मेरी ज़िन्दगी
मेरी ज़िन्दगी एक ख़ुदकुशी लगती है ,
हर ख़ुशी हमसे रूठी लगती है।
हर एक दिन नाराज़ होता है ,
हर एक साँस बेरुखी लगती है।
हर लम्हा उदास होता है ,
पलें ग़मगीन लगती हैं।
मुकद्दर रूठा होता है ,
और बदनसीबी नसीब लगती है।
आंसुओं में भींगी तमन्नाओं को ,
नाकामयाबी हसीन लगती है।
कभी मुंह नहीं खोला
मैंने कभी मुंह नहीं खोला
किसी के जीवन में ज़हर नहीं घोला ,
और यह दुनिया
मुझे गूंगा समझने लगी ,
उसने मेरे जीवन में ज़हर नहीं घोला ,
पर न जाने क्या घोल दिया
और मैं चलती फिरती लाश बन गया ,
जहाँ से मुझे सारी दुनिया
केवल लाश नज़र आने लगी।
ऐसा नहीं किया
ऐसा नहीं किया , कभी वैसा नहीं किया ,
एक रोकड़े के वास्ते क्या क्या नहीं किया।
पर यह भी सच है कि अपनी तक़दीर बनाने के वास्ते ,
दूसरों से झूठा वादा नहीं किया।
ऐसा नहीं किया , कभी वैसा नहीं किया ,
कामयाबी पाने के वास्ते क्या क्या नहीं किया ,
पर यह भी सच है कि अपनी ज़िन्दगी संवारने के वास्ते ,
आत्मा को 'आप' से कभी जुदा नहीं किया।
मैं क्रिकेट हूँ
मैं क्रिकेट हूँ
मेरे मुंह पर कालिख पुत गयी है
क्योंकि
अब मुझे
खेल-भावना से नहीं खेला जाता
अब मुझे
केवल पैसा कमाने का जरिया बना लिया गया है।
मैं क्रिकेट हूँ
मैच फिक्सिंग ने मेरे मुंह पर कालिख पुत दिया है
फुटकल शेर
संकल्प अब अपने हाथ में अपना मुकद्दर ले लो।
अपनी मंज़िल के लिए तुफानो से टक्कर ले लो ,
मुंह फेरकर भी क्या करूँगा उससे ,
बदनाम कर दिया जिसने इस हादसे के लिए
जलें हैं होठ जहाँ , जीभ भी जल गयी होगी ,
बस गाल पर लिबिस्टिक की छाप रह गयी होगी।
नहीं कोई अपना
नहीं कोई अपना सा लगता है ,
हर अरमान सपना सा लगता है।
ज़िल्लत क्या है ज़िन्दगी की ,की
हर ख्वाब अधूरा सा लगता है।
आँख खुलते ही
आँख खुलते ही
उठ जाते है हाथ
दुआओं में
सिर्फ तुम्हारे लिए
यह जानते हुए भी कि
तुम्हारी दुआओं में
मैं कहीं नहीं हूँ
पैगाम
धड़कते दिल से पैगाम दे रहा हूँ ,
गीत नहीं दुनिया वालों सैलाब दे रहा हूँ।
समझो तो सबकुछ वर्ना सब पानी है ,
तहज़ीब की ऊंचाई पर दुनिया तहज़ीब से बिल्कुल खाली है।
रखवाले से कौन पूछेगा सवाल ,
देखो , वो कर रहा मनमानी है।
जब जेहन में जागे सवाल और पूछ न पाओ ,
तो समझो , सबकुछ बेमानी है।
शेयर-मार्केट तुम्हारा , नियंता कोई और बने ,
तब वह खायेगा मलाई और तुम बिनोगे चने।
अभी से डगमगा गये पांव , दूर अभी चढ़ाई है ,
साहस के लिये देख लो पीछे मुड़कर ,पार की हमने कितनी ऊंचाई है।
तुम बँट रहे हो अपने ही घर में पराये की तरह ,
वो लिपट गया है मौत बन साये की तरह।
वो दाग रहा है अंधाधुंध हादसे की गोलियॉं ,
तुम इसे भी समझ बैठे हो हमजोलियाँ।
वो छा गया है हमारे जिश्म में ज़हर बनकर ,
हम पचा गये उसे भी अमृत समझ कर।
वह फैला गया अन्दर तक ताबूत की बदबू ,
हम भीतर तक फैले इस मैल को श्रृंगार बना बैठे।
विश्वास
उपेक्षाओं का हार गले में ,
कुंठाओं का झार गले में ,
निराशा हर क्षण घेरती है ,
हर पल लक्ष्य अवरुद्ध करती है।
आशाओं से लड़ती है वह ,
हर क्षण अग्नि में जलती है।
भाग्य से सताया गया हूँ ,
पर मात कहीं न खाया हूँ ,
उपेक्षाओं का ढेर रहते हुए भी ,
कुछ सफलता मैं भी पाया हूँ।
आशाएँ लातीं हैं नवजीवन मुझमें ,
तमन्ना है कुछ कर जाऊं जग में ,
आश नया है , विश्वास नया है ,
संघर्ष का हर श्वास नया है ,
लक्ष्य नहीं है दूर
वह मिलेगा जरूर।
जब मन में है विश्वास मुझे ,
उपेक्षाएँ केरंगी कितना निराश मुझे ?
आशाओं की होगी जय ,
मुझे भी मिलेगी पूर्ण विजय।
मेरी ज़िन्दगी एक ख़ुदकुशी लगती है ,
हर ख़ुशी हमसे रूठी लगती है।
हर एक दिन नाराज़ होता है ,
हर एक साँस बेरुखी लगती है।
हर लम्हा उदास होता है ,
पलें ग़मगीन लगती हैं।
मुकद्दर रूठा होता है ,
और बदनसीबी नसीब लगती है।
आंसुओं में भींगी तमन्नाओं को ,
नाकामयाबी हसीन लगती है।
कभी मुंह नहीं खोला
मैंने कभी मुंह नहीं खोला
किसी के जीवन में ज़हर नहीं घोला ,
और यह दुनिया
मुझे गूंगा समझने लगी ,
उसने मेरे जीवन में ज़हर नहीं घोला ,
पर न जाने क्या घोल दिया
और मैं चलती फिरती लाश बन गया ,
जहाँ से मुझे सारी दुनिया
केवल लाश नज़र आने लगी।
ऐसा नहीं किया
ऐसा नहीं किया , कभी वैसा नहीं किया ,
एक रोकड़े के वास्ते क्या क्या नहीं किया।
पर यह भी सच है कि अपनी तक़दीर बनाने के वास्ते ,
दूसरों से झूठा वादा नहीं किया।
ऐसा नहीं किया , कभी वैसा नहीं किया ,
कामयाबी पाने के वास्ते क्या क्या नहीं किया ,
पर यह भी सच है कि अपनी ज़िन्दगी संवारने के वास्ते ,
आत्मा को 'आप' से कभी जुदा नहीं किया।
मैं क्रिकेट हूँ
मैं क्रिकेट हूँ
मेरे मुंह पर कालिख पुत गयी है
क्योंकि
अब मुझे
खेल-भावना से नहीं खेला जाता
अब मुझे
केवल पैसा कमाने का जरिया बना लिया गया है।
मैं क्रिकेट हूँ
मैच फिक्सिंग ने मेरे मुंह पर कालिख पुत दिया है
फुटकल शेर
संकल्प अब अपने हाथ में अपना मुकद्दर ले लो।
अपनी मंज़िल के लिए तुफानो से टक्कर ले लो ,
मुंह फेरकर भी क्या करूँगा उससे ,
बदनाम कर दिया जिसने इस हादसे के लिए
जलें हैं होठ जहाँ , जीभ भी जल गयी होगी ,
बस गाल पर लिबिस्टिक की छाप रह गयी होगी।
नहीं कोई अपना
नहीं कोई अपना सा लगता है ,
हर अरमान सपना सा लगता है।
ज़िल्लत क्या है ज़िन्दगी की ,की
हर ख्वाब अधूरा सा लगता है।
आँख खुलते ही
आँख खुलते ही
उठ जाते है हाथ
दुआओं में
सिर्फ तुम्हारे लिए
यह जानते हुए भी कि
तुम्हारी दुआओं में
मैं कहीं नहीं हूँ
पैगाम
धड़कते दिल से पैगाम दे रहा हूँ ,
गीत नहीं दुनिया वालों सैलाब दे रहा हूँ।
समझो तो सबकुछ वर्ना सब पानी है ,
तहज़ीब की ऊंचाई पर दुनिया तहज़ीब से बिल्कुल खाली है।
रखवाले से कौन पूछेगा सवाल ,
देखो , वो कर रहा मनमानी है।
जब जेहन में जागे सवाल और पूछ न पाओ ,
तो समझो , सबकुछ बेमानी है।
शेयर-मार्केट तुम्हारा , नियंता कोई और बने ,
तब वह खायेगा मलाई और तुम बिनोगे चने।
अभी से डगमगा गये पांव , दूर अभी चढ़ाई है ,
साहस के लिये देख लो पीछे मुड़कर ,पार की हमने कितनी ऊंचाई है।
तुम बँट रहे हो अपने ही घर में पराये की तरह ,
वो लिपट गया है मौत बन साये की तरह।
वो दाग रहा है अंधाधुंध हादसे की गोलियॉं ,
तुम इसे भी समझ बैठे हो हमजोलियाँ।
वो छा गया है हमारे जिश्म में ज़हर बनकर ,
हम पचा गये उसे भी अमृत समझ कर।
वह फैला गया अन्दर तक ताबूत की बदबू ,
हम भीतर तक फैले इस मैल को श्रृंगार बना बैठे।
विश्वास
उपेक्षाओं का हार गले में ,
कुंठाओं का झार गले में ,
निराशा हर क्षण घेरती है ,
हर पल लक्ष्य अवरुद्ध करती है।
आशाओं से लड़ती है वह ,
हर क्षण अग्नि में जलती है।
भाग्य से सताया गया हूँ ,
पर मात कहीं न खाया हूँ ,
उपेक्षाओं का ढेर रहते हुए भी ,
कुछ सफलता मैं भी पाया हूँ।
आशाएँ लातीं हैं नवजीवन मुझमें ,
तमन्ना है कुछ कर जाऊं जग में ,
आश नया है , विश्वास नया है ,
संघर्ष का हर श्वास नया है ,
लक्ष्य नहीं है दूर
वह मिलेगा जरूर।
जब मन में है विश्वास मुझे ,
उपेक्षाएँ केरंगी कितना निराश मुझे ?
आशाओं की होगी जय ,
मुझे भी मिलेगी पूर्ण विजय।
No comments:
Post a Comment