिनकर की ' मिश्र संस्कृति ' की एक राजनीती है तो अज्ञेय की संस्कार-धर्मी संग्राहक संस्कृति भी किसी और राजनीति के अनुषंग से बच नहीं जाती।  '' ( 105 )नामवर जी का इशारा साफ समझा जा सकता है।
द्विवेदी जी ने भारतीय संस्कृति का सच उजागर करते हुए कहा था कि वह गन्धर्व , यक्ष , किन्नर आदि आर्येतर जातियों के विश्वासों और सौंदर्य कल्पनाओं का सबसे अधिक ऋणी है।  (103 ) उनकी यह स्थापना किसी खास मकसद की उपज नहीं थी और न ही किसी तरह की राजनीति से प्रेरित।  वह तो उनके अतीतकालीन  साहित्य के अध्ययन और चिंतन की स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी। असल में संस्कृति को लेकर दक्षिणपंथी सोच हमेसा विशुद्धतावाद पर जोर देती  रही  है। इस विशुद्धता पर न केवल वह गर्व करती  रही  है बल्कि इस आर्य संस्कृति को वह सर्वश्रेष्ठ भी मानती  रही  है और इसके लिए वह तरह -तरह का तर्क भी गढ़ती  रही  है। इसका विरोध करते हुए द्विवेदी जी लिखते हैं -- '' देश और जाति की विशुद्ध संस्कृति केवल बात की बात है।  सबकुछ में मिलावट है , सबकुछ अविशुद्ध है। '' द्विवेदी जी यह भलीभांति समझते थे कि भारतीय संस्कृति का स्वरुप आर्येतर जातियों की देंन को स्वीकार किये बिना निर्मित नहीं होता। मगर आर्य संस्कृति के विशुद्धतावादी पक्षधर इसे कत्तई स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। द्विवेदी जी ने इसी सोच पर हमला किया था। नामवर जी ने ठीक लिखा है --'' और सच कहा जय तो आर्य संस्कृति की शुद्धता के अहंकार पर चोट करने के लिए ही ' अशोक के फूल ' लिखा गया है , प्रकृति-वर्णन के लिए नहीं। यह निबंध द्विवेदी जी के शुद्ध पुष्प -प्रेम का प्रमाण नहीं , बल्कि संस्कृति-दृष्टि का अनूठा दस्तावेज है। '' (१०४)

                       दिनकर जी के संस्कृति-चिंतन ( संस्कृति के चार अध्याय ) को अज्ञेय जी ने 'मिश्र संस्कृति ' का आग्रह करार देते हुए उसे राजनीति प्रेरित बताया था। अज्ञेय जी का स्पष्ट मानना था कि '' संस्कृतियाँ प्रभाव ग्रहण करती हैं , अपने अनुभव को समृद्धतर बनाती हैं , लेकिन यह प्रक्रिया मिश्रण की नहीं है। '' (104 ) अज्ञेय जी संस्कृति की संग्राहकता पर जोर देते हैं और उसके मूल रूप को शुद्ध मानते हैं। द्विवेदी जी का मत इन दोनों से भिन्न है। द्विवेदी जी संस्कृति के दोनों पक्षों -- 'संग्राहकता और त्याग' दोनों पर जोर देते हैं --- '' हमारे सामने समाज का आज जो रूप है वह न जाने कितने ग्रहण और त्याग का रूप है। '' (105 ) द्विवेदी जी के चिंतन को आगे बढ़ाते हुए नामवर जी समकालीन सन्दर्भों में संस्कृति के प्रति आसक्ति या मोह को जड़ता बताते हैं।  वे इस सन्दर्भ में द्विवेदी जी को कोट करके दरअसल संस्कृति के विषय में अपने प्रगतिशील पक्ष को ही वाणी देते हैं -- '' आज हमारे भीतर जो मोह है , संस्कृति और कला के नाम पर जो आसक्ति है , धर्माचार और सत्यनिष्ठा के नाम पर जो जड़िमा है ( द्विवेदीजी) 'उसे किस प्रकार ध्वस्त किया जाय (नामवरजी)?'' द्विवेदी जी ने संस्कृति के प्रति जिस 'मोह और जड़ता' को बाधक तत्वों के रूप में विश्लेषित किया था , उन बाधक तत्वों को ध्वस्त करने की चिंता दरअसल समय की प्रगतिशील चिंता थी जो तब और प्रांसगिक हो उठी थी जब दो ध्रुवीय राजनीति से प्रेरित मिश्र और शुद्ध संस्कृति  की टकराहट आकार ग्रहण करने लगी थी। राजनीति की एक धारा से प्रेरित होकर दिनकर जी ने मिश्र संस्कृति का आग्रह प्रस्तुत किया तो दूसरी धारा से प्रेरित होकर अज्ञेय जी ने उसकी संग्राहकता पर जोर देते हुए कहीं न कहीं उसकी शुद्धता की वकालत की। शुद्धतावादी खेमे वालों का स्पष्ट मानना था कि '' अतर्क्य भावों , अनुभूतियों और आध्यात्मिक उपलब्धियों के स्तर पर संस्कृतियों का वास्तविक मिलन अत्यंत कठिन होता है। ''( डॉ. गोविंदचंद्र पांडे , 106 ) उनलोगों का मानना था कि संस्कृति की   तथाकथित सामासिकता वास्तव में सभ्यता के क्षेत्र में ही लागू होती है। (106 ) संस्कृति के प्रति इस तरह के जड़ आग्रह से कोई भी प्रगतिशील खेमे का चिंतक सहमत नहीं हो सकता।नामवर जी ने मिश्र संस्कृति और विशुद्ध संस्कृति की राजनीति पर प्रहार करते हुए लिखा -- '' यदि दिनकर की सामासिक संस्कृति का सम्बन्ध राजनीति के एक पक्ष से है तो स्वयं अज्ञेय और गोविनचन्द्र पांडे की 'शुद्ध संस्कृति' का सम्बन्ध भी राजनीति के दूसरे पक्ष से जोड़ा जा सकता है। '' (106 )
         कुल मिलाकर नामवर जी द्वारा इस निबंध के माध्यम से द्विवेदी जी के संस्कृति चिंतन को उजागर करने का मूल उद्देश्य यही था कि तथाकथित खुद को आधुनिक और प्रगतिशील समझने वाले  संस्कृति को लेकर कितने जड़ हैं जबकि संस्कार एवं विचार  से पूर्णतः धार्मिक और सवभाव से आचार्य और कुछ हद तक दक्षिणपंथी समझे जाने वाले द्विवेदी जी का संस्कृति- चिंतन कितना प्रगतिशील एवं उदार है ।द्विवेदी जी के अनुसार 'शुद्ध संस्कृति' का आग्रह एक प्रकार का मोह है जो बाधा उपस्थित करता है।  यह संस्कृति के क्षेत्र में वर्जनशीलता को जन्म देता है।  पुराने के प्रति संस्कारवश मोह होता है , परन्तु यह भी सच है कि प्राचीन काल की बहुत सारी उपयोगी एवं संगत मान्यताएँ समय के प्रवाह में अनुपयोगी एवं अप्रासंगिक हो जाती हैं।  अतीत के प्रति यह श्रद्धाभाव अन्य देश और अन्य जाति के साहित्य और संस्कृति को समझने में बाधक बनते हैं।  द्विवेदी जी को मोहासक्त संस्कृति-भक्तों से बार - बार टकराना पड़  रहा था  ( कभी तुलसी और सूर  को भी टकराना पड़ा था ) और उसी चिंतन - परम्परा को आगे बढ़ाते हुए डॉ. नामवर सिंह भी इस मोहासक्ति पर प्रहार कर रहे हैं और इस विश्लेषण में द्विवेदी जी की हिन्दू आचार्य वाली छवि की जगह एक प्रगतिशील विचारक वाली छवि भी बनती चलती है और इसके ठीक विपरीत अस्तित्ववादी , नास्तिक आस्थावाले समय के प्रवाह में कैसे दक्षिणपंथ की ओर झुकते गए , इस ओर भी संकेत होता चलता है।

         द्विवेदी जी का संस्कृति संघर्ष पंडितों की इकहरी परम्परा की संकीर्णता के विरुद्ध भारतीय संस्कृति की विविधता , जटिलता , परस्पर विरोधी जीवंतता और समृद्धि के पुनःसृजन के स्वरुप को उद्घाटित करने का संघर्ष है। द्विवेदी जी के पहले प्रसाद को भी ऐसे ही संघर्ष से गुजरना पड़ा था -- '' सुरुचि- सम्बन्धी विचित्रताओं को बिना देखे ही अत्यांत शीघ्रता में आजकल अमुक वस्तु अभारतीय है अथवा भारतीय संस्कृति की सुरुचि के विरुद्ध है , कह देने की परिपाटी चल पड़ी है।  ..... ये सब भावनाएँ साधारणतः हमारे विचारों की संकीर्णता से और प्रधानतः अपनी स्वरुप - विस्मृति से उत्पन्न हैं। '' (१०८)
               
सौंदर्य को, प्रगतिशील चिंतन के आरम्भ के  पहले तक केवल अभिजात्य का ही हिस्सा समझा जाता रहा।  पहली बार प्रेमचंद ने सौंदर्य के अभिजात्य परिभाषा और चिंतन को चुनौती देते हुए लिखा कि सौंदर्य केवल महलों में ही नहीं बल्कि मेड़ पर बैठी , बच्चे को दूध पिलाती उस पिचकी गाल वाली औरत में भी हो सकती है। जब सर्वेश्वर ने कहा कि '' भूख से लड़ने जब कोई खड़ा हो जाता है / सुन्दर दिखने लगता है'' , तब उनका इशारा इसी प्रगतिशील सौंदर्य चेतना की ओर था।  परम्परावादी कहे जाने वाले द्विवेदी जी की सोच भी इस प्रगतिशील चेतना की पूर्ववर्ती कड़ी थी , जिसको व्याख्यायित करने का प्रयास यहाँ डॉ नामवर जी ने किया है।

                   सौंदर्य को परिभाषित करते हुए द्विवेदी जी कहते हैं -- '' जो सम्पति परिश्रम से नहीं अर्जित की जाती , और जिसके संरक्षण के लिए मनुष्य का रक्त पसीने में नहीं बदलता , वह केवल कुत्सित रूचि को प्रश्रय देती है।  सात्विक सौंदर्य वहां है , जहाँ चोटी का पसीना एड़ी तक आता है और नित्य समस्त विकारों को धोता रहता है। ''(112 -113 ) द्विवेदी जी की इस सौंदर्य-परम्परा को डॉ नामवर सिंह निराला के सौंदर्य-बोध --'' श्याम तन भर बंधा यौवन '' से जोड़ते हैं और प्रगतिशील सौंदर्य चेतना का आधुनिक क्रम निर्धारित करते हैं। द्विवेदी जी की इस सौंदर्य-चेतना का स्रोत लोक संस्कार था। किन्तु इस लोक में सौंदर्य-चेतना सुसुप्त अवस्था में पड़ी है क्योंकि जिस सामान्य जनता को पेटभर अन्न नहीं मिलता , वह सौंदर्य का सम्मान नहीं कर सकती।  (114 )लेकिन इसके साथ ही द्विवेदी जी का यह भी स्पष्ट मानना था कि '' जो जाति 'सुन्दर' का सम्मान नहीं कर सकती , वह यह भी नहीं जानती कि बड़े उद्देश्य के लिए प्राण देना क्या चीज है। '' (114 ) नामवर जी इस चिंतन को विस्तार देते हुए लिखते हैं कि ''कोई जाति क्रांति जैसे बड़े उद्देश्य के लिए जान की बाज़ी लगाती है तो इसलिए कि वह सिर्फ जीना नहीं चाहती , बल्कि 'सुन्दर ' ढंग से जीना चाहती है। ''(115 )

                               द्विवेदी जी के अनुसार सौंदर्य रूप नहीं है , परन्तु वह रूप के बिना रह नहीं सकता। वे क्रियाशीलता को जीवन का रूप मानते हैं। वे लिखते हैं -- जीवन को सुन्दर ढंग से बिताने के लिए भी जीवन का एक रूप होना चाहिए। बहुत से लोग कुछ भी न करने को भलापन समझते हैं। यह गलत धारणा है। सुन्दर जीवन क्रियाशील होता है ; क्योंकि क्रियाशीलता ही जीवन का रूप है।  क्रियाशीलता को छोड़कर जीवन का 'सौंदर्य' टिक नहीं सकता। ''(115 )

   द्विवेदीजी सौंदर्यशास्त्र पर 'लालित्य-मीमांसा' नाम से एक पुस्तक भी लिख रहे थे जो दुर्भाग्यवश अधूरी रह गयी।  नामवर जी कहते हैं कि 'द्विवेदी जी इस पुस्तक के माध्यम से लालित्यशास्त्र पर व्यवस्थित और सांगोपांग विचार करना चाहते थे जो उनके जीवन की सुदीर्घ सौंदर्य-चिंता और सौंदर्य-साधना की स्वाभाविक परिणति थी। ''(116 ) नामवरजी ने द्विवेदी जी की 'लालित्य-मीमांसा' के तीन सूत्रों की चर्चा की है। पहले सूत्र के अनुसार द्विवेदी जी सौंदर्य को सौंदर्य न कहकर 'लालित्य' कहना चाहते थे क्योंकि उनकी नज़र में मानव-रचित सौंदर्य का विशेष महत्व था।  इसे और स्पष्ट करते हुए नामवर जी लिखते हैं -- '' समष्टिगत और व्यष्टिगत दोनों ही स्तरों पर द्विवेदी जी की सौंदर्य-दृष्टि मूलतः मानव केंद्रित ही है। इसका अर्थ सिर्फ यही नहीं कि सौंदर्य का स्रष्टा मनुष्य है , बल्कि यह भी कि सौंदर्य की सृष्टि करने के कारण ही मनुष्य मनुष्य है। '' (117 )

            द्विवेदी जी की 'लालित्य-मीमांसा' का दूसरा सूत्र नामवर जी बंधन के विरुद्ध विद्रोह को मानते हैं अर्थात द्विवेदी जी की दृष्टि में कला और सौंदर्य की सृष्टि विलास मात्र नहीं बल्कि बंधनों के विरुद्ध विद्रोह है। 'लालित्य-मीमांसा' के तीसरे सूत्र की चर्चा करते हुए नामवर जी लिखते हैं - '' द्विवेदी जी की 'लालित्य-मीमांसा' का तीसरा सूत्र है कि सौंदर्य एक सर्जना है -- मनुष्य की सिसृक्षा का परिणाम है। ''(118 ) द्विवेदी जी सबसे अधिक बल इसी सिसृक्षा अर्थात मनुष्य की सृजनशीलता पर देते थे। तीनों सूत्रों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के पश्चात् डॉ नामवर सिंह द्विवेदी जी के सौंदर्य सम्बन्धी चिंतन का सार प्रस्तुत करते हुए कहते हैं -- ''  जीवन का समग्र विकास ही सौंदर्य है।  यह सौंदर्य वस्तुतः एक सृजन - व्यापार है।  इस सृजन की क्षमता मनुष्य में अंतर्निहित है।  वह सौंदर्य- सृजन की क्षमता के कारण ही मनुष्य है। इस सृजन-व्यापार का अर्थ है बंधनों से विद्रोह। इस प्रकार सौंदर्य विद्रोह है -- मानव-मुक्ति का प्रयास है। ''(118 )

                                                                                                -- प्रो० कुमार संकल्प - 

Wednesday, June 4, 2014

' बाघ '( केदारनाथ सिंह ) का प्रतीकार्थ( bagh- kedarnath singh )

' बाघ '( केदारनाथ सिंह ) का प्रतीकार्थ 

समाज के प्रगतिशील तत्वों और मानव के उच्चतर मूल्यों को बचाने की चिंता ही कवि केदारनाथ सिंह के काव्य की केंद्रीय चिंता है।  तीसरे सप्तक से अपनी पहचान कायम करनेवाले कवि केदारनाथ सिंह कविता में बिम्ब-विधान को लेकर काफी चर्चित रहे।  ' बाघ' शीर्षक कविता उनकी सबसे लम्बी कविता है।  यह 16 खण्डों में विभक्त है।  प्रत्येक खण्ड स्वतंत्र भी हैं और परस्पर सम्बद्ध भी। इसका दसवाँ खण्ड एक स्वतंत्र कविता के रूप में ' अकाल में सारस' संग्रह में ' सड़क पर दिख गए कवि त्रिलोचन ' शीर्षक से भी संकलित है।  ' बाघ ' के बारे में डॉ. नंदकिशोर नवल की टिप्पणी है -- '' अब तक केदार जी जिस मूल्य को उपलब्ध करने के लिए काव्य-रचना करते आरहे थे , यह कविता वस्तुतः उसी को ' बाघ ' के रूप में मूर्त वा प्रतीकीत करती है। '' (159 ) स्पष्ट है डॉ. नंदकिशोर नवल बाघ को कवि की रचनात्मक उपलब्धि और  उसकी काव्य-यात्रा की उपलब्धि के रूप में देखते हैं।
                            बाघ केदारजी की कई कविताओं में आया है।  यह बाघ उनके लिए भय या हिंसा का प्रतीक नहीं है।  डॉ नंदकिशोर नवल ने लिखा है -- '' यह बाघ उनकी कविता में सौंदर्य का एक बहुत पूर्ण प्रतीक बनकर अपने पूरे बाघ-पन , इंसान-पन और सुन्दर-पन के साथ उपस्थित हुआ है। ''(159 ) अर्थात उनके हिसाब से बाघ यहाँ सौंदर्य , इंसानपन और सुंदरपन का प्रतीक है।  वे इस बाघ की विशेषता को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि  वह सबसे पहले एक बाघ है। अपने बाघपन में ही उसका बिम्ब सहज ग्राह्य हो पाता है। उसके बाद वह इंसानपन के प्रतीक के रूप में दाखिल होता है -- एक बेहद संवेदनशील इंसान के तौर पर जिसे शहर से इसलिए घृणा है कि यहाँ ' हार्दिकता'  नहीं है ,  केवल औपचारिकता और व्यवसायिकता है।(160 )  यहीं अज्ञेय की 'सांप'  कविता याद आती है , जिसमें शहर की इसी अमानवीय स्थिति की ओर ईशारा है। यह अनायास नहीं है कि बाघ को गाँव का ट्रैक्टर , खेत , अनाज के दाने और किसान-जीवन के तमाम बिम्ब अभिभूत करते हैं और दाने की तरह किसी गरीब की तसली में पकना चाहता है --
                                              '' और खुदबखुद
                                                एक बुढ़िया की बटुली में
                                               पकने की इच्छा से
                                              हो गया लाल ''
ऐसी इच्छा कोई बेहद संवेदनशील ही कर सकता है। इसलिए यहाँ बाघ कवि की समस्त रचनाशीलता के लक्ष्य का प्रतीक है। एक रचनाकार हमेसा जनसरोकार को अपनी रचना के केंद्र में रखता है। वह कभी दाना बनना चाहता है तो कभी अन्याय के विरुद्ध  न्याय- शक्ति। इस रूप में बाघ मूल्यों का , जनवादी और मानवीय मूल्यों का प्रतीक है जिन्हें हर हल में बचाने की बेचैनी कवि में देखी जा सकती है।  

                         बाघ को गाँव से विशेष लगाव है। वह बूढ़े बरगद , उसके नीचे सुस्ताते बटोही , विश्राम-आश्रित पक्षी को आत्मीय संवाद की स्थिति में पाता है।आज उनकी जगह संवादहीनता , व्यवहारिकता और बेगानापन घर करते गया है।  यह कवि के अंदर का मूल्यबोध है कि   जो एक समय के समाज के लिए सत्य था जो समय के ही प्रवाह में कहीं खोते चला गया उसे वह आज भी प्रासंगिक मानता है क्योंकि ऐसे मानवीय मूल्य बाजार द्वारा पूर्णतः ध्वस्त नहीं किये जा सकते , उन्हें बचाने की आकांक्षा हर कवि में होती है और वह उसके लिए तरह - तरह से संघर्षरत भी रहता है। लेकिन इसका कत्तई यह मतलब नहीं कि कवि अतीतजीवी या अतीत-मूल्यों के प्रति मोहासक्त होता है , बल्कि केवल इतना कि संवेदनशीलता बची रहे और बचे  रहें सहज और जोड़ने वाले वे तमाम मूल्य ताकि युगों तक बची रहे इंसानियत। कवि परिवर्तन का पक्षधर होता है। उसे निरंतर वर्तमान या यथास्थितिवाद से बोरियत और चिढ़ होती है। कवि केदार जी भी 'पहाड़ का मस्तक फाड़कर' नदी लाना चाहते हैं अर्थात घोर जड़ता को भी तोड़कर परिवर्तन लाने की आकांक्षा और साहस उनमें है। यहाँ दुष्यंत की ग़ज़ल की पंक्तियाँ याद आती हैं --'' हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए / इस हिमालय से अब कोई गंगा निकलनी चाहिए। ''
                                                        'बाघ' केवल परिवर्तन और इंसानपन का ही प्रतीक नहीं है , वह सौंदर्यबोध का भी प्रतीक है। संसार में वह हिंसा का प्रतीक होते हुए भी कविता में वह  हिंसा का प्रतिलोम रचता है। ऐसा नहीं कि कवि यहाँ आकर गांधीवादी हो गया है , बल्कि आतंकवाद , हिंसा आदि का प्रतिलोम रचना समय की अनिवार्य मांग है। इसलिए कवि बाघ को बच्चों का खिलौना बना देता है। उसका आशय रहा होगा कि हिंसा फैलानेवाले समाज को सुन्दर बनाने का कार्य करें -- हिंसा का मार्ग त्यागकर ! आतंक की जगह आनंद की सृष्टि करें, क्योंकि आतंक कभी जीवन-मूल्य नहीं बन सकता। यह कवि की आंतरिक इच्छा है ,मानवीय मूल्यों को स्थापित करने का उसका हाइपोथीसिस है , जिसे वह साकार होते देखना चाहता है।  जरा सोचिये हिंसा का व्यापार करनेवाले अगर आनंद का सृजन करने लगें तो समाज कितना सुन्दर होगा ! हिंसा वाचिक एवं कायिक दोनों होती है।  समाज इससे मुक्त होगा तब  धरती की खूबसूरती का  वह आलम होगा जो स्वर्ग से भी बेहतर होगा। यह है कवि का सौंदर्यबोध। यह अनायास नहीं है कि जब बाघ खरगोश के मुलायम रोओं को सहलाता है तब वह रक्त और मांस की खुशबू नहीं महसूस करता बल्कि कोमलता का आनंद महसूस करता है। आनंद ही हिंसा का प्रतिलोम हो सकता है जिसे रचने की कोशिश कवि यहाँ करता है। क्रंदन की जगह आनंद हो , यह तभी संभव है जब हिंसा का व्यापर करनेवाले आनंद का साधक बनें  --जहाँ बाघ भी बच्चों का खिलौना बन जाये। जहाँ साम्राज्यवादी शक्तियाँ बच्चों के हाथ में बंदूक थमा रही हैं वही कवि द्वारा बाघ को बच्चों का खिलौना बना देने की कल्पना समाज को हिंसामुक्त बनाने की कल्पना है , मानवीय मूल्यों की स्थापना की कल्पना है। इस रूप में बाघ सौंदर्यबोध का एक नया प्रतिमान रचता है जो आतंकवाद के जड़ ज़माने के  दौर में ही उसका प्रतिलोम बनकर उभरता है। यह कवि की फैंटसी हो सकती है , मगर इसकी आवश्यकता , प्रासंगिकता और अर्थवत्ता का अंदाज़ा तब होगा  जब  दंगों की श्रृंखला , "84' , '91',  '92 -93 '  और आज तक के तमाम हिंसा और आतंक को ध्यान में रखा जाय। अतः कवि की साधना हिंसा के विरुद्ध आनंद की स्थापना की साधना है।  बाघ यहाँ इसका भी प्रतीक है।
                                                                  कविता में 'बाघ' मनुष्य का भी रूपक है।  डॉ. नंदकिशोर नवल ने लिखा है कि '' यहाँ यह पूछा जा सकता है कि उसने (कवि ने ) सौंदर्यात्मक प्रतीक बनाने के लिए हरिण जैसे सुन्दर जानवर या किसी सुन्दर पक्षी को क्यों नहीं चुना ? इसका उत्तर यह है कि मनुष्य हरिण या किसी सुन्दर पक्षी की अपेक्षा बाघ से अधिक मिलता है -- स्वार्थी और हिंसक। ''(161 -162 ) मैं इसमें केवल इतना और जोड़ना चाहूंगा कि हिरण या अन्य सुन्दर पक्षी जहाँ पारम्परिक सौंदर्य और अभिजात्य सौंदर्य के प्रतिमान होते हैं , वहीं बाघ सौंदर्यबोध का एक एकदम नया प्रतिमान गढ़ता है। एक प्रगतिशील-जनवादी कवि का सौंदर्यबोध थोड़ा भिन्न तो होगा ही। प्रेमचंद ने प्रगतिशील- सौंदर्यबोध की जो कसौटी निर्मित की थी , उसी के अनुरूप सर्वेश्वर ने अपने काव्य का सौंदर्यबोध गढ़ते हुए लिखा था कि ''जब कोई आदमी भूख से लड़ने खड़ा हो जाता है / सुन्दर दिखने लगता है'' , और उसी सौंदर्यबोध की अगली कड़ी यहाँ 'बाघ' बनता है।

                   'बाघ' कहीं आशा का प्रतीक है तो कहीं निराशा का। इन दोनों के बीच कवि की अदम्य जिजीविषा कविता को अद्वितीयता प्रदान करती है --
                                                          '' दोस्तों, हमें जीना होगा
                                                            जीना होगा बाघ के साथ
                                                            और बाघ के बिना भी जीना होगा। ''
अतः कवि का सौंदर्यबोध उसकी जिजीविषा का भी प्रतीक है। एक बार केदार जी ने कहा था ---'' दुनिया को बदलना दुनिया को सुन्दर बनाने का ही दूसरा नाम है।  कविता इसी गहरे अर्थ में दुनिया को बदलती है। वह हर बार शब्द के 'बेहद्दी मैदान' में असुंदर से लड़ती है और लहूलुहान सुन्दर को विनाश के जबड़ों से खींचकर बाहर लाती है। '' (पर्वग्रह -अंक -73 -74 )इस प्रकार केदार जी का सौंदयबोध विद्रोह का भी प्रतीक है।  नंदकिशोर नवल ने केदार जी के सौंदर्यबोध के बारे में लिखा है कि वह विद्रोह सामाजिक परिवर्तन और क्रांति का पर्याय है। (164 ) खुद केदार जी ने एक कविता में लिखा है --- ठंढ से नहीं मरते शब्द / वे मर जाते हैं साहस की कमी से। ''

Tuesday, May 20, 2014

उपन्यास पर आलोचनात्मक पुस्तकें ( criticism on novels)

आत्मकथा और उपन्यास -- ज्ञानेन्द्र कुमार संतोष -- राजकमल
विनोद कुमार शुक्ल : खिड़की के अंदर और बहार --- योगेश तिवारी -- राजकमल
हिंदी कथा साहित्य : एक दृष्टि --- सत्यकेतु सांकृत -- राजकमल
भूमंडलीकरण और हिंदी उपन्यास --- डॉ ० पुष्पाल सिंह -- राजकमल
उपन्यासों के सरोकार -- डॉ० इ ० विजयलक्ष्मी -- राजकमल
समकालीन हिंदी उपन्यास : समय से साक्षात्कार -- डॉ० इ ० विजयलक्ष्मी -- राजकमल
अठारह उपन्यास -- राजेंद्र यादव -- राजकमल
उपन्यास का काव्यशास्त्र --- बच्चन सिंह
प्रेमचंद के आयाम --- ए० अरविंदाक्षन
कथा समय ---- विजय मोहन  ---- राजकमल
निर्मल वर्मा और उत्तर - उपनिवेशवाद  -- सुधीश पचौरी -- राजकमल
प्रेमचंद : एक विवेचन -- इंद्रनाथ मदान -- राजकमल
राजेंद्र यादव के उपन्यासों में मध्यवर्गीय जीवन -- अर्जुन चौहाण -- राजकमल
उपन्यासों के रचना-प्रसंग -- कुसुम वार्ष्णेय -- राजकमल

Wednesday, May 14, 2014

प्रसिद्द उक्तियाँ  (BEST QUOTATION) 

चाणक्य 

१. इस बात को किसी के सामने वयक्त मत होने  दीजिए कि आपने क्या करने के लिये सोचा है।  बुद्धिमानी से इसे रहस्य बनाए रखिये और इस काम को करने के लिये दृढ रहिये।

भगवान बुद्ध 

१. क्रोध को पाले रखना गरम कोयले को क़िसी और पर फेंकने की नीयत से पकड़े रहने के समान है। इसमें आप ही जलते रहते हैं।

स्वामी विवेकानंद 

१. जो तुम सोचते हो , वह हो जाओगे , यदि तुम खुद को कमजोर सोचते हो , तुम कमजोर हो जाओगे , अगर खुद को ताकतवर सोचते हो , तुम ताकतवर हो जाओगे। 

Monday, May 5, 2014

मेरी ज़िन्दगी

मेरी ज़िन्दगी एक ख़ुदकुशी लगती है ,
हर ख़ुशी हमसे रूठी लगती है।
हर एक दिन नाराज़ होता है  ,
हर एक साँस बेरुखी लगती है।
हर लम्हा उदास होता है ,
पलें ग़मगीन लगती हैं।
मुकद्दर रूठा होता है ,
और बदनसीबी नसीब लगती है।
आंसुओं में भींगी तमन्नाओं को ,
 नाकामयाबी हसीन  लगती है।

कभी मुंह नहीं खोला

मैंने कभी मुंह नहीं खोला
किसी के जीवन में ज़हर नहीं घोला ,
और यह दुनिया
मुझे गूंगा समझने लगी ,
उसने मेरे जीवन में ज़हर नहीं घोला ,
पर न जाने क्या घोल दिया
और मैं चलती फिरती लाश बन गया ,
जहाँ से मुझे सारी दुनिया
केवल लाश नज़र आने लगी।



ऐसा नहीं किया

ऐसा नहीं किया , कभी वैसा नहीं किया ,
एक रोकड़े के वास्ते क्या क्या नहीं किया।
पर यह भी सच है कि अपनी तक़दीर बनाने के वास्ते ,
दूसरों से झूठा वादा नहीं किया।
ऐसा नहीं किया , कभी वैसा नहीं किया ,
कामयाबी पाने के वास्ते क्या क्या नहीं किया ,
पर यह भी सच है कि अपनी ज़िन्दगी संवारने के वास्ते ,
आत्मा को 'आप' से कभी जुदा नहीं किया।


मैं क्रिकेट हूँ

मैं क्रिकेट हूँ
मेरे मुंह पर कालिख पुत गयी है
क्योंकि
अब मुझे
खेल-भावना से नहीं खेला जाता
अब मुझे
केवल पैसा कमाने का जरिया बना लिया गया है।
मैं क्रिकेट हूँ
मैच फिक्सिंग ने मेरे मुंह पर कालिख पुत दिया है

फुटकल शेर
संकल्प अब अपने हाथ में अपना मुकद्दर ले लो।
अपनी मंज़िल के लिए तुफानो से टक्कर ले लो ,
मुंह फेरकर भी क्या करूँगा उससे ,
बदनाम कर दिया जिसने इस हादसे के लिए
जलें हैं होठ जहाँ , जीभ भी जल गयी  होगी  ,
बस गाल पर लिबिस्टिक की छाप रह गयी होगी।

नहीं कोई अपना

नहीं कोई अपना सा लगता है ,
हर अरमान सपना सा लगता है।
ज़िल्लत क्या है ज़िन्दगी की ,की
हर ख्वाब अधूरा सा लगता है।

आँख खुलते ही

आँख खुलते ही
उठ जाते है हाथ
दुआओं में
सिर्फ तुम्हारे लिए
यह जानते हुए भी कि
तुम्हारी दुआओं में
मैं कहीं नहीं हूँ

पैगाम 
धड़कते दिल से पैगाम दे रहा हूँ ,
गीत नहीं दुनिया वालों सैलाब दे रहा हूँ।
समझो तो सबकुछ वर्ना सब पानी है ,
तहज़ीब की ऊंचाई पर दुनिया तहज़ीब से बिल्कुल खाली है।
रखवाले से कौन पूछेगा सवाल ,
देखो , वो कर रहा मनमानी है।
जब जेहन में जागे सवाल और पूछ न पाओ ,
तो समझो , सबकुछ बेमानी है।
शेयर-मार्केट तुम्हारा , नियंता कोई और बने ,
तब वह खायेगा मलाई और तुम बिनोगे चने।
अभी से डगमगा गये पांव , दूर अभी चढ़ाई है ,
साहस के लिये देख लो पीछे मुड़कर ,पार की हमने कितनी ऊंचाई है।
तुम बँट रहे हो अपने ही घर में पराये की तरह ,
वो लिपट गया है मौत बन साये की तरह।
वो दाग रहा है अंधाधुंध हादसे की गोलियॉं ,
तुम इसे भी समझ बैठे हो हमजोलियाँ।
वो छा गया है हमारे जिश्म में ज़हर बनकर ,
हम पचा गये उसे भी अमृत समझ कर।
वह फैला गया अन्दर तक ताबूत की बदबू ,
हम भीतर तक फैले इस मैल को श्रृंगार बना बैठे।

विश्वास

उपेक्षाओं का हार गले में ,
कुंठाओं का झार गले में ,
निराशा हर क्षण घेरती है ,
हर पल लक्ष्य अवरुद्ध करती है।
आशाओं से लड़ती है वह ,
हर क्षण अग्नि में जलती है।
भाग्य से सताया गया हूँ ,
पर मात कहीं न खाया हूँ ,
उपेक्षाओं का ढेर रहते हुए भी ,
कुछ सफलता मैं भी पाया हूँ।
                     आशाएँ लातीं हैं नवजीवन मुझमें ,
                     तमन्ना है कुछ कर जाऊं जग में ,
                     आश नया है , विश्वास नया है ,
                     संघर्ष का हर श्वास नया है ,
                     लक्ष्य नहीं है दूर
                     वह मिलेगा जरूर।
जब मन में है विश्वास मुझे ,
उपेक्षाएँ केरंगी कितना निराश मुझे ?
आशाओं की होगी जय ,
मुझे भी मिलेगी पूर्ण विजय।



Wednesday, April 23, 2014

बंगाली और बिहारी संस्कृति : विकास का फर्क 

बंगाली नववर्ष के दिन मैंने एक पोस्ट डाली -- ''काश मैं बंगाली होता।'' मेरे कुछ मित्र भड़क गए।  कुछ ने वहीँ प्रतिवाद किया , कुछ ने फ़ोन पर और कुछ मिलकर घंटों लड़ते रहे , बहस करते रहे।  अच्छा लगा यह सोचकर कि अपने बिहारी होने पर और अपनी बिहारी अस्मिता पर इन्हें गर्व हो रहा है , यह गर्वबोध  कुछ समय पहले तक नहीं था।यह बंगाली संस्कृति के प्रभाव का कामो-बेस नतीजा है।   खेद इस बात का हो रह था  कि इतनी अनुदारता के साथ कोई संस्कृति चिंतक कैसे हो सकता है, वह भी भारतीय संस्कृति का ? वे मेरे उपरोक्त पोस्ट  पर ऐसे भड़क रहे थे जैसे  मैंने ईसाई होने की बात कह दी हो ! किसी ने गुप्त जी को कोड करते हुए कहा कि उनसे अपनी संस्कृति पर गर्व करना सीखिये।  अजीब हाल , अरे भाई ! गुप्त जी ने भारतीय संस्कृति की बात की है न कि बिहारी या अन्य क्षेत्रीय संस्कृति की ? क्या बंगाली संस्कृति भारतीय संस्कृति नहीं है ? और फिर मैं 15 सालों से बंगाल में हूँ , यह मेरी कर्मभूमि है और इसके प्रेम में मैं सर से पैर तक डूबा हुआ हूँ , तो वैसे ही मैं आधा बंगाली हूँ।  फिर मैंने यहाँ का भाषा -प्रेम , संस्कृति -प्रेम , राजनीतिक जागरूकता , कला -सचेतनता , उत्सव-धर्मिता , प्रेम के प्रति अति-उदारता , जीवन की उन्मुक्तता , आधुनिक चेतना की गहरी समझ , जाती-विहीनता , रूढ़ि-विहीनता आदि को देखकर , अपनी निजी इच्छा जाहिर कर दी कि ''काश मैं बंगाली होता '' तो क्या गुनाह कर डाला ? मेरे बिहारी मित्रों क्या है आपकी बिहारी संस्कृति जरा बताएँगे ? क्या आपमें अपनी संस्कृति के प्रति वही प्रेम और जागरूकता दिखाई पड़ती है जो बंगाली-जाति में अपनी संस्कृति के प्रति है ? अपने पहनावे -ओढावे और भेष-भूषा के प्रति जितना वे सचेत हैं , आप हैं उतना सचेत? हालाँकि  पहनावा  व्यक्ति विशेष की रूचि पर निर्भर  है, मगर अपनी संस्कृति का इसमें काफी गहरा योगदान होता है।
              उन्हें उनके कुछ विशिष्ट  गुणों के कारन लोग इन्हें बंगाली मोसाईं कहते हैं और आपको कोई बिहारी बाबू भी नहीं कहता।  ''रे, बिहारी'' कहते हैं लोग।  कभी आपने सोचा कि आपका बिहारी शब्द आज एक गली के रूप में क्यों प्रयुक्त होने लगा है ? अपनी किन कमियों के कारण  आज लोग आपको बिहारी बाबू नहीं कहकर अपमान जनक अर्थ में 'रे बिहारी' कहने लगे हैं ?जब किसी को निचा दिखाना होता है या किसी मूर्खतापूर्ण काम की ओर संकेत करना होता है तो लोग कहते हैं 'साला बिहारी है ', ''अरे ,बिहारी होगा।'' जबकि किसी बुद्धिमनीवाले काम की ओर संकेत करने के लिए कहा जाता है , एइ  तो बंगाली बुद्धि। ''   आज जहाँ बंगाली बुद्धि बुद्धिमता का पर्याय बन गया है , वहीँ बिहारी बुद्धि मूर्खता का।  आप जानते हैं यहाँ तक की जर्नी (यात्रा) आपने और उन्होंने  एकदिन में तय नहीं की है।  संस्कृति -प्रेम , भाषा-प्रेम , कला सचेतनता , राजनीतिक जागरूकता , नृत्य-संगीत के प्रति स्वस्थ -आग्रह , जीवन के प्रति उदारता , प्रेमपूर्ण- व्यवहार , आधुनिक-भावबोध  आदि ढेरों चीजों  ने उन्हें आज इस मोकाम तक पहुँचाया है।  ''बोकाचोदा '' के अलावे बंगाली कोई गाली नहीं जानते थे।  भद्रा-समाज या भद्रो-बंगाली की संज्ञा ऐसे ही नहीं उन्होंने हासिल कर ली।  क्या आप में वही भाषा-प्रेम है जो उनमें है ? आप अपनी भाषा भोजपुरी बोलते हुए शर्माते हैं , जबकि उन्हें अपनी बांग्ला भाषा पर गर्व है।  आज आपमें थोड़ी -बहुत अपनी भाषा के प्रति गर्वबोध पैदा हुआ है तो यह बहुत कुछ उनके संपर्क का नतीजा है।   बिहार में रहने वाले या हरियाणा , मध्यप्रदेश , ओडिशा , पंजाब, दिल्ली आदि जगहों पर काम करने वाले भोजपुरी भाषी  आज भी भोजपुरी बोलते शरमाते हैं। बंगाली आपसे जनसँख्या में कम हैं ,मगर उनका साहित्य प्रेम और भाषा-प्रेम देख लीजिये कि आज वे अपने  साहित्य और भाषा को वहाँ तक पहुंचा दिए हैं, जहाँ कोई भाषा विश्व-साहित्य के मुकाबले खड़ी हो सके।

                    अब बांग्ला फिल्मों और गीतों की बात कर लीजिये।  जहाँ बंगाल ने कई क्लासिकल फ़िल्में दीं ,गीत दिए वहीँ बिहार का योगदान इस क्षेत्र में अबतक नील है।  बॉलीवुड में नदिया का पार बनी , बिहार में नहीं।  अगर बिहार में बनती तो आज के बिहारी फिल्मों की तरह ही उलुल-जुलूल होती। फिल्मों की बात इस लिए कि  यह तय करती है कि कला के  प्रति आपका टेस्ट कैसा है।बिहार के  भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में बनी तमाम फिल्मों और बिहार के  गानो ने बिहारी शब्द को एक गाली में बदलने में काफी अहम भूमिका निभायी है। 'फार देम चोली' , 'एके छप्पन देवर बड़प्पन  भिड़वले  बा' , 'चल  पलानी में' और ऐसे अनेक गाने जिनका नाम तक नहीं लिया जा सकता।  ये गाने बिहार के बसों , ट्रकों , सवारी गाड़ियों में , गाँव -गाँव में बजाय जाते  है बिना किसी आपत्ति के। इससे आपके कल्चरल टेस्ट का पता चलता है।  गुड्डू रंगीला , खेसारी आदि जैसे अनेक कलाकारों ने बिहार की इस मौजूदा छवि को गढ़ने में सबसे बड़ी भूमिका निभायी है।  इन्हें कलाकार कहते हुए गर्दन शर्म से झुक जाता है। खेद है कि ऐसे कलाकार अबतक केवल बिहार में ही पैदा हो सके हैं, क्योंकि और किसी राज्य की संस्कृति अपने साथ इतना दुराचार करने की छूट नहीं दे सकती।  जब से बिहार के गीत -संगीत की दुनिया पर इन अपसांस्कृतिक कलाकारों का कब्ज़ा हो गया है तब से बिहारी संस्कृति के कला निर्माताओं को हासिये पर फेंक दिया गया है। भारत शर्मा , भिखारी ठाकुर जैसे लोगों की चर्चा अब नहीं है।  आपका पूरा युवा और वयस्क वर्ग इन्ही अप-सांस्कृतिक गानों पर झूम रहा है और प्रतिवाद का स्वर दूर दूर नहीं है।  (यह आपके ही राज्य में सम्भव है कि लालू जैसा चोर मुख्यमंत्री दुबारा मुख्यमंत्री बनने की सोच सकता है , और जेल जाते समय अपनी पांचवी पास औरत को गद्दी पर बिठा सकता है।)
     
                  यह आपकी जागरूकता ही थी कि आपकी अस्मिता का प्रतिक शब्द ''बिहारी'' एक गाली बनने , मूर्खता का पर्याय बनने की ओर  बढ़ता गया और आप चुप रहे , अपनी धुन में मस्त रहे।  और यह उनकी   अपनी संस्कृति ,कला, भाषा , साहित्य , राजनीति  और  साहित्य के प्रति जागरूकता ही  थी कि  वे विश्वभर में भद्रा समाज की संज्ञा प् गए। आपके यहाँ के लोगों द्वारा दी जाने वाली गालियों और किये जाने वाले व्यवहारों का अध्ययन कीजिये , शायद बंगाली शालीनता को समझने में सहूलियत मिल  जाएगी।  कुछ लोग कहाँ अच्छे नहीं होते और कुछ लोग कहाँ बुरे नहीं होते ! परन्तु यहाँ बात कुछ की नहीं , पुरे की है, क्योंकि समग्रता से ही किसी समाज की सांस्कृतिक पहचान बनती है।   आपकी सामाजिक अस्मिता का जब भी सवाल उठेगा तो आपके पुरे समाज को समग्रता में ही पढ़ा जाएगा, और उसकी पहचान तय की जाएगी।  गौर कीजिए कि क्यों आपको महाराष्ट्र , दिल्ली आदि से बार - बार प्रताड़ित किया जाता है ? क्यों हर जगह आपको गाली दी जाती है?बंगालियों को तो कहीं से भगाया नहीं जाता, बंगाली शब्द तो कहीं गाली के अर्थ में प्रयुक्त नहीं होता।  बिहारी शब्द को यहाँ तक पहुचाने में किसकी भूमिका है ?अगर आप अपनी भाषा, अपनी संस्कृति , अपने समाजिक पहचान ,कला ,साहित्य और संगीत के प्रति जागरूक और सचेत होते तो आज यह नौबत नही आती।
             याद कीजिए बंगाल को एक महत्वपूर्ण औद्योगिग नगरी बनाने में सर्वाधिक योगदान बिहारियों का है।  '' राइट एक्शन डे' के दिन सुरहावर्दी के कहर से बंगालियों को बचाने वाले बिहारी ही थे।  आज वही बिहारी बंगाल में अपनी कोई अच्छी  पहचान क्यों नहीं बना पाये? बंगाल में आने वाले वे सबसे पहले प्रवासी   थे।  उनके बहुत बाद राजस्थानी यहाँ आए।   आज बंगाल में उनकी पहचान देखिये और आप अपनी पहचान देखिये।  कहाँ चूक गए आप ? दिल्ली हो या महाराष्ट्र , पंजाब हो या हरियाणा , सूरत हो या बंगाल ,इन्हे एक औद्योगिग केंद्र के रूप में विकसित करने का सबसे बड़ा श्रेय बिहारियों को ही जाता है।   फिर भी हर जगह ये मुहाजिर बनकर क्यों रह गए हैं ? इन  प्रश्नो के उत्तर हमें खोजने होंगे।  यह महज़ पीड़ा का सवाल नहीं है , बल्कि क्षेत्रीय पहचान की जगह एक राष्ट्रीय  पहचान की तलाश में निकली जाति का कहीं न पहुँच पाने की पीड़ा और कारणों का भी सवाल है।  एक जाति जो अपनी क्षेत्रीय पहचान की जगह हमेसा राष्ट्रीय पहचान को अपने जीवन में तवज्जह दी आज बेपहचान बनकर रह गयी है।  या फिर अपने माथे एक अपमानजनक पहचान लेकर घूम रही है, जो निकली थी भारत के इन बड़े शहरों को दुनिया में एक मज़बूत पहचान दिलाने ,वही आज दुनिया में अपनी पहचान एक पिछड़े और बेकार के रूप में बना बैठी।  आखिर कैसे सम्भव हुआ यह सब? इसका उत्तर आपको बदलते राजनीतिक परिदृश्य और उसके फलस्वरूप बढ़ते क्षेत्रीय पहचान की जड़ों में जाकर मिलेगा। कारण चाहे जो भी हो , एक बात तो तय ही है कि  आप चाहे राष्ट्रीय पहचान के जनूँ में या भारत को विश्व के सामने एक मजबूत पहचान दिलाने के रूप में अपने जिस क्षेत्रीय पहचान की बलि दी थी आज उसका बुरा परिणाम ही आपको भोगना पड़  रहा है।एक कारण  यह भी है  कि  आप अपनी कला , संस्कृति, साहित्य ,संगीत , सामाजिक अस्मिता के प्रति हद से अधिक उदासीन थे , जिसका खामियाज़ा आज आप भुगत रहे हैं।
                              बंगाल में कोई नालंदा नहीं था। मगर वहां से हम अपनी यात्रा तय कर कहा पहुंचे हैं ? उन्होंने अपनी यात्रा हमसे बहुत बाद में शांति-निकेतन से शुरू की थी , और देखिये आज कहाँ पहुंचे है वे।  हमारे यहाँ नाचना-गाना अच्छा नहीं माना  जाता।  क्यों ? नृत्य और संगीत को लेकर हमारे यहाँ  क्या धरणा है ? हमारे यहाँ नाचने - गाने वालों को नचनिया -बजनिया की संज्ञा किस धरणा  के तहत दी गयी ? क्या कलाकारों के लिए यह शब्द अपमान-जनक नहीं है? बंगाल में जिन लोगों को नृत्य-संगीत में अच्छी पहचान नहीं मिली ,जिसके लिए वे संघर्ष कर रहे थे तो अपनी जीविका के लिए और अपनी कला को ज़िंदा रखने के लिए, अपने अंदर के कलाकार को ज़िंदा रखने के लिए वे आर्केस्ट्रा और  स्टेजों पर परफॉर्म करने लगे।  मगर आपके यहाँ की संस्कृति में जब यही आर्केस्ट्रा वाले गए तब भी ये परफ़ॉर्मर के रूप में ही गए।  मगर आपने वहां इसे रंडी का नाच नाम दिया।  यह कला के प्रति आपके दृष्टिकोण का तो परिचायक है ही , साथ ही स्त्री के प्रति भी आपके दृष्टिकोण का परिचायक है।  बंगाल में बैंड  या आर्केस्ट्रा में जाकर कई अच्छी  लड़कियां परफॉर्म करती थीं  , इससे उनका जीविका भी चलता था या कुछ पैसा भी मिल जाता था और उनकी कला भी जीवित रहती थी।  इसके लिए कही उनके साथ अभद्र व्यवहार नहीं किया जाता था।  उन्हें इसके लिए कभी गलत निगाह से भी नहीं देखा गया।  यहाँ के लोग कला का जितना सम्मान करना  जानते हैं उतना ही स्त्री का भी।  देख लीजिए जात्रा करने वाली स्त्रिओं के प्रति इनका दृष्टिकोण।  आपके यहाँ जात्रा जैसी कोई चीज होती तो उसे भी रंडी -भडुआ का नाच का नाम दे दिया गया होता।  दो संस्कृतियों के सामंजस्य का परस्पर प्रभाव भी पड़ता है।  आज जात्रा वालों के प्रति बंगाल के दृष्टिकोण में जो  थोड़ी -बहुत संकुचित नजरिये का समावेश हुआ है , वह आपके दृष्टिकोण का प्रभाव है।  दूसरा कारण  यह है कि  आज इस में पैसा नहीं रह गया है, इनकी माली हालत खराब होने के कारण  इनके प्रति लोगों के दृष्टिकोण में फर्क आया है।  यहाँ लड़कियां अपने दोस्त या गार्जियन किसी के साथ भी जाकर किसी स्टेज या आर्केस्ट्रा में परफॉर्म कर आती थीं  , कोई उसे गलत-वे में नहीं लेता था।  मगर जब से यह(आर्केस्ट्रा ) आपके यहाँ गया इसका स्वरुप ही चेंज हो गया।  वहां  इसे रंडी के नाच में बदल दिया गया।  तब से इसमें भद्र घर की लड़कियों ने परफॉर्म करना छोड़ दिया। आज आर्केस्ट्रा में कोई भी भद्र लड़की नही मिलेगी।  अब तो बंगाल में आर्केस्ट्रा जैसी कोई चीज नहीं है।  यहाँ आज भी बैंड  हैं , स्टेज शो हैं , कालेजों में हर साल अच्छे अच्छे बंद  आते हैं , लडकियाँ  परफॉर्म करती हैं  ,जरा आप अपने यहाँ के कालेजों का मुयायना कीजिए सच और फर्क दोनों सामने आ जायेगा।  अब बिहार में ही आर्केस्ट्रा रह गया है जिसे रंडी के नाच के रूप में देखा जाताहै , अब इसमें या तो गरीब घर की लड़कियों को जबरदस्ती भगाकर ले जाकर मजबूर किया जाता है नाचने के लिए या बेश्याओं को ही ले जाया जाता है।  जिन्हें न नृत्य की समझ है न संगीत की और  न कला का कोई ज्ञान।  क्योकि वह आपको चाहिए भी नही।  आपको तो केवल नाच और गाने में सेक्स अपील चाहिए।  आपके यहाँ लोग कहते हैं चल बाई जी (रंडी ) के नाच देखे।  तब उसमें केवल सेक्स अपील देखने जाने की बात होती है।  वहाँ  पैसे दे देकर उन्हें बेहद अश्लील गानों पर नाचने के लिए कहा जाता है। यह बात जाहिर करती है कि  नृत्य और संगीत की कैसी समझ है वहां। यहाँ नाच देखकर लोग कहते है बाह क्या डांस था, कितना अच्छा परफॉर्म की या किया ।  मगर आपके यहाँ ?खैर।  आप अपने यहाँ के बुजुर्गों से बात कीजिए , वे बतायेगे आपको कि  नृत्य क्या होता है।  वे आज बाईजी  या रंडी का भौड़ी  नाच देखने नहीं जाते। वे याद करते हैं ,तिरहुत को , सोठी  ब्रिज़ा-भाड़ के नृत्य  को, वे याद करेंगे भिखारी ठाकुर के ज़माने को।  उस समय लौंडा का ही नाच था , मगर देखने के बाद लोग दिनों तक चर्चा करते थे कि  क्या नाच था , क्या बारीकी थी, क्या पकड़ और क्या ताल था।  नाच और गाने की हर एक बारीकी पर , हर एक  लय पर वे गंभीर चर्चा करते थे , तालमेल की भूरि-भूरि प्रशंसा करते थे।  वहां  से चले थे हम -- नृत्य -संगीत की एक बहुत अच्छी समझ के साथ।  निर्गुण , पुरविया , बिरहा , सोरठा के गीतों को देख लीजिए , ये ठेंठ आपके यहाँ की उपज थे।  आज कहाँ खो गयी यह परंपरा। कहाँ पहुंचे हैं आज आप ? अपनी ही बेहतरीन कलाओं  के प्रति आज कौन सी समझ विकसित कर पाये हैं आप ? अपनी परम्परा से काटकर आप न आधुनिक हुए और न ही पारम्परिक।  इन्ही भौड़ी समझ के कारण  आप आज अपनी अस्मिता की पहचान एक  गाली के रूप में विकसित किये है आप।  उनके पास उनकी पारम्परिकता भी सुरक्षित है और वह शायद आपसे पुरानी भी नहीं है।  घर -घर रविन्द्र संगीत बजता है। जात्रा के प्रति आज भी उनमें वही सम्मान है  और आधुनिक नृत्य -संगीत का सम्मान -जनक स्थान भी उन्होंने हासिल किया है।  आपके पास न आपकी वह पुरानी समृद्ध और सम्मान-जनक परम्परा है और न कला की आधुनिक पहचान।  कला की आधुनिकता के नाम पर आपके पास है -- ''फार दम चोली '', चला हमरा पलानी में '' , आदि अनेक वल्गर गाने जो बड़े शान से आपके समाज में गाए जाते हैं और प्रतिवाद में आप चूँ  भी नहीं बोलते।  इसी पीड़ा के साथ अगर मैंने कह दिया कि  '' काश मैं बंगाली होता '' तो आप इतना भड़कते क्यों हैं  साहेब ? भड़किये मत , यह सोचिये कि  जैसे राजस्थानी खाना , बंगाली खाना , पंजाबी खाना , गुजराती खाना मशहूर है , वैसे आपके पास खाने की भी कोई समझ है कि  नही ! क्या लिट्टी-चोखा आपका प्रसिद्द खाना है ?क्या यह हर घर में रोज या अगर रोज नहीं तो सप्ताह के ४-५ दिन खाया जाता है ? क्या आपके यहाँ के बच्चे -बूढ़े , जवान , स्त्री-पुरुष सभी इसे चाव से खाते हैं या पसंद करते हैं ? अगर नहीं तो यह आपके यहाँ का प्रसिद्द डिश कैसे हो गया ? आपको अपने फेवरेट डिश के रूप में कुछ नहीं मिला तो अपने लिट्टी-चोखा को ही आगे कर दिया विश्व-जगत के सामने !यह बताता है कि  आपके अपने संस्कृति के फेवरेट डिश की भी समझ नहीं है।  बंधु  ! आपकी संस्कृति में एक से बढ़कर एक बढ़िया खाने हैं , बस उन्हें सलीके से खाने का सलीका सीखिये।  इनके यहाँ तो भोजन से भी अगाध प्रेम है।  और मज़ेदार बात जानते हैं  कि  यह जो खाते हैं लगभग वही खाना आप भी खाते हैं  , लगभग वही खाना मारवाड़ी भी खाते हैं ।  मगर उनकी थाली की चर्चा देश देश में है और जब आपसे आपकी संस्कृति का खाना पूछा जाता है तो किसी बेवकूफ की फैलाई बात सुनकर कह देते है की लिट्टी -चोखा। बंगाली अपने फेवरेट खाने में मच-भट का नाम नहीं लेते , मारवाड़ी भी जब कहते हैं राजस्थानी थाली तो किसी एक खाने का नाम नहीं लेते , बस एक थकी सामने कर देते हैं -- कायदे से सजाया हुआ , जिसमें चावल है , रायता है , रोटी है , दही है , चटनी और आचार है , दाल है और २-३ सब्जियां हैं। बंगाली की थाली में भी चावल, दाल, एक दो सब्जी , मछली और बेगुन बज या कोई न कोई १-२ प्रकार का भेजा रहेगा।  सलीके से सजाया हुआ या एक के बाद एक खाना होता है।  मजा ही अलग होता है इस बंगाली कजाने का।  इनके खाने और खिलने का तरीका ऐसा है की जितना आप कहते हैं उससे अधिक जरूर खायेगा आप।  पहले चावल देंगे थोड़ा दाल से खाइये, फिर थोड़ा भेजा से कहिये , फिर थोड़ा सब्जी से खाइए , फिर अब मछली के साथ खाइए।  थोड़ा थोड़ा करते हुए ज्यादा खा लेते हैं आप और पता भी नही चलता।  और हा खाने के बाद दही जरूर खिलाएंगे आपको।  खाने में नींबू भी जरूर रहेगा।  क्या ये सब चीजें आप नहीं खाते?फिर जब आपसे आपके यहाँ के फेवरेट खाने के बारे में पूछा गया तो अपने लिट्टी-चोखा का नाम क्यों लिया? आप भी कायदे से अपनी थाली सजाये होते और कह दिए होते की जनाब ये है हमारे यहाँ का खाना।  मगर यह गलती आपसे इसलिए हुई क्योकि आप सलीके से खाना नहीं जानते थे।  हाँ लिट्टी-चोखा और सतुआ भी आपके यहाँ का विशिष्ट खाद्य है जो की केवल यही मिलता है।  और इसलिए इमके ज़िक्र तो होना ही चाहिए।  मगर यह आपके रोजमर्रा का भोजन नहीं है।  और हाँ इनके अलावे भी अपनी संस्कृति में अनेक ऐसे खाद्य हैं जो केवल उप और बिहार में ही मिलते हैं। आप हमारे यहाँ (बिहार) का मालपुआ खाइए , दुनिआ के सरे मालपुए भूल जाएंगे।  आप हमारे यहन का रसिआव (गुड में बना खीर ) खाइए , बार बार खाने का मन करेगा। फुलौरी और छुरी (आलू चॉप ) भी हमारे यहाँ का मस्त होता है।  ज़नाब अपने लापसी का नाम सुना है?और महुअर का? यह महुए के रास में आतें से बनता है।  लाजवाब होता है खाने में।  बिहार के सिवा उप केन संभवतः मिल सकता है फिर कहीं नहीं।  ज़नाब आपकी समस्या यह नही है की आपके यहन क्या अछा है और क्या लाजवाब , आपकी समस्या यह है की आप इनके  प्रति न संजीदा हैं न  और न सचेत ।  इसीलिए जब भी आपसे कोईआपके प्रिय खाद्य के बारे में  पूछता है तो आप बेवकूफाना अंदाज़ में कभी सतुआ का नाम लेते हैं तो कभी लिट्टी-चोखा का।  आप शान से कहिये की हमारे यहाँ इतने विशिष्ट डिश है की सप्ताह -दर सप्ताह निकल जाएगा हमारे यहाँ के विशिष्ट खाद्य कहते कहते और आपका मन भी नही भरेगा। मक्के की रोटी और साग पंजाब के अलावे हमारे यहाँ लाजवाब बनते हैं। साग के साथ यहाँ के मड़ुए की रोटी खाइए या फिर दाल के साथ खाइए।  यह बिहार के अलावे कहीं नही मिलेगा। हमारे यहाँ के साग भट का भी अलग आनंद है। बथुआ और कर्मी का साग हमारे यहाँ का ही फेमस है। कच्चे मटर का दाल जिसे बिहार में गद्दा कहा जाता है का लाजवाब सवाद देखिए।  हमारे यहाँ एक और चीज फेमस है -- चोथा।  वह क्या स्वाद , मन ही नहीं भरत।  एक और विशिष्ट व्यंजन -- ढकनेसर।  चवा का बनता है , दूध में सराबोर।  खाके जीवन भर याद रखेंगे।  ये सरे डिश ऐसे डिश हैं जो केवल बिहार में ही बनते हैं।  ये बिहार के विशिष्ट व्यंजन हैं।  ये नाम बहार वालों के लिए अजूबा हैं , क्योंकि अपने कभी इनका ज़िक्र ही नहीं किया, बस लिट्टी-चोखा तक सिमित रह गए।  ज़नाब खोजिए , अपनी परंपरा में अपनी संस्कृति में बहुत कुछ विशिष्ट है , बहुत कुछ खश है , थोड़ा संजीदा होकर सोचिये और लोगो को बताइए।  संजीदा होकर तलाशिये ,उसमें संगीत , नृत्य , कला , शिक्षा आदि की कई बारीकियां हैं जो केवल आपकी स्थानीय बारीकियां हैं , जो केवल इसलिए डैम तोड़ रहीं हैं की हम सब उसके प्रति गहरे रूप से उदासीन थे और अब भी हैं।  बंगाल के संपर्क में आने के बाद हम में भशा और संस्कृति प्रेम के प्रति सजगता आई है , इसे यु ही अब बेकार नही जाने देना चाहिए।  आइये एक बिहारी संस्कृति विकास मंच बनाया जय , जहाँ अपनी कला संस्कृति , साहित्य के उत्थान के लिए सम्मिलित प्रयास किया जाएगा।  जहाँ से हमारी एक सममान जनक अस्मिता का निर्माण हो और ''बिहारी '' शब्द एक गली नहीं अपितु एक सम्मान का बोधक बन सके।

                                                                                                                                                                                       ----- कुमार संकल्प ---




जे० सी० को पढ़ना अच्छा लगता है।  वे लिखते भी बहुत अच्छा हैं।  कुछ बुरा भी लिखते हैं ।  मगर उनके बुरे लेखन का मजा यह है कि  आप असहमत होकर बहुत कुछ अच्छा सोचने लगते हैं , मतलब प्रतिक्रिया स्वरुप आपके मन में अनेक विचार जन्म लेते हैं। अतः उनके जिस  लेखन को बुरा कहा जाता है वह बेचैनी पैदा करनेवाला लेखन है।  बेचैनी पैदा करने वाला लेखन बुरा कैसे हो सकता है ?

लोकतंत्र में घोर विरोधियों के लिए भी स्थान होता है।  ये बयान जितने सांप्रदायिक हैं उतने ही अलोकतांत्रिक।



कविता सच के ज़िंदा होने का सबूत है।  वह कवि के रूप में सच कहने वालों के ज़िंदा होने का सबूत  है।  वह सबूत है इस बात का कि लाख लाख कोशिशों के बावजूद भी कोई तंत्र सच को दबा नहीं सकता 

Tuesday, April 15, 2014

मृदुला गर्ग

उपन्यास साहित्य --

१. उनके हिस्से की धुप
२. वंशज
३. चितकबरा
४. अनित्य
५. मैं और मैं
६. कठगुलाब
७. मिलजुल मन ( साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०१३ )

कहानी-संग्रह

१. कितनी कैदें
२. टुकड़ा -टुकड़ा आदमी
३. डैफ़ोडिल जल रहें हैं
४. ग्लेशियर से
५. उर्फ़ सैम
६. शहर के नाम
७. चर्चित कहानियां
८. समागम
९. हरी बिंदी
१०. स्थगित कल
११. मेरे देश की मिटटी अहा
१२. संगती-विसंगति
१३. जूते का जोड़ , गोभी का तोड़

नाटक -- 

१. एक और अज़नबी
२. जादू का कालीन
३. तीन कैदें
४. साम दाम दंड भेद
५. कैद-दर -कैद

निबंध-संग्रह --

१. रंग-ढंग
२. चुकते नहीं सवाल

यात्रा - संस्मरण --

१. कुछ अटके , कुछ भटके

व्यंग्य-संग्रह --

१. कर लेंगे सब हज़म
२. खेद नहीं है 

Sunday, April 6, 2014

दुस्समय के चक्र से लोहा लेती विमलेश की कविता '' एक देश और मरे हुए लोग''

विमलेश भाई को पढना मुझे अच्छा लगता है।  इसके कई कारण  हैं , लेकिन इन कई कारणों में कोई कारण  निजी नहीं है।  एक दिन मैं फेसबुक पर बैठा था कि विमलेश भाई ने एक लिंक भेजी और कहा --'' मेरी एक कविता है , पढ़िए।  '' मैंने लिंक खोली, कविता थी, - 'एक देश और मरे हुए लोग'। एक लाइन के बाद  दूसरी,दूसरी के बाद तीसरी, और फिर चौथी लाइन - जैसे जैसे मैं पढते गया कविता में डूबते गया , बल्कि यूँ कहें कि अपने समय की समस्त चुनौतियों , समस्याओं और बिडम्बनाओं से रु-ब -रू होते गया।  न केवल रू-ब-रू होते गया बल्कि समय की चुनौतिओं से मुठभेड़ करती इस कविता की मुठभेड़ में शामिल होते गया।  मुझे बार बार लगता है कि कविता पढ़ना अपने समय की चुनौतिओं से मुठभेड़ करना है , बशर्ते कि कविता वैसी हो , और यह कविता ऐसी ही है।  
                 यह लेखक बाढ़ का लेखक नहीं है जो लेखन की  बाढ़ के दौर में पैदा हुआ हो।  इसकी कविता , कविताओं में निहित संवेदना एवं कविता का चिंतन-लोक बताता है कि इस कवि  को अपने समय की कितनी गहरी समझ है और समय पर कितनी मजबूत पकड़।  समस्याएं तो अनेक हैं , मगर उन्हें सहजता में पकड़ना और उन्हें सरल - व्यंगयात्मक  ढंग से कुछ इस लहज़े में कहना कि समस्या का कारण  एवं निवारण दोनों झलक उठे और आपके अंदर बैठी जड़ता यह कहते हुय्र टूटने लगे कि टूट , टूट तुमको टूटना ही था --बस इसी धक्के का तुम्हें इंतज़ार था।  
                                  यह कविता आज के लोकतंत्र में ध्वस्त होते मूल्यों की  बतकही नहीं करती , वे तो बहुत पहले ही ध्वस्त हो चुके हैं , बल्कि यह तो पश्त होते आदमी की  लाचारी के बहाने उसी के अंदर बची उर्ज़ा को सहेजकर लड़ने की ओर  इशारा करती है कि अंतिम आशा भी बस तुम्हीं हो।  जहाँ लोकतंत्र संपन्न और निति-निर्धारण करने वाले लोगों के हाथों का झुनझुना बन जाये  और आम आदमी एकदम से लाचार नज़र आने लगे तो उसकी लाचारी दूर करने असमान से कोई देवता या फरिस्ता नहीं आयेगा , बल्कि उसी लाचार आदमी/नागरिक के भीतर बची ऊर्जा ही उसे वह ताकत देगी कि वह मौजूदा लोकतंत्र के मायने बदल कर रख देगी।  यह कवि  केवल उम्मीदों और सपनो का कवि  नहीं है , संघर्षों से विकल्प तलासते , हिम्मत को हथियार बनाते कवियों का हौसला है यह कवि ।  
           कवि कविता की शुरुआत करते हुए ही कहता है -- 
                     '' एक हकीकत को कथा की तरह 
                       और कथा को हकीकत की तरह 
                       सुनिये भन्ते।  ''
दरअसल कथा सुनने के बाद अलग से कुछ कहने की जरुरत नहीं बचती।  आप सब जब एक बार इस कविता से गुजरेंगे तब देश और अपने समय की सारी  भयानक त्रासदियों और विडम्बनाओं से मुठभेड़ करते हुए आगे बढ़ेंगे , अपनी मजबूरियों  और कमजोरियों  से रू-ब-रू होंगे और साथ ही कई वैकल्पिक सम्भावनाओं के द्वार से गुजरेंगे तब क्यों नहीं इस कविता से एकबार गुजरा  जाये ! 
                  कविता की शुरुआत होती है कि एक आदमी राजा बनता है और मंत्रिओं का कुनबा उसे बधाई देता है और यहीं से कविता में हमारे समय का भयावह राजनितिक परिदृश्य खुलने लगता है ----

                     '' राजमाता ने राजा के सम्मान में आयोजन किया एक बड़े भोज का 
                       खजाने के द्वार खोल दिए गए खूब मुर्ग -मसल्ल्म खाने -पीने की छिलबिल''

यह है आज का राजनितिक परिदृश्य।  जीत के उन्माद और बधाई के भव्य प्रदर्शन के लिए देश के खजाने का बेरोक-टोक अपव्यय।  देश की हर पोलिटिकल पार्टी यह करती है।  मगर राजा थोडा सजग एवं संवेदनशील किस्म का है  और उसमें देश के सपनों एवं जनता की उम्मीदों को खोजता हुआ कवि  कहता है -- 

                 राजा  पढ़ा -लिखा था सादगी पसंद थोडा पुराने ख्यालों वाला 
                इसलिए अपने देश के लिए 
                चाहता था कुछ करना कुछ ऐसा जो पहले किसी ने न किया हो 
                और गुलामी के बाद भी 
               जहाँ पहुंची नहीं थी रोशनियां वहाँ तक पहुँचाना चाहता था रोशनी 
               के कतरे 
               रोटी और दाल तो जरुर कम से कम ''
यहाँ कवि  की  दाल रोटी की उम्मीद लोकतंत्र में मिनिमम नागरिक अधिकारो की  आवाज़ है, वैसी स्थिति में जहाँ  सबकुछ आकाओं ने कब्जिया लिया है, जहाँ गरीब जनता के लिए कुछ नहींहै , वहाँ  इतनी इंसानियत तो कम-से-कम बची रहे, फिर वहीं  से हक़ की लड़ाई शुरू  होगी।  हर प्रधानमंत्री अपने पद की गरिमा एवं इतिहास में कुछ यादगार कर जाने  की जरुरत को समझता है।  मगर मरे हुए मंत्रिओं की फ़ौज़ उसे कुछ करने नहीं देती।  राजा देखता है कि वह तो मरे हुए मंत्रिओं की फ़ौज़ से घिरा है ---

                   ''यह सब तो ठीक लेकिन बहुत जल्दी ही इल्म हो गया राजा को 
                    कि उसके चारों ओर मर चुके लोगों की जमात है 
                    मरे हुए मंत्री मरे हुए कुनबों-संत्रियों के बीच उसे घुटन होती ''

यहाँ मर जाने  का अर्थ है संवेदनाओं का मर जाना --

                ''राजा  को आश्चर्य होता कि इतने सरे लोग मर कर भी खुश और सहज कैसे हैं ''

कवि  की यह चिंता हमारे समय की सबसे बड़ी चिंता है।  एकबार नीलकमल जी ने भी कहा था कि हम एक ऐसे समय में जी रहें हैं जहाँ खुश होने के लिए कुछ भी नही है फिर भी सभी खुश हैं।  असल में पूंजीवादी लोकतांत्रिक  व्यवस्था में आप खुश तभी रह सकते हैं जब आप मर चुके हों।  मारा हुआ व्यक्ति किसी भी बात या परिस्थिति से असहज फील नहीं करता।  असहज फील करना आपके ज़िंदा रहने का बैरोमीटर है।  कविता में यही वह स्पेस है जहाँ से कवी पूंजीवादी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के संचालक शक्तियों एवं नीतिओं की  ओर इशारा करता है।  पूंजीवादी नीतियां तभी फल-फूल सकती हैं जब असहज फील करने वाले लोग न हों।  हर सिचुएशन में जो खुश रहना सिख जाये , वही इस व्यवस्था के लिए संजीवनी है या इस व्यवस्था का रक्त-कण है।  

                पूंजीवादी व्यवस्था आपको सिखाती है कि आपको हरहाल में खुश रहना है।  मतलब यह कि पूंजीवादी व्यवस्था आपको जो देगी, उसे स्वीकारना होगा , जिधर ले जाना चाहेगी , उधर जाना होगा।  इसीलिए वह लोकतंत्र के नाम पर एक पूंजीवादी लोकतान्त्रिक ढांचा गढ़ती है जिसकी सारी  नीतियां पूंजीवादी शासन-व्यवस्था की  नीतियां होती हैं जिन्हे लोकतंत्र के नाम पर आप पर थोपा जाता है।  इस व्यवस्था को जीवित लोग नहीं चाहिए , अगर इस व्यवस्था के संचालकों को पता चल गया कि इसमें कोई जीवित व्यक्ति आ गया  है तो उसपर इतना दबाव डाला जाता है कि वह भी मर जाये।  शाम-दाम,दंड-भेद , आखिर ये नीतियां कब कम आएंगी ? लोभ देकर खरीदो , फिर भी न बीके तो ? तो देखिये कविता में --

                 ''बात एक और हुयी इस बीच कि बहुत जल्द पता चल गया मंत्री 
                  कुनबों को कि दरअसल जो राजा  बना है 
                 वह तो ज़िंदा है और मरी हुयी जनता के बीच पहुँचाना चाहता है 
                  रोशनियां '' 

यहाँ व्यंग्य दो-तरफा है।  केवल मंत्रीगण ही नहीं मरे हैं , जनता भी मरी हुयी है।  आखिर मंत्रीगण भी तो हमारे बीच  से ही जाते है। एक बार  बिपिन चन्द्र ने साम्प्रदायिकता के सन्दर्भ में ठीक ऐसी ही बात कही थी कि हमारा समाज जैसा होगा वैसी  ही हमारी राजनीती और पुलिस भी होगी। नेहरु जी ने भी ठीक ऐसी ही बात कही थी। राजनितिक लोग जनता के बीच  से ही उठकर गये है।  अगर जनता नहीं मरी होती तो ज़िंदा राजा  को मृत बना देने की  साजिश में मरे हुए मंत्री कामयाब नहीं होते , उनकी साजिशें कामयाब नहीं होतीं -- 

              ''फिर तो साजिशें शुरू हुयीं और लम्बी चौड़ी ज़िरह के बाद बात जो 
                सामने आयी वह यह थी कि राजा  को राजत्व और मौत में से 
                किसी एक को चुनना था ''

दरअसल कविता में यही वह स्पेस है जहाँ से जनता की सम्भावनाये खुलती हैं।  यह स्पेस जनता को झकझोर देता है कि जीवित जनता के खिलाफ कोई साजिश नहीं कर सकता।  और जीवित जनता के जीवित राजा के खिलाफ कोई षड़यंत्र सफल नहीं हो सकता।  मगर कविता कल्पना को हकीकत कैसे मान सकती है ? समय के सच को तो उसे बयान करना ही है।  और समय का सच है  कि राजा राजत्व  और मौत में से मौत को चुनता है और मृत मंत्रिओं की  जमात में शामिल हो जाता है। तो राजा भी मुर्दों की जमात में शामिल हो गया , मतलब बेरोक-टोक हत्या, बलात्कार , भ्रष्टाचार और तमाम तरह के अन्याय और --

             ''जनता जिसकी अभ्यस्त थी बहुत पहले से ही 
              सिर्फ मुट्ठी भर जिन्दा लोग पसीजते रहेडर -डर  कर बोलते रहे 
              जिसने भी बहुत अधिक उत्साह दिखाया उसे राजा के तंत्र ने 
              झट तब्दील कर दिया मुर्दे में ''

ज़िंदा लोगो को मुर्दे में बदलने की  बड़ी रोचक तरकीब की  खुलाशा करता है कवि ।  ज़िंदा लोगों को मुर्दों में बदलने के लिए राजा ने एक मशीन विदेश से मंगाई थी --

              '' कहते हैं कि राजा ने एक विशेष आदेश जारी कर किसी दूसरे देश से 
                मंगाई थी एक मशीन 
               वहाँ के वैज्ञानिकों ने रात दिन मेहनत कर के 
              खास राजा के देश के लिए बनायीं थी वह मशीन 
              जो ज़िंदा लोगों को तुरंत मुर्दों में बदल सकती थी ''

यहाँ मशीन के बहाने , पश्चिमी बौद्धिक उपनिवेशवाद  , सांस्कृतिक विमर्श , पूंजीवादी-उदारपुंजीवदी , अवारा  पूंजी , उपभोक्तावाद एवं बेलगाम भोगवाद पर गहरी बहस है।  उस मशीन पर कवि  लम्बी टिप्पणी करता है जिसमे कवि -लेखक,कलाकार,समाज-सेवी और तरह तरह के  ज़िंदा लोगों का मुर्दे में बदले जाने  की  बात है और अंत में तो कवि  की  वास्तविक चिंता प्रकट हो जाती है --

               '' उस मशीन के जरिये युद्ध स्तर   पर 
                 पीढ़ियों की एक फेहरिस्त को बनाया गया मुर्दा '' 

राज सत्ता लोकतंत्र में भी खानदानी सत्ता/राजसत्ता /सामंती सत्ता में तब्दील हो जाती है , जब केवल चहरे बदलते हैं और व्यवस्था में कोई तबदीली नहीं होती और शासन का ढंग पूर्वत ही बना रहता है , सबकुछ वैसा ही चलता रहता है--

             '' वे खुश थे कि उनका शासन चलता रहेगा लगातार और कोई भी 
               उनकी सत्ता को दे नहीं पायेगा चुनौती ''

 आखिर मुर्दे चुनौती कैसे देंगे ? और जो ज़िंदा हैं उन्हें मुर्दे में बदलने की मशीन लगा दी गयी है।  
 हालाँकि ऐसे भयानक दुस्समय में कवि  सम्भावनाओं को तलाश ही लेता है और कहता है --

            ''लेकिन हर देश में और हर समय में ज़िंदा रहती हैं कुछ विलुप्त 
             मन ली गयीं प्रजातियां 
            वे छुप-छुप कर रहती हैं ज़िंदा और कुछ के पास तो जनमतः ही 
            होता है कवच -कुंडल और जिन्हें मर पाना कभी भी नहीं 
            रहा असान किसी भी तंत्र के लिए ''

और ऐसे ही लोगों की तलास में घूमता रहता है तंत्र।  और ऐसे ही ज़िंदा लोगों में एक कवि  प्रजाति का भी जीव है जो  न जाने  कहाँ -कहाँ भटकता रहता है मुर्दों को ज़िंदा करने का मंत्र ढूँढता हुआ।  एक ऐसे ही कवि  की कविता पर आज़ बहस हो रही है।  मगर तंत्र क्या ऐसे किस्म के खतरनाक जीवों को ज़िंदा छोड़ेगा ? कवि  भी माँर दिया जाता है।  लेकिन वह मर कर भी अपनी कविता के रूप में हर बार ज़िंदा हो जाता है ,   और अकेले नहीं बल्कि कई लोगों को ज़िंदा करते हुए।  यही है  कविता का मर्म ।  कविता तात्कालिक भी होती है और हर आनेवाले कठिन समय में मुर्दों को ज़िंदा करती हुयी पुनः अपनी प्रासंगिकता अर्जित करती रहती है एवं कालजयी बनी रहती है।  

                                      कवी जनता है कि जिस दिन जिन्दा लोग राजा के किले पर हमला करेंगे तो मुर्दा राजा और उसकी  मुर्दा फ़ौज ज्यादा देर तक टिक नही पायेगी ---

                    ''राजा के किले पर हुआ हमला 
                      ज़िंदा लोगों के सामने देर तक नहीं टिक पाये मुर्दे और उनकी मरी हुयी सेना ''

इसी सम्भावना के साथ कविता ख़त्म हो जानी  चाहिए , मगर यह तो कविता का पहला बंद है और कायदे से तो कविता के पहले बंद को यहाँ ख़त्म होना ही चाहिए था इस सम्भावना के साथ।  मगर नहीं।  कवि  जनता है कि  इस सम्भावना के चलते जो व्यवस्था बनेगी उसको भी वह मशीन मुर्दों में बदल देगी।याद  कीजिए सर्वेश्वर कि कविता भेड़िये जिसमें वे कहते है कि भेड़िया फिर लौट के  आ सकते  हैं ।  अतः कवि  को तलाश है उस मशीन की  जो ज़िन्दों को बड़ी तेज़ी से मुर्दों में बदलती जा रही है।  मुर्दों में सम्भवनाएँ  नही होती।  अतः उस मशीन को नष्ट करना बहुत जरुरी है -- 

                  '' मुझे लगता है कि किसी भी कविता और  कथा से जरुरी उस 
                    खतरनाक मशीन का पता लगाना 
                   और नष्ट करना है भन्ते।  ''
और कवि  इस लड़ाई में अकेले नहीं रहना चाहता , क्योंकि वह जनता है कि लड़ाइयां अकेले नहीं लड़ीं जातीं ।  इसलिए वह हम सभी को इसमें शामिल होने का आह्वान करता  है ---

                   ''क्या तुम मेरे साथ चलने को तयार हो भंते     …… ?'' 

                                                 कुमार संकल्प 

Thursday, March 27, 2014

Fanishwar nath Renu ( फणीश्वरनाथ रेणु )

जन्म ;

रेनू का जन्म ४ मार्च 1921 को बिहार के पूर्णिया ( अब अररिया ) जिले के औराही हिंगना गाँव में हुआ था।  प्रारंभिक शिक्षा -- फारबिसगंज एवं अररिया में।
मैट्रिक -- नेपाल के विराट नगर से कोइराला परिवार में रहकर।
1942 में इन्टरमीडिएट -- काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से।


रचनाएं ;

पहली रचना बट बाबा (कहानी) कोल्कता के विश्वामित्र में छपी थी।
पहला उपन्यास -- मैला आँचल -- 1954  में

अन्य उपन्यास --

परत परिकथा , कितने चौराहे, पलटू  बाबू रोड , दीर्घतपा, जुलुस 

Wednesday, March 19, 2014

पहला निराला स्मृति सम्मान

महाकवि निराला की  पुस्तको की रॉयल्टी से मिलाने वाली रकम से दिया जाना वाला यह सम्मान हर साल निराला की परम्परा से जुड़े कवी को दिया जाएगा।  इसकी राशि २१००० रुपये की होती है।
पहला निराला स्मृति सम्मान राजेश जोशी को वर्ष 2014  में दिया जाएगा।  निर्णायक मंडल के अध्यक्ष हैं -- प्रो० अजय तिवारी

राजेश जोशी की रचनाएँ 

काव्य - संग्रह 
१. एक दिन बोलेंगे पेड़
२. मिट्टी का चेहरा
३. नेपथ्य में हंसी
४. दो पंक्तियो के बीच
५. चाँद की वर्तनी

कहानी संग्रह 
१. 
२.

नाटक 
१. 
२. 
३. 
४. 
 आलोचनात्मक पुस्तक 

१. 
२. 

वर्ष २०१३ का शमशेर सम्मान 

कविता के लिए 
ऋतुराज को

सृजनात्मक गद्य के लिए 
गद्यकार सुधीर विद्यार्थी को

सुधीर विद्यार्थी की प्रमुख रचनाएँ 

१. अशफाक उल्ला और उनका युग
२. शहीद रोशन सिंह
३. भगत सिंह की  सुनें
४. अग्निपुंज
५. अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद
६. क्रांति कि इबारतें
७. क्रन्तिकारी बटुकेश्वर दत्त
८. बुंदेलखंड और आज़ाद      
९. लौटना कठिन है
लगभग ३४ पुस्तकें हैं  इनकी 
वर्ष २०१३ में प्रकाशित उपन्यास 

१. नदी -- उषा प्रियम्बदा -- राजकमल
२. मैं  और मैं -- मृदुला गर्ग --  राजकमल
३.


वर्ष २०१३ में प्रकाशित कहानी - संग्रह 

१. शादी का जोकर -- अब्दुल बिस्मिल्लाह
२. शताब्दी से शेष -- पंकज बिष्ट
३. डेमोक्रेसिया  --  असगर वजाहत
४. सवार और दूसरी कहानियाँ -- शम्सुर्रहमान फारूकी -- पहला संग्रह
५. ताकि सनद रहे -- अब्दुल बिस्मिल्लाह
६.
७.



वर्ष २०१३ में प्रकाशित काव्य -- संग्रह 

१. कहीं कोई दरवाजा -- अशोक वाजपेयी ( २००९ -२०१२ के बिच लिखी कविताएँ )
२. जितने लोग उतने प्रेम -- लीलाधर जगूड़ी (१२ वाँ काव्य - संग्रह )
३. मोनालिसा कि आँखें -- सुमन केशरी
४.
५.





Tuesday, March 18, 2014

एम. ए. (M . A ) के लिए OBJECTIVES प्रश्न 


१. बैल कि खाल किसकी कहानी है?
२. सलाम किसकी कहानी है?
३. अछूत किसकी आत्मकथा है?
४. हिंदी साहित्य में प्रचलित '' आहा ग्राम्य जीवन '' का विलोम रचने का श्रेय किसे दिया जाता है?
५. प्रथम हिंदी दलित साहित्य सम्मलेन के अध्यक्ष कौन थे?
६. ''बस्स बहुत हो चुका '' किसका काव्य संग्रह है?
७. ओमप्रकाश बाल्मीकि के दो कहानी संग्र्हो का नाम बताइए ?
८. भारतीय गावों को 'अमानुषिकता के अड्डे ' किसने कहा था?
९. राजेंद्र यादव का निधन कब हुआ ?
१०. ओमप्रकाश बाल्मीकि का निधन कब हुआ?
उत्तर ------------
१. ओमप्रकाश बाल्मीकि  २. ओमप्रकाश बाल्मीकि ३. दया पवार ४ . ओमप्रकाश बाल्मीकि  ५. ओमप्रकाश बाल्मीकि ६. ओमप्रकाश बाल्मीकि ७. सलाम , छतरी ८. डॉ भीम राव आंबेडकर ९. 28 अक्टूबर २०१३
१०. १७ नवम्बर २०१३ देहरादून

SET II 

१. औरतजात किसकी कहानी है?
२. दो दलित महिला कहानीकारों का नाम बताइए।
३. दो दलित महिला कवियित्रियों का नाम बताइए।
४.
५.
६.
७.
८.
९.
१०.



उत्तर --  १. उर्मिला पवार २. पुष्पा भारती और निरा परमार ३. किरण देवी भारती और रजनी अनुरागी 

                                  दलित साहित्य

ओमप्रकाश बाल्मीकि

जन्म-  ३० जून  1950 को मुजफ्फरनगर जिले के बरला गाँव में 
 मृत्यु -- 17  नवम्बर 2013 

रचनाएँ 

सदियों का संताप -- पहला काव्य संग्रह 
सलाम -- पहला कहानी संग्रह -- २००० ई ० 
घुसपैठिए -- कहानी संग्रह 
छतरी  ---    कहानी संग्रह 
बस्स  बहुत हो चुका  -- काव्य संग्रह 
अब और नहीं  --  काव्य संग्रह 
जूठन -- आत्मकथा 
दलित साहित्या का सौंदर्यशास्त्र  -- आलोचनात्मक पुस्तक 
सफाई देवता -- विचारपरक पुस्तक 
मुख्यधारा और दलित साहित्य --   आलोचनात्मक पुस्तक 
अनुवाद  
प्रसिद्द समाज शास्त्री कांचा इलैया कि विश्व-प्रसिद्द पुस्तक - 'why i  am not a  hindu ''  का हिंदी अनुवाद --' क्यों मैं हिन्दू नहीं हूँ  
मराठी पुस्तक -- 'साइरन का शहर ' का हिंदी अनुवाद 

मराठी दलित साहित्यकार 
पुरूष 

१. अर्जुन डांग्ले
२. नामदेव ढसाल
३. अरुण कांबले
४. राजा  ढाले
५. लक्ष्मण गायकवाड़
६. लक्ष्मण माने
७. शरण कुमार लिम्बाले

स्त्री 

१. प्रो ० कुमुद पावड़े
२. ज्योति लांजेवाल
३. उर्मिला पवार
४. बेबी ताई कांबले
५. हीरा बंसोड़

हिंदी के दलित साहित्यकार 

पुरुस 

१. ओमप्रकाश बाल्मीकि
२. मोहनदास नैमिशराय
३. कँवल भारती
४. जय प्रकाश कर्दम
५. श्योराज सिंह बेचैन
६. प्रो ० तुलसीराम
७. डॉ ० धर्मवीर
८. अजय नवारिया

महिला  
 

१. डॉ ० सुशीला टाकभौरे 
२. रजत रानी मीनू 
३. तारा परमार 
४. डॉ ० कुसुम मेघवाल 
५. रजनी तिलक 

दलित स्त्री आत्मकथा

१. धूप छाँव -- शांताबाई दाणी -- मराठी
२. अंत स्फोट --- कुमुद पावड़े
३. जीवन हमारा --- बेबी काम्बले
४. नाजा  -----      शांता काम्बले ( शांता कृष्ण कांबले )
५. दोहरा अभिशाप ---  कौशल्या बैसंत्री
६. मेरे जीवन कि चित्रकथा --- शांता कृष्ण कांबले
७. मेरे जीवन का संक्षिप्त सफरनामा -- कु. मायावती
८. मेरी कहानी --  निर्मला रानी
९. चंद  यादों की  परतें  ---  थेसो क्रोपी
१०. पग में घुँघरू , पथ में कांटे  -- किरण देवी भारती

दलित पत्र -- पत्रिकाएँ 

१. दलित वार्षिकी
२. आश्वस्त
३. अपेक्षा
४. अभिमूकनायक
५. दलित टुडे


दलित स्त्री लेखिकाएँ  

१. उर्मिला पवार
२. सुशीला टांकभोरे
३. रजनी अनुरागी
४. रजनी दिसोदिया
५. उपासना गौतम
६. किरण भारती
७. ज्योत्सना
८. हीरा पवार
९. ऊषा अंबौरे
१०. प्रज्ञा लोखंडे
११. रजत रानी
१२. अनीता भारती
१३. सुमित्रा महरौल
१४. हेमलता महिश्वर
१५. निर्मला राज
१६. रजनी तिलक
१७. सुजाता पारमिता
१८. पी. शिवकामी
१९. बामा
२०. ज्योति लंजेवाल

हंस का दलित विशेषांक

अन्यथा
अपेक्षा

दलित साहित्य 

१. नगाड़े की तरह बजते शब्द -- ( काव्य संग्रह ) -- निर्मला पुतुल --
२. अंधेरे में कंदील -- ( काव्य -संग्रह) -- कुंती
३. माँ मुझे मत दो --( काव्य -संग्रह)-- पूनम तुषामड़
४. 

 शरण कुमार लिम्बाले 

जन्म-- जून 1956 , महाराष्ट्र 
अक्करमाशी (आत्मकथा ) 
देवता आदमी ( कहानी) 
दलित साहित्य का सौन्दर्य-शास्त्र  ( समीक्षा )
नरवानर ( उपन्यास )
दलित ब्राह्मण ( कहानी ) 
हिन्दू  (उपन्यास )