बंगाली और बिहारी संस्कृति : विकास का फर्क
बंगाली नववर्ष के दिन मैंने एक पोस्ट डाली -- ''काश मैं बंगाली होता।'' मेरे कुछ मित्र भड़क गए। कुछ ने वहीँ प्रतिवाद किया , कुछ ने फ़ोन पर और कुछ मिलकर घंटों लड़ते रहे , बहस करते रहे। अच्छा लगा यह सोचकर कि अपने बिहारी होने पर और अपनी बिहारी अस्मिता पर इन्हें गर्व हो रहा है , यह गर्वबोध कुछ समय पहले तक नहीं था।यह बंगाली संस्कृति के प्रभाव का कामो-बेस नतीजा है। खेद इस बात का हो रह था कि इतनी अनुदारता के साथ कोई संस्कृति चिंतक कैसे हो सकता है, वह भी भारतीय संस्कृति का ? वे मेरे उपरोक्त पोस्ट पर ऐसे भड़क रहे थे जैसे मैंने ईसाई होने की बात कह दी हो ! किसी ने गुप्त जी को कोड करते हुए कहा कि उनसे अपनी संस्कृति पर गर्व करना सीखिये। अजीब हाल , अरे भाई ! गुप्त जी ने भारतीय संस्कृति की बात की है न कि बिहारी या अन्य क्षेत्रीय संस्कृति की ? क्या बंगाली संस्कृति भारतीय संस्कृति नहीं है ? और फिर मैं 15 सालों से बंगाल में हूँ , यह मेरी कर्मभूमि है और इसके प्रेम में मैं सर से पैर तक डूबा हुआ हूँ , तो वैसे ही मैं आधा बंगाली हूँ। फिर मैंने यहाँ का भाषा -प्रेम , संस्कृति -प्रेम , राजनीतिक जागरूकता , कला -सचेतनता , उत्सव-धर्मिता , प्रेम के प्रति अति-उदारता , जीवन की उन्मुक्तता , आधुनिक चेतना की गहरी समझ , जाती-विहीनता , रूढ़ि-विहीनता आदि को देखकर , अपनी निजी इच्छा जाहिर कर दी कि ''काश मैं बंगाली होता '' तो क्या गुनाह कर डाला ? मेरे बिहारी मित्रों क्या है आपकी बिहारी संस्कृति जरा बताएँगे ? क्या आपमें अपनी संस्कृति के प्रति वही प्रेम और जागरूकता दिखाई पड़ती है जो बंगाली-जाति में अपनी संस्कृति के प्रति है ? अपने पहनावे -ओढावे और भेष-भूषा के प्रति जितना वे सचेत हैं , आप हैं उतना सचेत? हालाँकि पहनावा व्यक्ति विशेष की रूचि पर निर्भर है, मगर अपनी संस्कृति का इसमें काफी गहरा योगदान होता है।
उन्हें उनके कुछ विशिष्ट गुणों के कारन लोग इन्हें बंगाली मोसाईं कहते हैं और आपको कोई बिहारी बाबू भी नहीं कहता। ''रे, बिहारी'' कहते हैं लोग। कभी आपने सोचा कि आपका बिहारी शब्द आज एक गली के रूप में क्यों प्रयुक्त होने लगा है ? अपनी किन कमियों के कारण आज लोग आपको बिहारी बाबू नहीं कहकर अपमान जनक अर्थ में 'रे बिहारी' कहने लगे हैं ?जब किसी को निचा दिखाना होता है या किसी मूर्खतापूर्ण काम की ओर संकेत करना होता है तो लोग कहते हैं 'साला बिहारी है ', ''अरे ,बिहारी होगा।'' जबकि किसी बुद्धिमनीवाले काम की ओर संकेत करने के लिए कहा जाता है , एइ तो बंगाली बुद्धि। '' आज जहाँ बंगाली बुद्धि बुद्धिमता का पर्याय बन गया है , वहीँ बिहारी बुद्धि मूर्खता का। आप जानते हैं यहाँ तक की जर्नी (यात्रा) आपने और उन्होंने एकदिन में तय नहीं की है। संस्कृति -प्रेम , भाषा-प्रेम , कला सचेतनता , राजनीतिक जागरूकता , नृत्य-संगीत के प्रति स्वस्थ -आग्रह , जीवन के प्रति उदारता , प्रेमपूर्ण- व्यवहार , आधुनिक-भावबोध आदि ढेरों चीजों ने उन्हें आज इस मोकाम तक पहुँचाया है। ''बोकाचोदा '' के अलावे बंगाली कोई गाली नहीं जानते थे। भद्रा-समाज या भद्रो-बंगाली की संज्ञा ऐसे ही नहीं उन्होंने हासिल कर ली। क्या आप में वही भाषा-प्रेम है जो उनमें है ? आप अपनी भाषा भोजपुरी बोलते हुए शर्माते हैं , जबकि उन्हें अपनी बांग्ला भाषा पर गर्व है। आज आपमें थोड़ी -बहुत अपनी भाषा के प्रति गर्वबोध पैदा हुआ है तो यह बहुत कुछ उनके संपर्क का नतीजा है। बिहार में रहने वाले या हरियाणा , मध्यप्रदेश , ओडिशा , पंजाब, दिल्ली आदि जगहों पर काम करने वाले भोजपुरी भाषी आज भी भोजपुरी बोलते शरमाते हैं। बंगाली आपसे जनसँख्या में कम हैं ,मगर उनका साहित्य प्रेम और भाषा-प्रेम देख लीजिये कि आज वे अपने साहित्य और भाषा को वहाँ तक पहुंचा दिए हैं, जहाँ कोई भाषा विश्व-साहित्य के मुकाबले खड़ी हो सके।
अब बांग्ला फिल्मों और गीतों की बात कर लीजिये। जहाँ बंगाल ने कई क्लासिकल फ़िल्में दीं ,गीत दिए वहीँ बिहार का योगदान इस क्षेत्र में अबतक नील है। बॉलीवुड में नदिया का पार बनी , बिहार में नहीं। अगर बिहार में बनती तो आज के बिहारी फिल्मों की तरह ही उलुल-जुलूल होती। फिल्मों की बात इस लिए कि यह तय करती है कि कला के प्रति आपका टेस्ट कैसा है।बिहार के भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में बनी तमाम फिल्मों और बिहार के गानो ने बिहारी शब्द को एक गाली में बदलने में काफी अहम भूमिका निभायी है। 'फार देम चोली' , 'एके छप्पन देवर बड़प्पन भिड़वले बा' , 'चल पलानी में' और ऐसे अनेक गाने जिनका नाम तक नहीं लिया जा सकता। ये गाने बिहार के बसों , ट्रकों , सवारी गाड़ियों में , गाँव -गाँव में बजाय जाते है बिना किसी आपत्ति के। इससे आपके कल्चरल टेस्ट का पता चलता है। गुड्डू रंगीला , खेसारी आदि जैसे अनेक कलाकारों ने बिहार की इस मौजूदा छवि को गढ़ने में सबसे बड़ी भूमिका निभायी है। इन्हें कलाकार कहते हुए गर्दन शर्म से झुक जाता है। खेद है कि ऐसे कलाकार अबतक केवल बिहार में ही पैदा हो सके हैं, क्योंकि और किसी राज्य की संस्कृति अपने साथ इतना दुराचार करने की छूट नहीं दे सकती। जब से बिहार के गीत -संगीत की दुनिया पर इन अपसांस्कृतिक कलाकारों का कब्ज़ा हो गया है तब से बिहारी संस्कृति के कला निर्माताओं को हासिये पर फेंक दिया गया है। भारत शर्मा , भिखारी ठाकुर जैसे लोगों की चर्चा अब नहीं है। आपका पूरा युवा और वयस्क वर्ग इन्ही अप-सांस्कृतिक गानों पर झूम रहा है और प्रतिवाद का स्वर दूर दूर नहीं है। (यह आपके ही राज्य में सम्भव है कि लालू जैसा चोर मुख्यमंत्री दुबारा मुख्यमंत्री बनने की सोच सकता है , और जेल जाते समय अपनी पांचवी पास औरत को गद्दी पर बिठा सकता है।)
यह आपकी जागरूकता ही थी कि आपकी अस्मिता का प्रतिक शब्द ''बिहारी'' एक गाली बनने , मूर्खता का पर्याय बनने की ओर बढ़ता गया और आप चुप रहे , अपनी धुन में मस्त रहे। और यह उनकी अपनी संस्कृति ,कला, भाषा , साहित्य , राजनीति और साहित्य के प्रति जागरूकता ही थी कि वे विश्वभर में भद्रा समाज की संज्ञा प् गए। आपके यहाँ के लोगों द्वारा दी जाने वाली गालियों और किये जाने वाले व्यवहारों का अध्ययन कीजिये , शायद बंगाली शालीनता को समझने में सहूलियत मिल जाएगी। कुछ लोग कहाँ अच्छे नहीं होते और कुछ लोग कहाँ बुरे नहीं होते ! परन्तु यहाँ बात कुछ की नहीं , पुरे की है, क्योंकि समग्रता से ही किसी समाज की सांस्कृतिक पहचान बनती है। आपकी सामाजिक अस्मिता का जब भी सवाल उठेगा तो आपके पुरे समाज को समग्रता में ही पढ़ा जाएगा, और उसकी पहचान तय की जाएगी। गौर कीजिए कि क्यों आपको महाराष्ट्र , दिल्ली आदि से बार - बार प्रताड़ित किया जाता है ? क्यों हर जगह आपको गाली दी जाती है?बंगालियों को तो कहीं से भगाया नहीं जाता, बंगाली शब्द तो कहीं गाली के अर्थ में प्रयुक्त नहीं होता। बिहारी शब्द को यहाँ तक पहुचाने में किसकी भूमिका है ?अगर आप अपनी भाषा, अपनी संस्कृति , अपने समाजिक पहचान ,कला ,साहित्य और संगीत के प्रति जागरूक और सचेत होते तो आज यह नौबत नही आती।
याद कीजिए बंगाल को एक महत्वपूर्ण औद्योगिग नगरी बनाने में सर्वाधिक योगदान बिहारियों का है। '' राइट एक्शन डे' के दिन सुरहावर्दी के कहर से बंगालियों को बचाने वाले बिहारी ही थे। आज वही बिहारी बंगाल में अपनी कोई अच्छी पहचान क्यों नहीं बना पाये? बंगाल में आने वाले वे सबसे पहले प्रवासी थे। उनके बहुत बाद राजस्थानी यहाँ आए। आज बंगाल में उनकी पहचान देखिये और आप अपनी पहचान देखिये। कहाँ चूक गए आप ? दिल्ली हो या महाराष्ट्र , पंजाब हो या हरियाणा , सूरत हो या बंगाल ,इन्हे एक औद्योगिग केंद्र के रूप में विकसित करने का सबसे बड़ा श्रेय बिहारियों को ही जाता है। फिर भी हर जगह ये मुहाजिर बनकर क्यों रह गए हैं ? इन प्रश्नो के उत्तर हमें खोजने होंगे। यह महज़ पीड़ा का सवाल नहीं है , बल्कि क्षेत्रीय पहचान की जगह एक राष्ट्रीय पहचान की तलाश में निकली जाति का कहीं न पहुँच पाने की पीड़ा और कारणों का भी सवाल है। एक जाति जो अपनी क्षेत्रीय पहचान की जगह हमेसा राष्ट्रीय पहचान को अपने जीवन में तवज्जह दी आज बेपहचान बनकर रह गयी है। या फिर अपने माथे एक अपमानजनक पहचान लेकर घूम रही है, जो निकली थी भारत के इन बड़े शहरों को दुनिया में एक मज़बूत पहचान दिलाने ,वही आज दुनिया में अपनी पहचान एक पिछड़े और बेकार के रूप में बना बैठी। आखिर कैसे सम्भव हुआ यह सब? इसका उत्तर आपको बदलते राजनीतिक परिदृश्य और उसके फलस्वरूप बढ़ते क्षेत्रीय पहचान की जड़ों में जाकर मिलेगा। कारण चाहे जो भी हो , एक बात तो तय ही है कि आप चाहे राष्ट्रीय पहचान के जनूँ में या भारत को विश्व के सामने एक मजबूत पहचान दिलाने के रूप में अपने जिस क्षेत्रीय पहचान की बलि दी थी आज उसका बुरा परिणाम ही आपको भोगना पड़ रहा है।एक कारण यह भी है कि आप अपनी कला , संस्कृति, साहित्य ,संगीत , सामाजिक अस्मिता के प्रति हद से अधिक उदासीन थे , जिसका खामियाज़ा आज आप भुगत रहे हैं।
बंगाल में कोई नालंदा नहीं था। मगर वहां से हम अपनी यात्रा तय कर कहा पहुंचे हैं ? उन्होंने अपनी यात्रा हमसे बहुत बाद में शांति-निकेतन से शुरू की थी , और देखिये आज कहाँ पहुंचे है वे। हमारे यहाँ नाचना-गाना अच्छा नहीं माना जाता। क्यों ? नृत्य और संगीत को लेकर हमारे यहाँ क्या धरणा है ? हमारे यहाँ नाचने - गाने वालों को नचनिया -बजनिया की संज्ञा किस धरणा के तहत दी गयी ? क्या कलाकारों के लिए यह शब्द अपमान-जनक नहीं है? बंगाल में जिन लोगों को नृत्य-संगीत में अच्छी पहचान नहीं मिली ,जिसके लिए वे संघर्ष कर रहे थे तो अपनी जीविका के लिए और अपनी कला को ज़िंदा रखने के लिए, अपने अंदर के कलाकार को ज़िंदा रखने के लिए वे आर्केस्ट्रा और स्टेजों पर परफॉर्म करने लगे। मगर आपके यहाँ की संस्कृति में जब यही आर्केस्ट्रा वाले गए तब भी ये परफ़ॉर्मर के रूप में ही गए। मगर आपने वहां इसे रंडी का नाच नाम दिया। यह कला के प्रति आपके दृष्टिकोण का तो परिचायक है ही , साथ ही स्त्री के प्रति भी आपके दृष्टिकोण का परिचायक है। बंगाल में बैंड या आर्केस्ट्रा में जाकर कई अच्छी लड़कियां परफॉर्म करती थीं , इससे उनका जीविका भी चलता था या कुछ पैसा भी मिल जाता था और उनकी कला भी जीवित रहती थी। इसके लिए कही उनके साथ अभद्र व्यवहार नहीं किया जाता था। उन्हें इसके लिए कभी गलत निगाह से भी नहीं देखा गया। यहाँ के लोग कला का जितना सम्मान करना जानते हैं उतना ही स्त्री का भी। देख लीजिए जात्रा करने वाली स्त्रिओं के प्रति इनका दृष्टिकोण। आपके यहाँ जात्रा जैसी कोई चीज होती तो उसे भी रंडी -भडुआ का नाच का नाम दे दिया गया होता। दो संस्कृतियों के सामंजस्य का परस्पर प्रभाव भी पड़ता है। आज जात्रा वालों के प्रति बंगाल के दृष्टिकोण में जो थोड़ी -बहुत संकुचित नजरिये का समावेश हुआ है , वह आपके दृष्टिकोण का प्रभाव है। दूसरा कारण यह है कि आज इस में पैसा नहीं रह गया है, इनकी माली हालत खराब होने के कारण इनके प्रति लोगों के दृष्टिकोण में फर्क आया है। यहाँ लड़कियां अपने दोस्त या गार्जियन किसी के साथ भी जाकर किसी स्टेज या आर्केस्ट्रा में परफॉर्म कर आती थीं , कोई उसे गलत-वे में नहीं लेता था। मगर जब से यह(आर्केस्ट्रा ) आपके यहाँ गया इसका स्वरुप ही चेंज हो गया। वहां इसे रंडी के नाच में बदल दिया गया। तब से इसमें भद्र घर की लड़कियों ने परफॉर्म करना छोड़ दिया। आज आर्केस्ट्रा में कोई भी भद्र लड़की नही मिलेगी। अब तो बंगाल में आर्केस्ट्रा जैसी कोई चीज नहीं है। यहाँ आज भी बैंड हैं , स्टेज शो हैं , कालेजों में हर साल अच्छे अच्छे बंद आते हैं , लडकियाँ परफॉर्म करती हैं ,जरा आप अपने यहाँ के कालेजों का मुयायना कीजिए सच और फर्क दोनों सामने आ जायेगा। अब बिहार में ही आर्केस्ट्रा रह गया है जिसे रंडी के नाच के रूप में देखा जाताहै , अब इसमें या तो गरीब घर की लड़कियों को जबरदस्ती भगाकर ले जाकर मजबूर किया जाता है नाचने के लिए या बेश्याओं को ही ले जाया जाता है। जिन्हें न नृत्य की समझ है न संगीत की और न कला का कोई ज्ञान। क्योकि वह आपको चाहिए भी नही। आपको तो केवल नाच और गाने में सेक्स अपील चाहिए। आपके यहाँ लोग कहते हैं चल बाई जी (रंडी ) के नाच देखे। तब उसमें केवल सेक्स अपील देखने जाने की बात होती है। वहाँ पैसे दे देकर उन्हें बेहद अश्लील गानों पर नाचने के लिए कहा जाता है। यह बात जाहिर करती है कि नृत्य और संगीत की कैसी समझ है वहां। यहाँ नाच देखकर लोग कहते है बाह क्या डांस था, कितना अच्छा परफॉर्म की या किया । मगर आपके यहाँ ?खैर। आप अपने यहाँ के बुजुर्गों से बात कीजिए , वे बतायेगे आपको कि नृत्य क्या होता है। वे आज बाईजी या रंडी का भौड़ी नाच देखने नहीं जाते। वे याद करते हैं ,तिरहुत को , सोठी ब्रिज़ा-भाड़ के नृत्य को, वे याद करेंगे भिखारी ठाकुर के ज़माने को। उस समय लौंडा का ही नाच था , मगर देखने के बाद लोग दिनों तक चर्चा करते थे कि क्या नाच था , क्या बारीकी थी, क्या पकड़ और क्या ताल था। नाच और गाने की हर एक बारीकी पर , हर एक लय पर वे गंभीर चर्चा करते थे , तालमेल की भूरि-भूरि प्रशंसा करते थे। वहां से चले थे हम -- नृत्य -संगीत की एक बहुत अच्छी समझ के साथ। निर्गुण , पुरविया , बिरहा , सोरठा के गीतों को देख लीजिए , ये ठेंठ आपके यहाँ की उपज थे। आज कहाँ खो गयी यह परंपरा। कहाँ पहुंचे हैं आज आप ? अपनी ही बेहतरीन कलाओं के प्रति आज कौन सी समझ विकसित कर पाये हैं आप ? अपनी परम्परा से काटकर आप न आधुनिक हुए और न ही पारम्परिक। इन्ही भौड़ी समझ के कारण आप आज अपनी अस्मिता की पहचान एक गाली के रूप में विकसित किये है आप। उनके पास उनकी पारम्परिकता भी सुरक्षित है और वह शायद आपसे पुरानी भी नहीं है। घर -घर रविन्द्र संगीत बजता है। जात्रा के प्रति आज भी उनमें वही सम्मान है और आधुनिक नृत्य -संगीत का सम्मान -जनक स्थान भी उन्होंने हासिल किया है। आपके पास न आपकी वह पुरानी समृद्ध और सम्मान-जनक परम्परा है और न कला की आधुनिक पहचान। कला की आधुनिकता के नाम पर आपके पास है -- ''फार दम चोली '', चला हमरा पलानी में '' , आदि अनेक वल्गर गाने जो बड़े शान से आपके समाज में गाए जाते हैं और प्रतिवाद में आप चूँ भी नहीं बोलते। इसी पीड़ा के साथ अगर मैंने कह दिया कि '' काश मैं बंगाली होता '' तो आप इतना भड़कते क्यों हैं साहेब ? भड़किये मत , यह सोचिये कि जैसे राजस्थानी खाना , बंगाली खाना , पंजाबी खाना , गुजराती खाना मशहूर है , वैसे आपके पास खाने की भी कोई समझ है कि नही ! क्या लिट्टी-चोखा आपका प्रसिद्द खाना है ?क्या यह हर घर में रोज या अगर रोज नहीं तो सप्ताह के ४-५ दिन खाया जाता है ? क्या आपके यहाँ के बच्चे -बूढ़े , जवान , स्त्री-पुरुष सभी इसे चाव से खाते हैं या पसंद करते हैं ? अगर नहीं तो यह आपके यहाँ का प्रसिद्द डिश कैसे हो गया ? आपको अपने फेवरेट डिश के रूप में कुछ नहीं मिला तो अपने लिट्टी-चोखा को ही आगे कर दिया विश्व-जगत के सामने !यह बताता है कि आपके अपने संस्कृति के फेवरेट डिश की भी समझ नहीं है। बंधु ! आपकी संस्कृति में एक से बढ़कर एक बढ़िया खाने हैं , बस उन्हें सलीके से खाने का सलीका सीखिये। इनके यहाँ तो भोजन से भी अगाध प्रेम है। और मज़ेदार बात जानते हैं कि यह जो खाते हैं लगभग वही खाना आप भी खाते हैं , लगभग वही खाना मारवाड़ी भी खाते हैं । मगर उनकी थाली की चर्चा देश देश में है और जब आपसे आपकी संस्कृति का खाना पूछा जाता है तो किसी बेवकूफ की फैलाई बात सुनकर कह देते है की लिट्टी -चोखा। बंगाली अपने फेवरेट खाने में मच-भट का नाम नहीं लेते , मारवाड़ी भी जब कहते हैं राजस्थानी थाली तो किसी एक खाने का नाम नहीं लेते , बस एक थकी सामने कर देते हैं -- कायदे से सजाया हुआ , जिसमें चावल है , रायता है , रोटी है , दही है , चटनी और आचार है , दाल है और २-३ सब्जियां हैं। बंगाली की थाली में भी चावल, दाल, एक दो सब्जी , मछली और बेगुन बज या कोई न कोई १-२ प्रकार का भेजा रहेगा। सलीके से सजाया हुआ या एक के बाद एक खाना होता है। मजा ही अलग होता है इस बंगाली कजाने का। इनके खाने और खिलने का तरीका ऐसा है की जितना आप कहते हैं उससे अधिक जरूर खायेगा आप। पहले चावल देंगे थोड़ा दाल से खाइये, फिर थोड़ा भेजा से कहिये , फिर थोड़ा सब्जी से खाइए , फिर अब मछली के साथ खाइए। थोड़ा थोड़ा करते हुए ज्यादा खा लेते हैं आप और पता भी नही चलता। और हा खाने के बाद दही जरूर खिलाएंगे आपको। खाने में नींबू भी जरूर रहेगा। क्या ये सब चीजें आप नहीं खाते?फिर जब आपसे आपके यहाँ के फेवरेट खाने के बारे में पूछा गया तो अपने लिट्टी-चोखा का नाम क्यों लिया? आप भी कायदे से अपनी थाली सजाये होते और कह दिए होते की जनाब ये है हमारे यहाँ का खाना। मगर यह गलती आपसे इसलिए हुई क्योकि आप सलीके से खाना नहीं जानते थे। हाँ लिट्टी-चोखा और सतुआ भी आपके यहाँ का विशिष्ट खाद्य है जो की केवल यही मिलता है। और इसलिए इमके ज़िक्र तो होना ही चाहिए। मगर यह आपके रोजमर्रा का भोजन नहीं है। और हाँ इनके अलावे भी अपनी संस्कृति में अनेक ऐसे खाद्य हैं जो केवल उप और बिहार में ही मिलते हैं। आप हमारे यहाँ (बिहार) का मालपुआ खाइए , दुनिआ के सरे मालपुए भूल जाएंगे। आप हमारे यहन का रसिआव (गुड में बना खीर ) खाइए , बार बार खाने का मन करेगा। फुलौरी और छुरी (आलू चॉप ) भी हमारे यहाँ का मस्त होता है। ज़नाब अपने लापसी का नाम सुना है?और महुअर का? यह महुए के रास में आतें से बनता है। लाजवाब होता है खाने में। बिहार के सिवा उप केन संभवतः मिल सकता है फिर कहीं नहीं। ज़नाब आपकी समस्या यह नही है की आपके यहन क्या अछा है और क्या लाजवाब , आपकी समस्या यह है की आप इनके प्रति न संजीदा हैं न और न सचेत । इसीलिए जब भी आपसे कोईआपके प्रिय खाद्य के बारे में पूछता है तो आप बेवकूफाना अंदाज़ में कभी सतुआ का नाम लेते हैं तो कभी लिट्टी-चोखा का। आप शान से कहिये की हमारे यहाँ इतने विशिष्ट डिश है की सप्ताह -दर सप्ताह निकल जाएगा हमारे यहाँ के विशिष्ट खाद्य कहते कहते और आपका मन भी नही भरेगा। मक्के की रोटी और साग पंजाब के अलावे हमारे यहाँ लाजवाब बनते हैं। साग के साथ यहाँ के मड़ुए की रोटी खाइए या फिर दाल के साथ खाइए। यह बिहार के अलावे कहीं नही मिलेगा। हमारे यहाँ के साग भट का भी अलग आनंद है। बथुआ और कर्मी का साग हमारे यहाँ का ही फेमस है। कच्चे मटर का दाल जिसे बिहार में गद्दा कहा जाता है का लाजवाब सवाद देखिए। हमारे यहाँ एक और चीज फेमस है -- चोथा। वह क्या स्वाद , मन ही नहीं भरत। एक और विशिष्ट व्यंजन -- ढकनेसर। चवा का बनता है , दूध में सराबोर। खाके जीवन भर याद रखेंगे। ये सरे डिश ऐसे डिश हैं जो केवल बिहार में ही बनते हैं। ये बिहार के विशिष्ट व्यंजन हैं। ये नाम बहार वालों के लिए अजूबा हैं , क्योंकि अपने कभी इनका ज़िक्र ही नहीं किया, बस लिट्टी-चोखा तक सिमित रह गए। ज़नाब खोजिए , अपनी परंपरा में अपनी संस्कृति में बहुत कुछ विशिष्ट है , बहुत कुछ खश है , थोड़ा संजीदा होकर सोचिये और लोगो को बताइए। संजीदा होकर तलाशिये ,उसमें संगीत , नृत्य , कला , शिक्षा आदि की कई बारीकियां हैं जो केवल आपकी स्थानीय बारीकियां हैं , जो केवल इसलिए डैम तोड़ रहीं हैं की हम सब उसके प्रति गहरे रूप से उदासीन थे और अब भी हैं। बंगाल के संपर्क में आने के बाद हम में भशा और संस्कृति प्रेम के प्रति सजगता आई है , इसे यु ही अब बेकार नही जाने देना चाहिए। आइये एक बिहारी संस्कृति विकास मंच बनाया जय , जहाँ अपनी कला संस्कृति , साहित्य के उत्थान के लिए सम्मिलित प्रयास किया जाएगा। जहाँ से हमारी एक सममान जनक अस्मिता का निर्माण हो और ''बिहारी '' शब्द एक गली नहीं अपितु एक सम्मान का बोधक बन सके।
----- कुमार संकल्प ---
जे० सी० को पढ़ना अच्छा लगता है। वे लिखते भी बहुत अच्छा हैं। कुछ बुरा भी लिखते हैं । मगर उनके बुरे लेखन का मजा यह है कि आप असहमत होकर बहुत कुछ अच्छा सोचने लगते हैं , मतलब प्रतिक्रिया स्वरुप आपके मन में अनेक विचार जन्म लेते हैं। अतः उनके जिस लेखन को बुरा कहा जाता है वह बेचैनी पैदा करनेवाला लेखन है। बेचैनी पैदा करने वाला लेखन बुरा कैसे हो सकता है ?
लोकतंत्र में घोर विरोधियों के लिए भी स्थान होता है। ये बयान जितने सांप्रदायिक हैं उतने ही अलोकतांत्रिक।
कविता सच के ज़िंदा होने का सबूत है। वह कवि के रूप में सच कहने वालों के ज़िंदा होने का सबूत है। वह सबूत है इस बात का कि लाख लाख कोशिशों के बावजूद भी कोई तंत्र सच को दबा नहीं सकता
बंगाली नववर्ष के दिन मैंने एक पोस्ट डाली -- ''काश मैं बंगाली होता।'' मेरे कुछ मित्र भड़क गए। कुछ ने वहीँ प्रतिवाद किया , कुछ ने फ़ोन पर और कुछ मिलकर घंटों लड़ते रहे , बहस करते रहे। अच्छा लगा यह सोचकर कि अपने बिहारी होने पर और अपनी बिहारी अस्मिता पर इन्हें गर्व हो रहा है , यह गर्वबोध कुछ समय पहले तक नहीं था।यह बंगाली संस्कृति के प्रभाव का कामो-बेस नतीजा है। खेद इस बात का हो रह था कि इतनी अनुदारता के साथ कोई संस्कृति चिंतक कैसे हो सकता है, वह भी भारतीय संस्कृति का ? वे मेरे उपरोक्त पोस्ट पर ऐसे भड़क रहे थे जैसे मैंने ईसाई होने की बात कह दी हो ! किसी ने गुप्त जी को कोड करते हुए कहा कि उनसे अपनी संस्कृति पर गर्व करना सीखिये। अजीब हाल , अरे भाई ! गुप्त जी ने भारतीय संस्कृति की बात की है न कि बिहारी या अन्य क्षेत्रीय संस्कृति की ? क्या बंगाली संस्कृति भारतीय संस्कृति नहीं है ? और फिर मैं 15 सालों से बंगाल में हूँ , यह मेरी कर्मभूमि है और इसके प्रेम में मैं सर से पैर तक डूबा हुआ हूँ , तो वैसे ही मैं आधा बंगाली हूँ। फिर मैंने यहाँ का भाषा -प्रेम , संस्कृति -प्रेम , राजनीतिक जागरूकता , कला -सचेतनता , उत्सव-धर्मिता , प्रेम के प्रति अति-उदारता , जीवन की उन्मुक्तता , आधुनिक चेतना की गहरी समझ , जाती-विहीनता , रूढ़ि-विहीनता आदि को देखकर , अपनी निजी इच्छा जाहिर कर दी कि ''काश मैं बंगाली होता '' तो क्या गुनाह कर डाला ? मेरे बिहारी मित्रों क्या है आपकी बिहारी संस्कृति जरा बताएँगे ? क्या आपमें अपनी संस्कृति के प्रति वही प्रेम और जागरूकता दिखाई पड़ती है जो बंगाली-जाति में अपनी संस्कृति के प्रति है ? अपने पहनावे -ओढावे और भेष-भूषा के प्रति जितना वे सचेत हैं , आप हैं उतना सचेत? हालाँकि पहनावा व्यक्ति विशेष की रूचि पर निर्भर है, मगर अपनी संस्कृति का इसमें काफी गहरा योगदान होता है।
उन्हें उनके कुछ विशिष्ट गुणों के कारन लोग इन्हें बंगाली मोसाईं कहते हैं और आपको कोई बिहारी बाबू भी नहीं कहता। ''रे, बिहारी'' कहते हैं लोग। कभी आपने सोचा कि आपका बिहारी शब्द आज एक गली के रूप में क्यों प्रयुक्त होने लगा है ? अपनी किन कमियों के कारण आज लोग आपको बिहारी बाबू नहीं कहकर अपमान जनक अर्थ में 'रे बिहारी' कहने लगे हैं ?जब किसी को निचा दिखाना होता है या किसी मूर्खतापूर्ण काम की ओर संकेत करना होता है तो लोग कहते हैं 'साला बिहारी है ', ''अरे ,बिहारी होगा।'' जबकि किसी बुद्धिमनीवाले काम की ओर संकेत करने के लिए कहा जाता है , एइ तो बंगाली बुद्धि। '' आज जहाँ बंगाली बुद्धि बुद्धिमता का पर्याय बन गया है , वहीँ बिहारी बुद्धि मूर्खता का। आप जानते हैं यहाँ तक की जर्नी (यात्रा) आपने और उन्होंने एकदिन में तय नहीं की है। संस्कृति -प्रेम , भाषा-प्रेम , कला सचेतनता , राजनीतिक जागरूकता , नृत्य-संगीत के प्रति स्वस्थ -आग्रह , जीवन के प्रति उदारता , प्रेमपूर्ण- व्यवहार , आधुनिक-भावबोध आदि ढेरों चीजों ने उन्हें आज इस मोकाम तक पहुँचाया है। ''बोकाचोदा '' के अलावे बंगाली कोई गाली नहीं जानते थे। भद्रा-समाज या भद्रो-बंगाली की संज्ञा ऐसे ही नहीं उन्होंने हासिल कर ली। क्या आप में वही भाषा-प्रेम है जो उनमें है ? आप अपनी भाषा भोजपुरी बोलते हुए शर्माते हैं , जबकि उन्हें अपनी बांग्ला भाषा पर गर्व है। आज आपमें थोड़ी -बहुत अपनी भाषा के प्रति गर्वबोध पैदा हुआ है तो यह बहुत कुछ उनके संपर्क का नतीजा है। बिहार में रहने वाले या हरियाणा , मध्यप्रदेश , ओडिशा , पंजाब, दिल्ली आदि जगहों पर काम करने वाले भोजपुरी भाषी आज भी भोजपुरी बोलते शरमाते हैं। बंगाली आपसे जनसँख्या में कम हैं ,मगर उनका साहित्य प्रेम और भाषा-प्रेम देख लीजिये कि आज वे अपने साहित्य और भाषा को वहाँ तक पहुंचा दिए हैं, जहाँ कोई भाषा विश्व-साहित्य के मुकाबले खड़ी हो सके।
अब बांग्ला फिल्मों और गीतों की बात कर लीजिये। जहाँ बंगाल ने कई क्लासिकल फ़िल्में दीं ,गीत दिए वहीँ बिहार का योगदान इस क्षेत्र में अबतक नील है। बॉलीवुड में नदिया का पार बनी , बिहार में नहीं। अगर बिहार में बनती तो आज के बिहारी फिल्मों की तरह ही उलुल-जुलूल होती। फिल्मों की बात इस लिए कि यह तय करती है कि कला के प्रति आपका टेस्ट कैसा है।बिहार के भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में बनी तमाम फिल्मों और बिहार के गानो ने बिहारी शब्द को एक गाली में बदलने में काफी अहम भूमिका निभायी है। 'फार देम चोली' , 'एके छप्पन देवर बड़प्पन भिड़वले बा' , 'चल पलानी में' और ऐसे अनेक गाने जिनका नाम तक नहीं लिया जा सकता। ये गाने बिहार के बसों , ट्रकों , सवारी गाड़ियों में , गाँव -गाँव में बजाय जाते है बिना किसी आपत्ति के। इससे आपके कल्चरल टेस्ट का पता चलता है। गुड्डू रंगीला , खेसारी आदि जैसे अनेक कलाकारों ने बिहार की इस मौजूदा छवि को गढ़ने में सबसे बड़ी भूमिका निभायी है। इन्हें कलाकार कहते हुए गर्दन शर्म से झुक जाता है। खेद है कि ऐसे कलाकार अबतक केवल बिहार में ही पैदा हो सके हैं, क्योंकि और किसी राज्य की संस्कृति अपने साथ इतना दुराचार करने की छूट नहीं दे सकती। जब से बिहार के गीत -संगीत की दुनिया पर इन अपसांस्कृतिक कलाकारों का कब्ज़ा हो गया है तब से बिहारी संस्कृति के कला निर्माताओं को हासिये पर फेंक दिया गया है। भारत शर्मा , भिखारी ठाकुर जैसे लोगों की चर्चा अब नहीं है। आपका पूरा युवा और वयस्क वर्ग इन्ही अप-सांस्कृतिक गानों पर झूम रहा है और प्रतिवाद का स्वर दूर दूर नहीं है। (यह आपके ही राज्य में सम्भव है कि लालू जैसा चोर मुख्यमंत्री दुबारा मुख्यमंत्री बनने की सोच सकता है , और जेल जाते समय अपनी पांचवी पास औरत को गद्दी पर बिठा सकता है।)
यह आपकी जागरूकता ही थी कि आपकी अस्मिता का प्रतिक शब्द ''बिहारी'' एक गाली बनने , मूर्खता का पर्याय बनने की ओर बढ़ता गया और आप चुप रहे , अपनी धुन में मस्त रहे। और यह उनकी अपनी संस्कृति ,कला, भाषा , साहित्य , राजनीति और साहित्य के प्रति जागरूकता ही थी कि वे विश्वभर में भद्रा समाज की संज्ञा प् गए। आपके यहाँ के लोगों द्वारा दी जाने वाली गालियों और किये जाने वाले व्यवहारों का अध्ययन कीजिये , शायद बंगाली शालीनता को समझने में सहूलियत मिल जाएगी। कुछ लोग कहाँ अच्छे नहीं होते और कुछ लोग कहाँ बुरे नहीं होते ! परन्तु यहाँ बात कुछ की नहीं , पुरे की है, क्योंकि समग्रता से ही किसी समाज की सांस्कृतिक पहचान बनती है। आपकी सामाजिक अस्मिता का जब भी सवाल उठेगा तो आपके पुरे समाज को समग्रता में ही पढ़ा जाएगा, और उसकी पहचान तय की जाएगी। गौर कीजिए कि क्यों आपको महाराष्ट्र , दिल्ली आदि से बार - बार प्रताड़ित किया जाता है ? क्यों हर जगह आपको गाली दी जाती है?बंगालियों को तो कहीं से भगाया नहीं जाता, बंगाली शब्द तो कहीं गाली के अर्थ में प्रयुक्त नहीं होता। बिहारी शब्द को यहाँ तक पहुचाने में किसकी भूमिका है ?अगर आप अपनी भाषा, अपनी संस्कृति , अपने समाजिक पहचान ,कला ,साहित्य और संगीत के प्रति जागरूक और सचेत होते तो आज यह नौबत नही आती।
याद कीजिए बंगाल को एक महत्वपूर्ण औद्योगिग नगरी बनाने में सर्वाधिक योगदान बिहारियों का है। '' राइट एक्शन डे' के दिन सुरहावर्दी के कहर से बंगालियों को बचाने वाले बिहारी ही थे। आज वही बिहारी बंगाल में अपनी कोई अच्छी पहचान क्यों नहीं बना पाये? बंगाल में आने वाले वे सबसे पहले प्रवासी थे। उनके बहुत बाद राजस्थानी यहाँ आए। आज बंगाल में उनकी पहचान देखिये और आप अपनी पहचान देखिये। कहाँ चूक गए आप ? दिल्ली हो या महाराष्ट्र , पंजाब हो या हरियाणा , सूरत हो या बंगाल ,इन्हे एक औद्योगिग केंद्र के रूप में विकसित करने का सबसे बड़ा श्रेय बिहारियों को ही जाता है। फिर भी हर जगह ये मुहाजिर बनकर क्यों रह गए हैं ? इन प्रश्नो के उत्तर हमें खोजने होंगे। यह महज़ पीड़ा का सवाल नहीं है , बल्कि क्षेत्रीय पहचान की जगह एक राष्ट्रीय पहचान की तलाश में निकली जाति का कहीं न पहुँच पाने की पीड़ा और कारणों का भी सवाल है। एक जाति जो अपनी क्षेत्रीय पहचान की जगह हमेसा राष्ट्रीय पहचान को अपने जीवन में तवज्जह दी आज बेपहचान बनकर रह गयी है। या फिर अपने माथे एक अपमानजनक पहचान लेकर घूम रही है, जो निकली थी भारत के इन बड़े शहरों को दुनिया में एक मज़बूत पहचान दिलाने ,वही आज दुनिया में अपनी पहचान एक पिछड़े और बेकार के रूप में बना बैठी। आखिर कैसे सम्भव हुआ यह सब? इसका उत्तर आपको बदलते राजनीतिक परिदृश्य और उसके फलस्वरूप बढ़ते क्षेत्रीय पहचान की जड़ों में जाकर मिलेगा। कारण चाहे जो भी हो , एक बात तो तय ही है कि आप चाहे राष्ट्रीय पहचान के जनूँ में या भारत को विश्व के सामने एक मजबूत पहचान दिलाने के रूप में अपने जिस क्षेत्रीय पहचान की बलि दी थी आज उसका बुरा परिणाम ही आपको भोगना पड़ रहा है।एक कारण यह भी है कि आप अपनी कला , संस्कृति, साहित्य ,संगीत , सामाजिक अस्मिता के प्रति हद से अधिक उदासीन थे , जिसका खामियाज़ा आज आप भुगत रहे हैं।
बंगाल में कोई नालंदा नहीं था। मगर वहां से हम अपनी यात्रा तय कर कहा पहुंचे हैं ? उन्होंने अपनी यात्रा हमसे बहुत बाद में शांति-निकेतन से शुरू की थी , और देखिये आज कहाँ पहुंचे है वे। हमारे यहाँ नाचना-गाना अच्छा नहीं माना जाता। क्यों ? नृत्य और संगीत को लेकर हमारे यहाँ क्या धरणा है ? हमारे यहाँ नाचने - गाने वालों को नचनिया -बजनिया की संज्ञा किस धरणा के तहत दी गयी ? क्या कलाकारों के लिए यह शब्द अपमान-जनक नहीं है? बंगाल में जिन लोगों को नृत्य-संगीत में अच्छी पहचान नहीं मिली ,जिसके लिए वे संघर्ष कर रहे थे तो अपनी जीविका के लिए और अपनी कला को ज़िंदा रखने के लिए, अपने अंदर के कलाकार को ज़िंदा रखने के लिए वे आर्केस्ट्रा और स्टेजों पर परफॉर्म करने लगे। मगर आपके यहाँ की संस्कृति में जब यही आर्केस्ट्रा वाले गए तब भी ये परफ़ॉर्मर के रूप में ही गए। मगर आपने वहां इसे रंडी का नाच नाम दिया। यह कला के प्रति आपके दृष्टिकोण का तो परिचायक है ही , साथ ही स्त्री के प्रति भी आपके दृष्टिकोण का परिचायक है। बंगाल में बैंड या आर्केस्ट्रा में जाकर कई अच्छी लड़कियां परफॉर्म करती थीं , इससे उनका जीविका भी चलता था या कुछ पैसा भी मिल जाता था और उनकी कला भी जीवित रहती थी। इसके लिए कही उनके साथ अभद्र व्यवहार नहीं किया जाता था। उन्हें इसके लिए कभी गलत निगाह से भी नहीं देखा गया। यहाँ के लोग कला का जितना सम्मान करना जानते हैं उतना ही स्त्री का भी। देख लीजिए जात्रा करने वाली स्त्रिओं के प्रति इनका दृष्टिकोण। आपके यहाँ जात्रा जैसी कोई चीज होती तो उसे भी रंडी -भडुआ का नाच का नाम दे दिया गया होता। दो संस्कृतियों के सामंजस्य का परस्पर प्रभाव भी पड़ता है। आज जात्रा वालों के प्रति बंगाल के दृष्टिकोण में जो थोड़ी -बहुत संकुचित नजरिये का समावेश हुआ है , वह आपके दृष्टिकोण का प्रभाव है। दूसरा कारण यह है कि आज इस में पैसा नहीं रह गया है, इनकी माली हालत खराब होने के कारण इनके प्रति लोगों के दृष्टिकोण में फर्क आया है। यहाँ लड़कियां अपने दोस्त या गार्जियन किसी के साथ भी जाकर किसी स्टेज या आर्केस्ट्रा में परफॉर्म कर आती थीं , कोई उसे गलत-वे में नहीं लेता था। मगर जब से यह(आर्केस्ट्रा ) आपके यहाँ गया इसका स्वरुप ही चेंज हो गया। वहां इसे रंडी के नाच में बदल दिया गया। तब से इसमें भद्र घर की लड़कियों ने परफॉर्म करना छोड़ दिया। आज आर्केस्ट्रा में कोई भी भद्र लड़की नही मिलेगी। अब तो बंगाल में आर्केस्ट्रा जैसी कोई चीज नहीं है। यहाँ आज भी बैंड हैं , स्टेज शो हैं , कालेजों में हर साल अच्छे अच्छे बंद आते हैं , लडकियाँ परफॉर्म करती हैं ,जरा आप अपने यहाँ के कालेजों का मुयायना कीजिए सच और फर्क दोनों सामने आ जायेगा। अब बिहार में ही आर्केस्ट्रा रह गया है जिसे रंडी के नाच के रूप में देखा जाताहै , अब इसमें या तो गरीब घर की लड़कियों को जबरदस्ती भगाकर ले जाकर मजबूर किया जाता है नाचने के लिए या बेश्याओं को ही ले जाया जाता है। जिन्हें न नृत्य की समझ है न संगीत की और न कला का कोई ज्ञान। क्योकि वह आपको चाहिए भी नही। आपको तो केवल नाच और गाने में सेक्स अपील चाहिए। आपके यहाँ लोग कहते हैं चल बाई जी (रंडी ) के नाच देखे। तब उसमें केवल सेक्स अपील देखने जाने की बात होती है। वहाँ पैसे दे देकर उन्हें बेहद अश्लील गानों पर नाचने के लिए कहा जाता है। यह बात जाहिर करती है कि नृत्य और संगीत की कैसी समझ है वहां। यहाँ नाच देखकर लोग कहते है बाह क्या डांस था, कितना अच्छा परफॉर्म की या किया । मगर आपके यहाँ ?खैर। आप अपने यहाँ के बुजुर्गों से बात कीजिए , वे बतायेगे आपको कि नृत्य क्या होता है। वे आज बाईजी या रंडी का भौड़ी नाच देखने नहीं जाते। वे याद करते हैं ,तिरहुत को , सोठी ब्रिज़ा-भाड़ के नृत्य को, वे याद करेंगे भिखारी ठाकुर के ज़माने को। उस समय लौंडा का ही नाच था , मगर देखने के बाद लोग दिनों तक चर्चा करते थे कि क्या नाच था , क्या बारीकी थी, क्या पकड़ और क्या ताल था। नाच और गाने की हर एक बारीकी पर , हर एक लय पर वे गंभीर चर्चा करते थे , तालमेल की भूरि-भूरि प्रशंसा करते थे। वहां से चले थे हम -- नृत्य -संगीत की एक बहुत अच्छी समझ के साथ। निर्गुण , पुरविया , बिरहा , सोरठा के गीतों को देख लीजिए , ये ठेंठ आपके यहाँ की उपज थे। आज कहाँ खो गयी यह परंपरा। कहाँ पहुंचे हैं आज आप ? अपनी ही बेहतरीन कलाओं के प्रति आज कौन सी समझ विकसित कर पाये हैं आप ? अपनी परम्परा से काटकर आप न आधुनिक हुए और न ही पारम्परिक। इन्ही भौड़ी समझ के कारण आप आज अपनी अस्मिता की पहचान एक गाली के रूप में विकसित किये है आप। उनके पास उनकी पारम्परिकता भी सुरक्षित है और वह शायद आपसे पुरानी भी नहीं है। घर -घर रविन्द्र संगीत बजता है। जात्रा के प्रति आज भी उनमें वही सम्मान है और आधुनिक नृत्य -संगीत का सम्मान -जनक स्थान भी उन्होंने हासिल किया है। आपके पास न आपकी वह पुरानी समृद्ध और सम्मान-जनक परम्परा है और न कला की आधुनिक पहचान। कला की आधुनिकता के नाम पर आपके पास है -- ''फार दम चोली '', चला हमरा पलानी में '' , आदि अनेक वल्गर गाने जो बड़े शान से आपके समाज में गाए जाते हैं और प्रतिवाद में आप चूँ भी नहीं बोलते। इसी पीड़ा के साथ अगर मैंने कह दिया कि '' काश मैं बंगाली होता '' तो आप इतना भड़कते क्यों हैं साहेब ? भड़किये मत , यह सोचिये कि जैसे राजस्थानी खाना , बंगाली खाना , पंजाबी खाना , गुजराती खाना मशहूर है , वैसे आपके पास खाने की भी कोई समझ है कि नही ! क्या लिट्टी-चोखा आपका प्रसिद्द खाना है ?क्या यह हर घर में रोज या अगर रोज नहीं तो सप्ताह के ४-५ दिन खाया जाता है ? क्या आपके यहाँ के बच्चे -बूढ़े , जवान , स्त्री-पुरुष सभी इसे चाव से खाते हैं या पसंद करते हैं ? अगर नहीं तो यह आपके यहाँ का प्रसिद्द डिश कैसे हो गया ? आपको अपने फेवरेट डिश के रूप में कुछ नहीं मिला तो अपने लिट्टी-चोखा को ही आगे कर दिया विश्व-जगत के सामने !यह बताता है कि आपके अपने संस्कृति के फेवरेट डिश की भी समझ नहीं है। बंधु ! आपकी संस्कृति में एक से बढ़कर एक बढ़िया खाने हैं , बस उन्हें सलीके से खाने का सलीका सीखिये। इनके यहाँ तो भोजन से भी अगाध प्रेम है। और मज़ेदार बात जानते हैं कि यह जो खाते हैं लगभग वही खाना आप भी खाते हैं , लगभग वही खाना मारवाड़ी भी खाते हैं । मगर उनकी थाली की चर्चा देश देश में है और जब आपसे आपकी संस्कृति का खाना पूछा जाता है तो किसी बेवकूफ की फैलाई बात सुनकर कह देते है की लिट्टी -चोखा। बंगाली अपने फेवरेट खाने में मच-भट का नाम नहीं लेते , मारवाड़ी भी जब कहते हैं राजस्थानी थाली तो किसी एक खाने का नाम नहीं लेते , बस एक थकी सामने कर देते हैं -- कायदे से सजाया हुआ , जिसमें चावल है , रायता है , रोटी है , दही है , चटनी और आचार है , दाल है और २-३ सब्जियां हैं। बंगाली की थाली में भी चावल, दाल, एक दो सब्जी , मछली और बेगुन बज या कोई न कोई १-२ प्रकार का भेजा रहेगा। सलीके से सजाया हुआ या एक के बाद एक खाना होता है। मजा ही अलग होता है इस बंगाली कजाने का। इनके खाने और खिलने का तरीका ऐसा है की जितना आप कहते हैं उससे अधिक जरूर खायेगा आप। पहले चावल देंगे थोड़ा दाल से खाइये, फिर थोड़ा भेजा से कहिये , फिर थोड़ा सब्जी से खाइए , फिर अब मछली के साथ खाइए। थोड़ा थोड़ा करते हुए ज्यादा खा लेते हैं आप और पता भी नही चलता। और हा खाने के बाद दही जरूर खिलाएंगे आपको। खाने में नींबू भी जरूर रहेगा। क्या ये सब चीजें आप नहीं खाते?फिर जब आपसे आपके यहाँ के फेवरेट खाने के बारे में पूछा गया तो अपने लिट्टी-चोखा का नाम क्यों लिया? आप भी कायदे से अपनी थाली सजाये होते और कह दिए होते की जनाब ये है हमारे यहाँ का खाना। मगर यह गलती आपसे इसलिए हुई क्योकि आप सलीके से खाना नहीं जानते थे। हाँ लिट्टी-चोखा और सतुआ भी आपके यहाँ का विशिष्ट खाद्य है जो की केवल यही मिलता है। और इसलिए इमके ज़िक्र तो होना ही चाहिए। मगर यह आपके रोजमर्रा का भोजन नहीं है। और हाँ इनके अलावे भी अपनी संस्कृति में अनेक ऐसे खाद्य हैं जो केवल उप और बिहार में ही मिलते हैं। आप हमारे यहाँ (बिहार) का मालपुआ खाइए , दुनिआ के सरे मालपुए भूल जाएंगे। आप हमारे यहन का रसिआव (गुड में बना खीर ) खाइए , बार बार खाने का मन करेगा। फुलौरी और छुरी (आलू चॉप ) भी हमारे यहाँ का मस्त होता है। ज़नाब अपने लापसी का नाम सुना है?और महुअर का? यह महुए के रास में आतें से बनता है। लाजवाब होता है खाने में। बिहार के सिवा उप केन संभवतः मिल सकता है फिर कहीं नहीं। ज़नाब आपकी समस्या यह नही है की आपके यहन क्या अछा है और क्या लाजवाब , आपकी समस्या यह है की आप इनके प्रति न संजीदा हैं न और न सचेत । इसीलिए जब भी आपसे कोईआपके प्रिय खाद्य के बारे में पूछता है तो आप बेवकूफाना अंदाज़ में कभी सतुआ का नाम लेते हैं तो कभी लिट्टी-चोखा का। आप शान से कहिये की हमारे यहाँ इतने विशिष्ट डिश है की सप्ताह -दर सप्ताह निकल जाएगा हमारे यहाँ के विशिष्ट खाद्य कहते कहते और आपका मन भी नही भरेगा। मक्के की रोटी और साग पंजाब के अलावे हमारे यहाँ लाजवाब बनते हैं। साग के साथ यहाँ के मड़ुए की रोटी खाइए या फिर दाल के साथ खाइए। यह बिहार के अलावे कहीं नही मिलेगा। हमारे यहाँ के साग भट का भी अलग आनंद है। बथुआ और कर्मी का साग हमारे यहाँ का ही फेमस है। कच्चे मटर का दाल जिसे बिहार में गद्दा कहा जाता है का लाजवाब सवाद देखिए। हमारे यहाँ एक और चीज फेमस है -- चोथा। वह क्या स्वाद , मन ही नहीं भरत। एक और विशिष्ट व्यंजन -- ढकनेसर। चवा का बनता है , दूध में सराबोर। खाके जीवन भर याद रखेंगे। ये सरे डिश ऐसे डिश हैं जो केवल बिहार में ही बनते हैं। ये बिहार के विशिष्ट व्यंजन हैं। ये नाम बहार वालों के लिए अजूबा हैं , क्योंकि अपने कभी इनका ज़िक्र ही नहीं किया, बस लिट्टी-चोखा तक सिमित रह गए। ज़नाब खोजिए , अपनी परंपरा में अपनी संस्कृति में बहुत कुछ विशिष्ट है , बहुत कुछ खश है , थोड़ा संजीदा होकर सोचिये और लोगो को बताइए। संजीदा होकर तलाशिये ,उसमें संगीत , नृत्य , कला , शिक्षा आदि की कई बारीकियां हैं जो केवल आपकी स्थानीय बारीकियां हैं , जो केवल इसलिए डैम तोड़ रहीं हैं की हम सब उसके प्रति गहरे रूप से उदासीन थे और अब भी हैं। बंगाल के संपर्क में आने के बाद हम में भशा और संस्कृति प्रेम के प्रति सजगता आई है , इसे यु ही अब बेकार नही जाने देना चाहिए। आइये एक बिहारी संस्कृति विकास मंच बनाया जय , जहाँ अपनी कला संस्कृति , साहित्य के उत्थान के लिए सम्मिलित प्रयास किया जाएगा। जहाँ से हमारी एक सममान जनक अस्मिता का निर्माण हो और ''बिहारी '' शब्द एक गली नहीं अपितु एक सम्मान का बोधक बन सके।
----- कुमार संकल्प ---
जे० सी० को पढ़ना अच्छा लगता है। वे लिखते भी बहुत अच्छा हैं। कुछ बुरा भी लिखते हैं । मगर उनके बुरे लेखन का मजा यह है कि आप असहमत होकर बहुत कुछ अच्छा सोचने लगते हैं , मतलब प्रतिक्रिया स्वरुप आपके मन में अनेक विचार जन्म लेते हैं। अतः उनके जिस लेखन को बुरा कहा जाता है वह बेचैनी पैदा करनेवाला लेखन है। बेचैनी पैदा करने वाला लेखन बुरा कैसे हो सकता है ?
लोकतंत्र में घोर विरोधियों के लिए भी स्थान होता है। ये बयान जितने सांप्रदायिक हैं उतने ही अलोकतांत्रिक।
कविता सच के ज़िंदा होने का सबूत है। वह कवि के रूप में सच कहने वालों के ज़िंदा होने का सबूत है। वह सबूत है इस बात का कि लाख लाख कोशिशों के बावजूद भी कोई तंत्र सच को दबा नहीं सकता
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