' बाघ '( केदारनाथ सिंह ) का प्रतीकार्थ
समाज के प्रगतिशील तत्वों और मानव के उच्चतर मूल्यों को बचाने की चिंता ही कवि केदारनाथ सिंह के काव्य की केंद्रीय चिंता है। तीसरे सप्तक से अपनी पहचान कायम करनेवाले कवि केदारनाथ सिंह कविता में बिम्ब-विधान को लेकर काफी चर्चित रहे। ' बाघ' शीर्षक कविता उनकी सबसे लम्बी कविता है। यह 16 खण्डों में विभक्त है। प्रत्येक खण्ड स्वतंत्र भी हैं और परस्पर सम्बद्ध भी। इसका दसवाँ खण्ड एक स्वतंत्र कविता के रूप में ' अकाल में सारस' संग्रह में ' सड़क पर दिख गए कवि त्रिलोचन ' शीर्षक से भी संकलित है। ' बाघ ' के बारे में डॉ. नंदकिशोर नवल की टिप्पणी है -- '' अब तक केदार जी जिस मूल्य को उपलब्ध करने के लिए काव्य-रचना करते आरहे थे , यह कविता वस्तुतः उसी को ' बाघ ' के रूप में मूर्त वा प्रतीकीत करती है। '' (159 ) स्पष्ट है डॉ. नंदकिशोर नवल बाघ को कवि की रचनात्मक उपलब्धि और उसकी काव्य-यात्रा की उपलब्धि के रूप में देखते हैं।
बाघ केदारजी की कई कविताओं में आया है। यह बाघ उनके लिए भय या हिंसा का प्रतीक नहीं है। डॉ नंदकिशोर नवल ने लिखा है -- '' यह बाघ उनकी कविता में सौंदर्य का एक बहुत पूर्ण प्रतीक बनकर अपने पूरे बाघ-पन , इंसान-पन और सुन्दर-पन के साथ उपस्थित हुआ है। ''(159 ) अर्थात उनके हिसाब से बाघ यहाँ सौंदर्य , इंसानपन और सुंदरपन का प्रतीक है। वे इस बाघ की विशेषता को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि वह सबसे पहले एक बाघ है। अपने बाघपन में ही उसका बिम्ब सहज ग्राह्य हो पाता है। उसके बाद वह इंसानपन के प्रतीक के रूप में दाखिल होता है -- एक बेहद संवेदनशील इंसान के तौर पर जिसे शहर से इसलिए घृणा है कि यहाँ ' हार्दिकता' नहीं है , केवल औपचारिकता और व्यवसायिकता है।(160 ) यहीं अज्ञेय की 'सांप' कविता याद आती है , जिसमें शहर की इसी अमानवीय स्थिति की ओर ईशारा है। यह अनायास नहीं है कि बाघ को गाँव का ट्रैक्टर , खेत , अनाज के दाने और किसान-जीवन के तमाम बिम्ब अभिभूत करते हैं और दाने की तरह किसी गरीब की तसली में पकना चाहता है --
'' और खुदबखुद
एक बुढ़िया की बटुली में
पकने की इच्छा से
हो गया लाल ''
ऐसी इच्छा कोई बेहद संवेदनशील ही कर सकता है। इसलिए यहाँ बाघ कवि की समस्त रचनाशीलता के लक्ष्य का प्रतीक है। एक रचनाकार हमेसा जनसरोकार को अपनी रचना के केंद्र में रखता है। वह कभी दाना बनना चाहता है तो कभी अन्याय के विरुद्ध न्याय- शक्ति। इस रूप में बाघ मूल्यों का , जनवादी और मानवीय मूल्यों का प्रतीक है जिन्हें हर हल में बचाने की बेचैनी कवि में देखी जा सकती है।
बाघ को गाँव से विशेष लगाव है। वह बूढ़े बरगद , उसके नीचे सुस्ताते बटोही , विश्राम-आश्रित पक्षी को आत्मीय संवाद की स्थिति में पाता है।आज उनकी जगह संवादहीनता , व्यवहारिकता और बेगानापन घर करते गया है। यह कवि के अंदर का मूल्यबोध है कि जो एक समय के समाज के लिए सत्य था जो समय के ही प्रवाह में कहीं खोते चला गया उसे वह आज भी प्रासंगिक मानता है क्योंकि ऐसे मानवीय मूल्य बाजार द्वारा पूर्णतः ध्वस्त नहीं किये जा सकते , उन्हें बचाने की आकांक्षा हर कवि में होती है और वह उसके लिए तरह - तरह से संघर्षरत भी रहता है। लेकिन इसका कत्तई यह मतलब नहीं कि कवि अतीतजीवी या अतीत-मूल्यों के प्रति मोहासक्त होता है , बल्कि केवल इतना कि संवेदनशीलता बची रहे और बचे रहें सहज और जोड़ने वाले वे तमाम मूल्य ताकि युगों तक बची रहे इंसानियत। कवि परिवर्तन का पक्षधर होता है। उसे निरंतर वर्तमान या यथास्थितिवाद से बोरियत और चिढ़ होती है। कवि केदार जी भी 'पहाड़ का मस्तक फाड़कर' नदी लाना चाहते हैं अर्थात घोर जड़ता को भी तोड़कर परिवर्तन लाने की आकांक्षा और साहस उनमें है। यहाँ दुष्यंत की ग़ज़ल की पंक्तियाँ याद आती हैं --'' हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए / इस हिमालय से अब कोई गंगा निकलनी चाहिए। ''
'बाघ' केवल परिवर्तन और इंसानपन का ही प्रतीक नहीं है , वह सौंदर्यबोध का भी प्रतीक है। संसार में वह हिंसा का प्रतीक होते हुए भी कविता में वह हिंसा का प्रतिलोम रचता है। ऐसा नहीं कि कवि यहाँ आकर गांधीवादी हो गया है , बल्कि आतंकवाद , हिंसा आदि का प्रतिलोम रचना समय की अनिवार्य मांग है। इसलिए कवि बाघ को बच्चों का खिलौना बना देता है। उसका आशय रहा होगा कि हिंसा फैलानेवाले समाज को सुन्दर बनाने का कार्य करें -- हिंसा का मार्ग त्यागकर ! आतंक की जगह आनंद की सृष्टि करें, क्योंकि आतंक कभी जीवन-मूल्य नहीं बन सकता। यह कवि की आंतरिक इच्छा है ,मानवीय मूल्यों को स्थापित करने का उसका हाइपोथीसिस है , जिसे वह साकार होते देखना चाहता है। जरा सोचिये हिंसा का व्यापार करनेवाले अगर आनंद का सृजन करने लगें तो समाज कितना सुन्दर होगा ! हिंसा वाचिक एवं कायिक दोनों होती है। समाज इससे मुक्त होगा तब धरती की खूबसूरती का वह आलम होगा जो स्वर्ग से भी बेहतर होगा। यह है कवि का सौंदर्यबोध। यह अनायास नहीं है कि जब बाघ खरगोश के मुलायम रोओं को सहलाता है तब वह रक्त और मांस की खुशबू नहीं महसूस करता बल्कि कोमलता का आनंद महसूस करता है। आनंद ही हिंसा का प्रतिलोम हो सकता है जिसे रचने की कोशिश कवि यहाँ करता है। क्रंदन की जगह आनंद हो , यह तभी संभव है जब हिंसा का व्यापर करनेवाले आनंद का साधक बनें --जहाँ बाघ भी बच्चों का खिलौना बन जाये। जहाँ साम्राज्यवादी शक्तियाँ बच्चों के हाथ में बंदूक थमा रही हैं वही कवि द्वारा बाघ को बच्चों का खिलौना बना देने की कल्पना समाज को हिंसामुक्त बनाने की कल्पना है , मानवीय मूल्यों की स्थापना की कल्पना है। इस रूप में बाघ सौंदर्यबोध का एक नया प्रतिमान रचता है जो आतंकवाद के जड़ ज़माने के दौर में ही उसका प्रतिलोम बनकर उभरता है। यह कवि की फैंटसी हो सकती है , मगर इसकी आवश्यकता , प्रासंगिकता और अर्थवत्ता का अंदाज़ा तब होगा जब दंगों की श्रृंखला , "84' , '91', '92 -93 ' और आज तक के तमाम हिंसा और आतंक को ध्यान में रखा जाय। अतः कवि की साधना हिंसा के विरुद्ध आनंद की स्थापना की साधना है। बाघ यहाँ इसका भी प्रतीक है।
कविता में 'बाघ' मनुष्य का भी रूपक है। डॉ. नंदकिशोर नवल ने लिखा है कि '' यहाँ यह पूछा जा सकता है कि उसने (कवि ने ) सौंदर्यात्मक प्रतीक बनाने के लिए हरिण जैसे सुन्दर जानवर या किसी सुन्दर पक्षी को क्यों नहीं चुना ? इसका उत्तर यह है कि मनुष्य हरिण या किसी सुन्दर पक्षी की अपेक्षा बाघ से अधिक मिलता है -- स्वार्थी और हिंसक। ''(161 -162 ) मैं इसमें केवल इतना और जोड़ना चाहूंगा कि हिरण या अन्य सुन्दर पक्षी जहाँ पारम्परिक सौंदर्य और अभिजात्य सौंदर्य के प्रतिमान होते हैं , वहीं बाघ सौंदर्यबोध का एक एकदम नया प्रतिमान गढ़ता है। एक प्रगतिशील-जनवादी कवि का सौंदर्यबोध थोड़ा भिन्न तो होगा ही। प्रेमचंद ने प्रगतिशील- सौंदर्यबोध की जो कसौटी निर्मित की थी , उसी के अनुरूप सर्वेश्वर ने अपने काव्य का सौंदर्यबोध गढ़ते हुए लिखा था कि ''जब कोई आदमी भूख से लड़ने खड़ा हो जाता है / सुन्दर दिखने लगता है'' , और उसी सौंदर्यबोध की अगली कड़ी यहाँ 'बाघ' बनता है।
'बाघ' कहीं आशा का प्रतीक है तो कहीं निराशा का। इन दोनों के बीच कवि की अदम्य जिजीविषा कविता को अद्वितीयता प्रदान करती है --
'' दोस्तों, हमें जीना होगा
जीना होगा बाघ के साथ
और बाघ के बिना भी जीना होगा। ''
अतः कवि का सौंदर्यबोध उसकी जिजीविषा का भी प्रतीक है। एक बार केदार जी ने कहा था ---'' दुनिया को बदलना दुनिया को सुन्दर बनाने का ही दूसरा नाम है। कविता इसी गहरे अर्थ में दुनिया को बदलती है। वह हर बार शब्द के 'बेहद्दी मैदान' में असुंदर से लड़ती है और लहूलुहान सुन्दर को विनाश के जबड़ों से खींचकर बाहर लाती है। '' (पर्वग्रह -अंक -73 -74 )इस प्रकार केदार जी का सौंदयबोध विद्रोह का भी प्रतीक है। नंदकिशोर नवल ने केदार जी के सौंदर्यबोध के बारे में लिखा है कि वह विद्रोह सामाजिक परिवर्तन और क्रांति का पर्याय है। (164 ) खुद केदार जी ने एक कविता में लिखा है --- ठंढ से नहीं मरते शब्द / वे मर जाते हैं साहस की कमी से। ''
समाज के प्रगतिशील तत्वों और मानव के उच्चतर मूल्यों को बचाने की चिंता ही कवि केदारनाथ सिंह के काव्य की केंद्रीय चिंता है। तीसरे सप्तक से अपनी पहचान कायम करनेवाले कवि केदारनाथ सिंह कविता में बिम्ब-विधान को लेकर काफी चर्चित रहे। ' बाघ' शीर्षक कविता उनकी सबसे लम्बी कविता है। यह 16 खण्डों में विभक्त है। प्रत्येक खण्ड स्वतंत्र भी हैं और परस्पर सम्बद्ध भी। इसका दसवाँ खण्ड एक स्वतंत्र कविता के रूप में ' अकाल में सारस' संग्रह में ' सड़क पर दिख गए कवि त्रिलोचन ' शीर्षक से भी संकलित है। ' बाघ ' के बारे में डॉ. नंदकिशोर नवल की टिप्पणी है -- '' अब तक केदार जी जिस मूल्य को उपलब्ध करने के लिए काव्य-रचना करते आरहे थे , यह कविता वस्तुतः उसी को ' बाघ ' के रूप में मूर्त वा प्रतीकीत करती है। '' (159 ) स्पष्ट है डॉ. नंदकिशोर नवल बाघ को कवि की रचनात्मक उपलब्धि और उसकी काव्य-यात्रा की उपलब्धि के रूप में देखते हैं।
बाघ केदारजी की कई कविताओं में आया है। यह बाघ उनके लिए भय या हिंसा का प्रतीक नहीं है। डॉ नंदकिशोर नवल ने लिखा है -- '' यह बाघ उनकी कविता में सौंदर्य का एक बहुत पूर्ण प्रतीक बनकर अपने पूरे बाघ-पन , इंसान-पन और सुन्दर-पन के साथ उपस्थित हुआ है। ''(159 ) अर्थात उनके हिसाब से बाघ यहाँ सौंदर्य , इंसानपन और सुंदरपन का प्रतीक है। वे इस बाघ की विशेषता को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि वह सबसे पहले एक बाघ है। अपने बाघपन में ही उसका बिम्ब सहज ग्राह्य हो पाता है। उसके बाद वह इंसानपन के प्रतीक के रूप में दाखिल होता है -- एक बेहद संवेदनशील इंसान के तौर पर जिसे शहर से इसलिए घृणा है कि यहाँ ' हार्दिकता' नहीं है , केवल औपचारिकता और व्यवसायिकता है।(160 ) यहीं अज्ञेय की 'सांप' कविता याद आती है , जिसमें शहर की इसी अमानवीय स्थिति की ओर ईशारा है। यह अनायास नहीं है कि बाघ को गाँव का ट्रैक्टर , खेत , अनाज के दाने और किसान-जीवन के तमाम बिम्ब अभिभूत करते हैं और दाने की तरह किसी गरीब की तसली में पकना चाहता है --
'' और खुदबखुद
एक बुढ़िया की बटुली में
पकने की इच्छा से
हो गया लाल ''
ऐसी इच्छा कोई बेहद संवेदनशील ही कर सकता है। इसलिए यहाँ बाघ कवि की समस्त रचनाशीलता के लक्ष्य का प्रतीक है। एक रचनाकार हमेसा जनसरोकार को अपनी रचना के केंद्र में रखता है। वह कभी दाना बनना चाहता है तो कभी अन्याय के विरुद्ध न्याय- शक्ति। इस रूप में बाघ मूल्यों का , जनवादी और मानवीय मूल्यों का प्रतीक है जिन्हें हर हल में बचाने की बेचैनी कवि में देखी जा सकती है।
बाघ को गाँव से विशेष लगाव है। वह बूढ़े बरगद , उसके नीचे सुस्ताते बटोही , विश्राम-आश्रित पक्षी को आत्मीय संवाद की स्थिति में पाता है।आज उनकी जगह संवादहीनता , व्यवहारिकता और बेगानापन घर करते गया है। यह कवि के अंदर का मूल्यबोध है कि जो एक समय के समाज के लिए सत्य था जो समय के ही प्रवाह में कहीं खोते चला गया उसे वह आज भी प्रासंगिक मानता है क्योंकि ऐसे मानवीय मूल्य बाजार द्वारा पूर्णतः ध्वस्त नहीं किये जा सकते , उन्हें बचाने की आकांक्षा हर कवि में होती है और वह उसके लिए तरह - तरह से संघर्षरत भी रहता है। लेकिन इसका कत्तई यह मतलब नहीं कि कवि अतीतजीवी या अतीत-मूल्यों के प्रति मोहासक्त होता है , बल्कि केवल इतना कि संवेदनशीलता बची रहे और बचे रहें सहज और जोड़ने वाले वे तमाम मूल्य ताकि युगों तक बची रहे इंसानियत। कवि परिवर्तन का पक्षधर होता है। उसे निरंतर वर्तमान या यथास्थितिवाद से बोरियत और चिढ़ होती है। कवि केदार जी भी 'पहाड़ का मस्तक फाड़कर' नदी लाना चाहते हैं अर्थात घोर जड़ता को भी तोड़कर परिवर्तन लाने की आकांक्षा और साहस उनमें है। यहाँ दुष्यंत की ग़ज़ल की पंक्तियाँ याद आती हैं --'' हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए / इस हिमालय से अब कोई गंगा निकलनी चाहिए। ''
'बाघ' केवल परिवर्तन और इंसानपन का ही प्रतीक नहीं है , वह सौंदर्यबोध का भी प्रतीक है। संसार में वह हिंसा का प्रतीक होते हुए भी कविता में वह हिंसा का प्रतिलोम रचता है। ऐसा नहीं कि कवि यहाँ आकर गांधीवादी हो गया है , बल्कि आतंकवाद , हिंसा आदि का प्रतिलोम रचना समय की अनिवार्य मांग है। इसलिए कवि बाघ को बच्चों का खिलौना बना देता है। उसका आशय रहा होगा कि हिंसा फैलानेवाले समाज को सुन्दर बनाने का कार्य करें -- हिंसा का मार्ग त्यागकर ! आतंक की जगह आनंद की सृष्टि करें, क्योंकि आतंक कभी जीवन-मूल्य नहीं बन सकता। यह कवि की आंतरिक इच्छा है ,मानवीय मूल्यों को स्थापित करने का उसका हाइपोथीसिस है , जिसे वह साकार होते देखना चाहता है। जरा सोचिये हिंसा का व्यापार करनेवाले अगर आनंद का सृजन करने लगें तो समाज कितना सुन्दर होगा ! हिंसा वाचिक एवं कायिक दोनों होती है। समाज इससे मुक्त होगा तब धरती की खूबसूरती का वह आलम होगा जो स्वर्ग से भी बेहतर होगा। यह है कवि का सौंदर्यबोध। यह अनायास नहीं है कि जब बाघ खरगोश के मुलायम रोओं को सहलाता है तब वह रक्त और मांस की खुशबू नहीं महसूस करता बल्कि कोमलता का आनंद महसूस करता है। आनंद ही हिंसा का प्रतिलोम हो सकता है जिसे रचने की कोशिश कवि यहाँ करता है। क्रंदन की जगह आनंद हो , यह तभी संभव है जब हिंसा का व्यापर करनेवाले आनंद का साधक बनें --जहाँ बाघ भी बच्चों का खिलौना बन जाये। जहाँ साम्राज्यवादी शक्तियाँ बच्चों के हाथ में बंदूक थमा रही हैं वही कवि द्वारा बाघ को बच्चों का खिलौना बना देने की कल्पना समाज को हिंसामुक्त बनाने की कल्पना है , मानवीय मूल्यों की स्थापना की कल्पना है। इस रूप में बाघ सौंदर्यबोध का एक नया प्रतिमान रचता है जो आतंकवाद के जड़ ज़माने के दौर में ही उसका प्रतिलोम बनकर उभरता है। यह कवि की फैंटसी हो सकती है , मगर इसकी आवश्यकता , प्रासंगिकता और अर्थवत्ता का अंदाज़ा तब होगा जब दंगों की श्रृंखला , "84' , '91', '92 -93 ' और आज तक के तमाम हिंसा और आतंक को ध्यान में रखा जाय। अतः कवि की साधना हिंसा के विरुद्ध आनंद की स्थापना की साधना है। बाघ यहाँ इसका भी प्रतीक है।
कविता में 'बाघ' मनुष्य का भी रूपक है। डॉ. नंदकिशोर नवल ने लिखा है कि '' यहाँ यह पूछा जा सकता है कि उसने (कवि ने ) सौंदर्यात्मक प्रतीक बनाने के लिए हरिण जैसे सुन्दर जानवर या किसी सुन्दर पक्षी को क्यों नहीं चुना ? इसका उत्तर यह है कि मनुष्य हरिण या किसी सुन्दर पक्षी की अपेक्षा बाघ से अधिक मिलता है -- स्वार्थी और हिंसक। ''(161 -162 ) मैं इसमें केवल इतना और जोड़ना चाहूंगा कि हिरण या अन्य सुन्दर पक्षी जहाँ पारम्परिक सौंदर्य और अभिजात्य सौंदर्य के प्रतिमान होते हैं , वहीं बाघ सौंदर्यबोध का एक एकदम नया प्रतिमान गढ़ता है। एक प्रगतिशील-जनवादी कवि का सौंदर्यबोध थोड़ा भिन्न तो होगा ही। प्रेमचंद ने प्रगतिशील- सौंदर्यबोध की जो कसौटी निर्मित की थी , उसी के अनुरूप सर्वेश्वर ने अपने काव्य का सौंदर्यबोध गढ़ते हुए लिखा था कि ''जब कोई आदमी भूख से लड़ने खड़ा हो जाता है / सुन्दर दिखने लगता है'' , और उसी सौंदर्यबोध की अगली कड़ी यहाँ 'बाघ' बनता है।
'बाघ' कहीं आशा का प्रतीक है तो कहीं निराशा का। इन दोनों के बीच कवि की अदम्य जिजीविषा कविता को अद्वितीयता प्रदान करती है --
'' दोस्तों, हमें जीना होगा
जीना होगा बाघ के साथ
और बाघ के बिना भी जीना होगा। ''
अतः कवि का सौंदर्यबोध उसकी जिजीविषा का भी प्रतीक है। एक बार केदार जी ने कहा था ---'' दुनिया को बदलना दुनिया को सुन्दर बनाने का ही दूसरा नाम है। कविता इसी गहरे अर्थ में दुनिया को बदलती है। वह हर बार शब्द के 'बेहद्दी मैदान' में असुंदर से लड़ती है और लहूलुहान सुन्दर को विनाश के जबड़ों से खींचकर बाहर लाती है। '' (पर्वग्रह -अंक -73 -74 )इस प्रकार केदार जी का सौंदयबोध विद्रोह का भी प्रतीक है। नंदकिशोर नवल ने केदार जी के सौंदर्यबोध के बारे में लिखा है कि वह विद्रोह सामाजिक परिवर्तन और क्रांति का पर्याय है। (164 ) खुद केदार जी ने एक कविता में लिखा है --- ठंढ से नहीं मरते शब्द / वे मर जाते हैं साहस की कमी से। ''
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