दुस्समय के चक्र से लोहा लेती विमलेश की कविता '' एक देश और मरे हुए लोग''
विमलेश भाई को पढना मुझे अच्छा लगता है। इसके कई कारण हैं , लेकिन इन कई कारणों में कोई कारण निजी नहीं है। एक दिन मैं फेसबुक पर बैठा था कि विमलेश भाई ने एक लिंक भेजी और कहा --'' मेरी एक कविता है , पढ़िए। '' मैंने लिंक खोली, कविता थी, - 'एक देश और मरे हुए लोग'। एक लाइन के बाद दूसरी,दूसरी के बाद तीसरी, और फिर चौथी लाइन - जैसे जैसे मैं पढते गया कविता में डूबते गया , बल्कि यूँ कहें कि अपने समय की समस्त चुनौतियों , समस्याओं और बिडम्बनाओं से रु-ब -रू होते गया। न केवल रू-ब-रू होते गया बल्कि समय की चुनौतिओं से मुठभेड़ करती इस कविता की मुठभेड़ में शामिल होते गया। मुझे बार बार लगता है कि कविता पढ़ना अपने समय की चुनौतिओं से मुठभेड़ करना है , बशर्ते कि कविता वैसी हो , और यह कविता ऐसी ही है।
यह लेखक बाढ़ का लेखक नहीं है जो लेखन की बाढ़ के दौर में पैदा हुआ हो। इसकी कविता , कविताओं में निहित संवेदना एवं कविता का चिंतन-लोक बताता है कि इस कवि को अपने समय की कितनी गहरी समझ है और समय पर कितनी मजबूत पकड़। समस्याएं तो अनेक हैं , मगर उन्हें सहजता में पकड़ना और उन्हें सरल - व्यंगयात्मक ढंग से कुछ इस लहज़े में कहना कि समस्या का कारण एवं निवारण दोनों झलक उठे और आपके अंदर बैठी जड़ता यह कहते हुय्र टूटने लगे कि टूट , टूट तुमको टूटना ही था --बस इसी धक्के का तुम्हें इंतज़ार था।
यह कविता आज के लोकतंत्र में ध्वस्त होते मूल्यों की बतकही नहीं करती , वे तो बहुत पहले ही ध्वस्त हो चुके हैं , बल्कि यह तो पश्त होते आदमी की लाचारी के बहाने उसी के अंदर बची उर्ज़ा को सहेजकर लड़ने की ओर इशारा करती है कि अंतिम आशा भी बस तुम्हीं हो। जहाँ लोकतंत्र संपन्न और निति-निर्धारण करने वाले लोगों के हाथों का झुनझुना बन जाये और आम आदमी एकदम से लाचार नज़र आने लगे तो उसकी लाचारी दूर करने असमान से कोई देवता या फरिस्ता नहीं आयेगा , बल्कि उसी लाचार आदमी/नागरिक के भीतर बची ऊर्जा ही उसे वह ताकत देगी कि वह मौजूदा लोकतंत्र के मायने बदल कर रख देगी। यह कवि केवल उम्मीदों और सपनो का कवि नहीं है , संघर्षों से विकल्प तलासते , हिम्मत को हथियार बनाते कवियों का हौसला है यह कवि ।
कवि कविता की शुरुआत करते हुए ही कहता है --
'' एक हकीकत को कथा की तरह
और कथा को हकीकत की तरह
सुनिये भन्ते। ''
दरअसल कथा सुनने के बाद अलग से कुछ कहने की जरुरत नहीं बचती। आप सब जब एक बार इस कविता से गुजरेंगे तब देश और अपने समय की सारी भयानक त्रासदियों और विडम्बनाओं से मुठभेड़ करते हुए आगे बढ़ेंगे , अपनी मजबूरियों और कमजोरियों से रू-ब-रू होंगे और साथ ही कई वैकल्पिक सम्भावनाओं के द्वार से गुजरेंगे तब क्यों नहीं इस कविता से एकबार गुजरा जाये !
कविता की शुरुआत होती है कि एक आदमी राजा बनता है और मंत्रिओं का कुनबा उसे बधाई देता है और यहीं से कविता में हमारे समय का भयावह राजनितिक परिदृश्य खुलने लगता है ----
'' राजमाता ने राजा के सम्मान में आयोजन किया एक बड़े भोज का
खजाने के द्वार खोल दिए गए खूब मुर्ग -मसल्ल्म खाने -पीने की छिलबिल''
यह है आज का राजनितिक परिदृश्य। जीत के उन्माद और बधाई के भव्य प्रदर्शन के लिए देश के खजाने का बेरोक-टोक अपव्यय। देश की हर पोलिटिकल पार्टी यह करती है। मगर राजा थोडा सजग एवं संवेदनशील किस्म का है और उसमें देश के सपनों एवं जनता की उम्मीदों को खोजता हुआ कवि कहता है --
राजा पढ़ा -लिखा था सादगी पसंद थोडा पुराने ख्यालों वाला
इसलिए अपने देश के लिए
चाहता था कुछ करना कुछ ऐसा जो पहले किसी ने न किया हो
और गुलामी के बाद भी
जहाँ पहुंची नहीं थी रोशनियां वहाँ तक पहुँचाना चाहता था रोशनी
के कतरे
रोटी और दाल तो जरुर कम से कम ''
यहाँ कवि की दाल रोटी की उम्मीद लोकतंत्र में मिनिमम नागरिक अधिकारो की आवाज़ है, वैसी स्थिति में जहाँ सबकुछ आकाओं ने कब्जिया लिया है, जहाँ गरीब जनता के लिए कुछ नहींहै , वहाँ इतनी इंसानियत तो कम-से-कम बची रहे, फिर वहीं से हक़ की लड़ाई शुरू होगी। हर प्रधानमंत्री अपने पद की गरिमा एवं इतिहास में कुछ यादगार कर जाने की जरुरत को समझता है। मगर मरे हुए मंत्रिओं की फ़ौज़ उसे कुछ करने नहीं देती। राजा देखता है कि वह तो मरे हुए मंत्रिओं की फ़ौज़ से घिरा है ---
''यह सब तो ठीक लेकिन बहुत जल्दी ही इल्म हो गया राजा को
कि उसके चारों ओर मर चुके लोगों की जमात है
मरे हुए मंत्री मरे हुए कुनबों-संत्रियों के बीच उसे घुटन होती ''
यहाँ मर जाने का अर्थ है संवेदनाओं का मर जाना --
''राजा को आश्चर्य होता कि इतने सरे लोग मर कर भी खुश और सहज कैसे हैं ''
कवि की यह चिंता हमारे समय की सबसे बड़ी चिंता है। एकबार नीलकमल जी ने भी कहा था कि हम एक ऐसे समय में जी रहें हैं जहाँ खुश होने के लिए कुछ भी नही है फिर भी सभी खुश हैं। असल में पूंजीवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आप खुश तभी रह सकते हैं जब आप मर चुके हों। मारा हुआ व्यक्ति किसी भी बात या परिस्थिति से असहज फील नहीं करता। असहज फील करना आपके ज़िंदा रहने का बैरोमीटर है। कविता में यही वह स्पेस है जहाँ से कवी पूंजीवादी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के संचालक शक्तियों एवं नीतिओं की ओर इशारा करता है। पूंजीवादी नीतियां तभी फल-फूल सकती हैं जब असहज फील करने वाले लोग न हों। हर सिचुएशन में जो खुश रहना सिख जाये , वही इस व्यवस्था के लिए संजीवनी है या इस व्यवस्था का रक्त-कण है।
पूंजीवादी व्यवस्था आपको सिखाती है कि आपको हरहाल में खुश रहना है। मतलब यह कि पूंजीवादी व्यवस्था आपको जो देगी, उसे स्वीकारना होगा , जिधर ले जाना चाहेगी , उधर जाना होगा। इसीलिए वह लोकतंत्र के नाम पर एक पूंजीवादी लोकतान्त्रिक ढांचा गढ़ती है जिसकी सारी नीतियां पूंजीवादी शासन-व्यवस्था की नीतियां होती हैं जिन्हे लोकतंत्र के नाम पर आप पर थोपा जाता है। इस व्यवस्था को जीवित लोग नहीं चाहिए , अगर इस व्यवस्था के संचालकों को पता चल गया कि इसमें कोई जीवित व्यक्ति आ गया है तो उसपर इतना दबाव डाला जाता है कि वह भी मर जाये। शाम-दाम,दंड-भेद , आखिर ये नीतियां कब कम आएंगी ? लोभ देकर खरीदो , फिर भी न बीके तो ? तो देखिये कविता में --
''बात एक और हुयी इस बीच कि बहुत जल्द पता चल गया मंत्री
कुनबों को कि दरअसल जो राजा बना है
वह तो ज़िंदा है और मरी हुयी जनता के बीच पहुँचाना चाहता है
रोशनियां ''
यहाँ व्यंग्य दो-तरफा है। केवल मंत्रीगण ही नहीं मरे हैं , जनता भी मरी हुयी है। आखिर मंत्रीगण भी तो हमारे बीच से ही जाते है। एक बार बिपिन चन्द्र ने साम्प्रदायिकता के सन्दर्भ में ठीक ऐसी ही बात कही थी कि हमारा समाज जैसा होगा वैसी ही हमारी राजनीती और पुलिस भी होगी। नेहरु जी ने भी ठीक ऐसी ही बात कही थी। राजनितिक लोग जनता के बीच से ही उठकर गये है। अगर जनता नहीं मरी होती तो ज़िंदा राजा को मृत बना देने की साजिश में मरे हुए मंत्री कामयाब नहीं होते , उनकी साजिशें कामयाब नहीं होतीं --
''फिर तो साजिशें शुरू हुयीं और लम्बी चौड़ी ज़िरह के बाद बात जो
सामने आयी वह यह थी कि राजा को राजत्व और मौत में से
किसी एक को चुनना था ''
दरअसल कविता में यही वह स्पेस है जहाँ से जनता की सम्भावनाये खुलती हैं। यह स्पेस जनता को झकझोर देता है कि जीवित जनता के खिलाफ कोई साजिश नहीं कर सकता। और जीवित जनता के जीवित राजा के खिलाफ कोई षड़यंत्र सफल नहीं हो सकता। मगर कविता कल्पना को हकीकत कैसे मान सकती है ? समय के सच को तो उसे बयान करना ही है। और समय का सच है कि राजा राजत्व और मौत में से मौत को चुनता है और मृत मंत्रिओं की जमात में शामिल हो जाता है। तो राजा भी मुर्दों की जमात में शामिल हो गया , मतलब बेरोक-टोक हत्या, बलात्कार , भ्रष्टाचार और तमाम तरह के अन्याय और --
''जनता जिसकी अभ्यस्त थी बहुत पहले से ही
सिर्फ मुट्ठी भर जिन्दा लोग पसीजते रहेडर -डर कर बोलते रहे
जिसने भी बहुत अधिक उत्साह दिखाया उसे राजा के तंत्र ने
झट तब्दील कर दिया मुर्दे में ''
ज़िंदा लोगो को मुर्दे में बदलने की बड़ी रोचक तरकीब की खुलाशा करता है कवि । ज़िंदा लोगों को मुर्दों में बदलने के लिए राजा ने एक मशीन विदेश से मंगाई थी --
'' कहते हैं कि राजा ने एक विशेष आदेश जारी कर किसी दूसरे देश से
मंगाई थी एक मशीन
वहाँ के वैज्ञानिकों ने रात दिन मेहनत कर के
खास राजा के देश के लिए बनायीं थी वह मशीन
जो ज़िंदा लोगों को तुरंत मुर्दों में बदल सकती थी ''
यहाँ मशीन के बहाने , पश्चिमी बौद्धिक उपनिवेशवाद , सांस्कृतिक विमर्श , पूंजीवादी-उदारपुंजीवदी , अवारा पूंजी , उपभोक्तावाद एवं बेलगाम भोगवाद पर गहरी बहस है। उस मशीन पर कवि लम्बी टिप्पणी करता है जिसमे कवि -लेखक,कलाकार,समाज-सेवी और तरह तरह के ज़िंदा लोगों का मुर्दे में बदले जाने की बात है और अंत में तो कवि की वास्तविक चिंता प्रकट हो जाती है --
'' उस मशीन के जरिये युद्ध स्तर पर
पीढ़ियों की एक फेहरिस्त को बनाया गया मुर्दा ''
राज सत्ता लोकतंत्र में भी खानदानी सत्ता/राजसत्ता /सामंती सत्ता में तब्दील हो जाती है , जब केवल चहरे बदलते हैं और व्यवस्था में कोई तबदीली नहीं होती और शासन का ढंग पूर्वत ही बना रहता है , सबकुछ वैसा ही चलता रहता है--
'' वे खुश थे कि उनका शासन चलता रहेगा लगातार और कोई भी
उनकी सत्ता को दे नहीं पायेगा चुनौती ''
आखिर मुर्दे चुनौती कैसे देंगे ? और जो ज़िंदा हैं उन्हें मुर्दे में बदलने की मशीन लगा दी गयी है।
हालाँकि ऐसे भयानक दुस्समय में कवि सम्भावनाओं को तलाश ही लेता है और कहता है --
''लेकिन हर देश में और हर समय में ज़िंदा रहती हैं कुछ विलुप्त
मन ली गयीं प्रजातियां
वे छुप-छुप कर रहती हैं ज़िंदा और कुछ के पास तो जनमतः ही
होता है कवच -कुंडल और जिन्हें मर पाना कभी भी नहीं
रहा असान किसी भी तंत्र के लिए ''
और ऐसे ही लोगों की तलास में घूमता रहता है तंत्र। और ऐसे ही ज़िंदा लोगों में एक कवि प्रजाति का भी जीव है जो न जाने कहाँ -कहाँ भटकता रहता है मुर्दों को ज़िंदा करने का मंत्र ढूँढता हुआ। एक ऐसे ही कवि की कविता पर आज़ बहस हो रही है। मगर तंत्र क्या ऐसे किस्म के खतरनाक जीवों को ज़िंदा छोड़ेगा ? कवि भी माँर दिया जाता है। लेकिन वह मर कर भी अपनी कविता के रूप में हर बार ज़िंदा हो जाता है , और अकेले नहीं बल्कि कई लोगों को ज़िंदा करते हुए। यही है कविता का मर्म । कविता तात्कालिक भी होती है और हर आनेवाले कठिन समय में मुर्दों को ज़िंदा करती हुयी पुनः अपनी प्रासंगिकता अर्जित करती रहती है एवं कालजयी बनी रहती है।
कवी जनता है कि जिस दिन जिन्दा लोग राजा के किले पर हमला करेंगे तो मुर्दा राजा और उसकी मुर्दा फ़ौज ज्यादा देर तक टिक नही पायेगी ---
''राजा के किले पर हुआ हमला
ज़िंदा लोगों के सामने देर तक नहीं टिक पाये मुर्दे और उनकी मरी हुयी सेना ''
इसी सम्भावना के साथ कविता ख़त्म हो जानी चाहिए , मगर यह तो कविता का पहला बंद है और कायदे से तो कविता के पहले बंद को यहाँ ख़त्म होना ही चाहिए था इस सम्भावना के साथ। मगर नहीं। कवि जनता है कि इस सम्भावना के चलते जो व्यवस्था बनेगी उसको भी वह मशीन मुर्दों में बदल देगी।याद कीजिए सर्वेश्वर कि कविता भेड़िये जिसमें वे कहते है कि भेड़िया फिर लौट के आ सकते हैं । अतः कवि को तलाश है उस मशीन की जो ज़िन्दों को बड़ी तेज़ी से मुर्दों में बदलती जा रही है। मुर्दों में सम्भवनाएँ नही होती। अतः उस मशीन को नष्ट करना बहुत जरुरी है --
'' मुझे लगता है कि किसी भी कविता और कथा से जरुरी उस
खतरनाक मशीन का पता लगाना
और नष्ट करना है भन्ते। ''
और कवि इस लड़ाई में अकेले नहीं रहना चाहता , क्योंकि वह जनता है कि लड़ाइयां अकेले नहीं लड़ीं जातीं । इसलिए वह हम सभी को इसमें शामिल होने का आह्वान करता है ---
''क्या तुम मेरे साथ चलने को तयार हो भंते …… ?''
कुमार संकल्प
विमलेश भाई को पढना मुझे अच्छा लगता है। इसके कई कारण हैं , लेकिन इन कई कारणों में कोई कारण निजी नहीं है। एक दिन मैं फेसबुक पर बैठा था कि विमलेश भाई ने एक लिंक भेजी और कहा --'' मेरी एक कविता है , पढ़िए। '' मैंने लिंक खोली, कविता थी, - 'एक देश और मरे हुए लोग'। एक लाइन के बाद दूसरी,दूसरी के बाद तीसरी, और फिर चौथी लाइन - जैसे जैसे मैं पढते गया कविता में डूबते गया , बल्कि यूँ कहें कि अपने समय की समस्त चुनौतियों , समस्याओं और बिडम्बनाओं से रु-ब -रू होते गया। न केवल रू-ब-रू होते गया बल्कि समय की चुनौतिओं से मुठभेड़ करती इस कविता की मुठभेड़ में शामिल होते गया। मुझे बार बार लगता है कि कविता पढ़ना अपने समय की चुनौतिओं से मुठभेड़ करना है , बशर्ते कि कविता वैसी हो , और यह कविता ऐसी ही है।
यह लेखक बाढ़ का लेखक नहीं है जो लेखन की बाढ़ के दौर में पैदा हुआ हो। इसकी कविता , कविताओं में निहित संवेदना एवं कविता का चिंतन-लोक बताता है कि इस कवि को अपने समय की कितनी गहरी समझ है और समय पर कितनी मजबूत पकड़। समस्याएं तो अनेक हैं , मगर उन्हें सहजता में पकड़ना और उन्हें सरल - व्यंगयात्मक ढंग से कुछ इस लहज़े में कहना कि समस्या का कारण एवं निवारण दोनों झलक उठे और आपके अंदर बैठी जड़ता यह कहते हुय्र टूटने लगे कि टूट , टूट तुमको टूटना ही था --बस इसी धक्के का तुम्हें इंतज़ार था।
यह कविता आज के लोकतंत्र में ध्वस्त होते मूल्यों की बतकही नहीं करती , वे तो बहुत पहले ही ध्वस्त हो चुके हैं , बल्कि यह तो पश्त होते आदमी की लाचारी के बहाने उसी के अंदर बची उर्ज़ा को सहेजकर लड़ने की ओर इशारा करती है कि अंतिम आशा भी बस तुम्हीं हो। जहाँ लोकतंत्र संपन्न और निति-निर्धारण करने वाले लोगों के हाथों का झुनझुना बन जाये और आम आदमी एकदम से लाचार नज़र आने लगे तो उसकी लाचारी दूर करने असमान से कोई देवता या फरिस्ता नहीं आयेगा , बल्कि उसी लाचार आदमी/नागरिक के भीतर बची ऊर्जा ही उसे वह ताकत देगी कि वह मौजूदा लोकतंत्र के मायने बदल कर रख देगी। यह कवि केवल उम्मीदों और सपनो का कवि नहीं है , संघर्षों से विकल्प तलासते , हिम्मत को हथियार बनाते कवियों का हौसला है यह कवि ।
कवि कविता की शुरुआत करते हुए ही कहता है --
'' एक हकीकत को कथा की तरह
और कथा को हकीकत की तरह
सुनिये भन्ते। ''
दरअसल कथा सुनने के बाद अलग से कुछ कहने की जरुरत नहीं बचती। आप सब जब एक बार इस कविता से गुजरेंगे तब देश और अपने समय की सारी भयानक त्रासदियों और विडम्बनाओं से मुठभेड़ करते हुए आगे बढ़ेंगे , अपनी मजबूरियों और कमजोरियों से रू-ब-रू होंगे और साथ ही कई वैकल्पिक सम्भावनाओं के द्वार से गुजरेंगे तब क्यों नहीं इस कविता से एकबार गुजरा जाये !
कविता की शुरुआत होती है कि एक आदमी राजा बनता है और मंत्रिओं का कुनबा उसे बधाई देता है और यहीं से कविता में हमारे समय का भयावह राजनितिक परिदृश्य खुलने लगता है ----
'' राजमाता ने राजा के सम्मान में आयोजन किया एक बड़े भोज का
खजाने के द्वार खोल दिए गए खूब मुर्ग -मसल्ल्म खाने -पीने की छिलबिल''
यह है आज का राजनितिक परिदृश्य। जीत के उन्माद और बधाई के भव्य प्रदर्शन के लिए देश के खजाने का बेरोक-टोक अपव्यय। देश की हर पोलिटिकल पार्टी यह करती है। मगर राजा थोडा सजग एवं संवेदनशील किस्म का है और उसमें देश के सपनों एवं जनता की उम्मीदों को खोजता हुआ कवि कहता है --
राजा पढ़ा -लिखा था सादगी पसंद थोडा पुराने ख्यालों वाला
इसलिए अपने देश के लिए
चाहता था कुछ करना कुछ ऐसा जो पहले किसी ने न किया हो
और गुलामी के बाद भी
जहाँ पहुंची नहीं थी रोशनियां वहाँ तक पहुँचाना चाहता था रोशनी
के कतरे
रोटी और दाल तो जरुर कम से कम ''
यहाँ कवि की दाल रोटी की उम्मीद लोकतंत्र में मिनिमम नागरिक अधिकारो की आवाज़ है, वैसी स्थिति में जहाँ सबकुछ आकाओं ने कब्जिया लिया है, जहाँ गरीब जनता के लिए कुछ नहींहै , वहाँ इतनी इंसानियत तो कम-से-कम बची रहे, फिर वहीं से हक़ की लड़ाई शुरू होगी। हर प्रधानमंत्री अपने पद की गरिमा एवं इतिहास में कुछ यादगार कर जाने की जरुरत को समझता है। मगर मरे हुए मंत्रिओं की फ़ौज़ उसे कुछ करने नहीं देती। राजा देखता है कि वह तो मरे हुए मंत्रिओं की फ़ौज़ से घिरा है ---
''यह सब तो ठीक लेकिन बहुत जल्दी ही इल्म हो गया राजा को
कि उसके चारों ओर मर चुके लोगों की जमात है
मरे हुए मंत्री मरे हुए कुनबों-संत्रियों के बीच उसे घुटन होती ''
यहाँ मर जाने का अर्थ है संवेदनाओं का मर जाना --
''राजा को आश्चर्य होता कि इतने सरे लोग मर कर भी खुश और सहज कैसे हैं ''
कवि की यह चिंता हमारे समय की सबसे बड़ी चिंता है। एकबार नीलकमल जी ने भी कहा था कि हम एक ऐसे समय में जी रहें हैं जहाँ खुश होने के लिए कुछ भी नही है फिर भी सभी खुश हैं। असल में पूंजीवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आप खुश तभी रह सकते हैं जब आप मर चुके हों। मारा हुआ व्यक्ति किसी भी बात या परिस्थिति से असहज फील नहीं करता। असहज फील करना आपके ज़िंदा रहने का बैरोमीटर है। कविता में यही वह स्पेस है जहाँ से कवी पूंजीवादी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के संचालक शक्तियों एवं नीतिओं की ओर इशारा करता है। पूंजीवादी नीतियां तभी फल-फूल सकती हैं जब असहज फील करने वाले लोग न हों। हर सिचुएशन में जो खुश रहना सिख जाये , वही इस व्यवस्था के लिए संजीवनी है या इस व्यवस्था का रक्त-कण है।
पूंजीवादी व्यवस्था आपको सिखाती है कि आपको हरहाल में खुश रहना है। मतलब यह कि पूंजीवादी व्यवस्था आपको जो देगी, उसे स्वीकारना होगा , जिधर ले जाना चाहेगी , उधर जाना होगा। इसीलिए वह लोकतंत्र के नाम पर एक पूंजीवादी लोकतान्त्रिक ढांचा गढ़ती है जिसकी सारी नीतियां पूंजीवादी शासन-व्यवस्था की नीतियां होती हैं जिन्हे लोकतंत्र के नाम पर आप पर थोपा जाता है। इस व्यवस्था को जीवित लोग नहीं चाहिए , अगर इस व्यवस्था के संचालकों को पता चल गया कि इसमें कोई जीवित व्यक्ति आ गया है तो उसपर इतना दबाव डाला जाता है कि वह भी मर जाये। शाम-दाम,दंड-भेद , आखिर ये नीतियां कब कम आएंगी ? लोभ देकर खरीदो , फिर भी न बीके तो ? तो देखिये कविता में --
''बात एक और हुयी इस बीच कि बहुत जल्द पता चल गया मंत्री
कुनबों को कि दरअसल जो राजा बना है
वह तो ज़िंदा है और मरी हुयी जनता के बीच पहुँचाना चाहता है
रोशनियां ''
यहाँ व्यंग्य दो-तरफा है। केवल मंत्रीगण ही नहीं मरे हैं , जनता भी मरी हुयी है। आखिर मंत्रीगण भी तो हमारे बीच से ही जाते है। एक बार बिपिन चन्द्र ने साम्प्रदायिकता के सन्दर्भ में ठीक ऐसी ही बात कही थी कि हमारा समाज जैसा होगा वैसी ही हमारी राजनीती और पुलिस भी होगी। नेहरु जी ने भी ठीक ऐसी ही बात कही थी। राजनितिक लोग जनता के बीच से ही उठकर गये है। अगर जनता नहीं मरी होती तो ज़िंदा राजा को मृत बना देने की साजिश में मरे हुए मंत्री कामयाब नहीं होते , उनकी साजिशें कामयाब नहीं होतीं --
''फिर तो साजिशें शुरू हुयीं और लम्बी चौड़ी ज़िरह के बाद बात जो
सामने आयी वह यह थी कि राजा को राजत्व और मौत में से
किसी एक को चुनना था ''
दरअसल कविता में यही वह स्पेस है जहाँ से जनता की सम्भावनाये खुलती हैं। यह स्पेस जनता को झकझोर देता है कि जीवित जनता के खिलाफ कोई साजिश नहीं कर सकता। और जीवित जनता के जीवित राजा के खिलाफ कोई षड़यंत्र सफल नहीं हो सकता। मगर कविता कल्पना को हकीकत कैसे मान सकती है ? समय के सच को तो उसे बयान करना ही है। और समय का सच है कि राजा राजत्व और मौत में से मौत को चुनता है और मृत मंत्रिओं की जमात में शामिल हो जाता है। तो राजा भी मुर्दों की जमात में शामिल हो गया , मतलब बेरोक-टोक हत्या, बलात्कार , भ्रष्टाचार और तमाम तरह के अन्याय और --
''जनता जिसकी अभ्यस्त थी बहुत पहले से ही
सिर्फ मुट्ठी भर जिन्दा लोग पसीजते रहेडर -डर कर बोलते रहे
जिसने भी बहुत अधिक उत्साह दिखाया उसे राजा के तंत्र ने
झट तब्दील कर दिया मुर्दे में ''
ज़िंदा लोगो को मुर्दे में बदलने की बड़ी रोचक तरकीब की खुलाशा करता है कवि । ज़िंदा लोगों को मुर्दों में बदलने के लिए राजा ने एक मशीन विदेश से मंगाई थी --
'' कहते हैं कि राजा ने एक विशेष आदेश जारी कर किसी दूसरे देश से
मंगाई थी एक मशीन
वहाँ के वैज्ञानिकों ने रात दिन मेहनत कर के
खास राजा के देश के लिए बनायीं थी वह मशीन
जो ज़िंदा लोगों को तुरंत मुर्दों में बदल सकती थी ''
यहाँ मशीन के बहाने , पश्चिमी बौद्धिक उपनिवेशवाद , सांस्कृतिक विमर्श , पूंजीवादी-उदारपुंजीवदी , अवारा पूंजी , उपभोक्तावाद एवं बेलगाम भोगवाद पर गहरी बहस है। उस मशीन पर कवि लम्बी टिप्पणी करता है जिसमे कवि -लेखक,कलाकार,समाज-सेवी और तरह तरह के ज़िंदा लोगों का मुर्दे में बदले जाने की बात है और अंत में तो कवि की वास्तविक चिंता प्रकट हो जाती है --
'' उस मशीन के जरिये युद्ध स्तर पर
पीढ़ियों की एक फेहरिस्त को बनाया गया मुर्दा ''
राज सत्ता लोकतंत्र में भी खानदानी सत्ता/राजसत्ता /सामंती सत्ता में तब्दील हो जाती है , जब केवल चहरे बदलते हैं और व्यवस्था में कोई तबदीली नहीं होती और शासन का ढंग पूर्वत ही बना रहता है , सबकुछ वैसा ही चलता रहता है--
'' वे खुश थे कि उनका शासन चलता रहेगा लगातार और कोई भी
उनकी सत्ता को दे नहीं पायेगा चुनौती ''
आखिर मुर्दे चुनौती कैसे देंगे ? और जो ज़िंदा हैं उन्हें मुर्दे में बदलने की मशीन लगा दी गयी है।
हालाँकि ऐसे भयानक दुस्समय में कवि सम्भावनाओं को तलाश ही लेता है और कहता है --
''लेकिन हर देश में और हर समय में ज़िंदा रहती हैं कुछ विलुप्त
मन ली गयीं प्रजातियां
वे छुप-छुप कर रहती हैं ज़िंदा और कुछ के पास तो जनमतः ही
होता है कवच -कुंडल और जिन्हें मर पाना कभी भी नहीं
रहा असान किसी भी तंत्र के लिए ''
और ऐसे ही लोगों की तलास में घूमता रहता है तंत्र। और ऐसे ही ज़िंदा लोगों में एक कवि प्रजाति का भी जीव है जो न जाने कहाँ -कहाँ भटकता रहता है मुर्दों को ज़िंदा करने का मंत्र ढूँढता हुआ। एक ऐसे ही कवि की कविता पर आज़ बहस हो रही है। मगर तंत्र क्या ऐसे किस्म के खतरनाक जीवों को ज़िंदा छोड़ेगा ? कवि भी माँर दिया जाता है। लेकिन वह मर कर भी अपनी कविता के रूप में हर बार ज़िंदा हो जाता है , और अकेले नहीं बल्कि कई लोगों को ज़िंदा करते हुए। यही है कविता का मर्म । कविता तात्कालिक भी होती है और हर आनेवाले कठिन समय में मुर्दों को ज़िंदा करती हुयी पुनः अपनी प्रासंगिकता अर्जित करती रहती है एवं कालजयी बनी रहती है।
कवी जनता है कि जिस दिन जिन्दा लोग राजा के किले पर हमला करेंगे तो मुर्दा राजा और उसकी मुर्दा फ़ौज ज्यादा देर तक टिक नही पायेगी ---
''राजा के किले पर हुआ हमला
ज़िंदा लोगों के सामने देर तक नहीं टिक पाये मुर्दे और उनकी मरी हुयी सेना ''
इसी सम्भावना के साथ कविता ख़त्म हो जानी चाहिए , मगर यह तो कविता का पहला बंद है और कायदे से तो कविता के पहले बंद को यहाँ ख़त्म होना ही चाहिए था इस सम्भावना के साथ। मगर नहीं। कवि जनता है कि इस सम्भावना के चलते जो व्यवस्था बनेगी उसको भी वह मशीन मुर्दों में बदल देगी।याद कीजिए सर्वेश्वर कि कविता भेड़िये जिसमें वे कहते है कि भेड़िया फिर लौट के आ सकते हैं । अतः कवि को तलाश है उस मशीन की जो ज़िन्दों को बड़ी तेज़ी से मुर्दों में बदलती जा रही है। मुर्दों में सम्भवनाएँ नही होती। अतः उस मशीन को नष्ट करना बहुत जरुरी है --
'' मुझे लगता है कि किसी भी कविता और कथा से जरुरी उस
खतरनाक मशीन का पता लगाना
और नष्ट करना है भन्ते। ''
और कवि इस लड़ाई में अकेले नहीं रहना चाहता , क्योंकि वह जनता है कि लड़ाइयां अकेले नहीं लड़ीं जातीं । इसलिए वह हम सभी को इसमें शामिल होने का आह्वान करता है ---
''क्या तुम मेरे साथ चलने को तयार हो भंते …… ?''
कुमार संकल्प
No comments:
Post a Comment