साथी , अपने बारे में क्या बताना .बस थोड़ी- सी बातें यूँ ही कह रहा हूँ. बिहार प्रान्त के सीवान जिले के एक छोटे से गाँव रतौली में मेरा जन्म वसंत पंचमी (सरस्वती पूजा )के दिन पता नहीं किस सन में हुआ था . मेरे दादाजी और स्कूल के इंग्लिश टीचर मौलवी साहब ने मेरी जन्मतिथि १५ जून १९८४ स्कूल के रजिस्टर में दर्ज कर दी .तबसे वही मान्य है.आदर्श राजकीय मध्य विद्यालय बिठुना ,जो मेरे घर से आधे किलोमीटर की दूरी पर है ,वही मेरी प्रारंभिक शिक्षा शुरू हुई .
स्कूल के दिनों की यादें आज भी ताज़ी हैं . डेढ़ से दो बजे तक आधे घंटे की टिफिन होती.मेरा एक दोस्त था चंद्रभूषण सिंह .(पता नहीं आजकल कहा है,वह मैट्रिक के बाद ही पढाई छोड़ दिया था.) करीब हम छः -सात दोस्त जिसमे वह भी रहता था ,स्कूल के पीछे लगभग दस मिनट की दुरी पर उसके एक बीघा वाले चने के खेत में चले जाते और कच्चे चने उखाड़ कर खूब खाते.चूकी खेत उसी का था सो उतना डर नहीं था ,मगर उसके पिताजी के आने का डर लगा रहता .आखिर किसी ने एक दिन देख लिया.हमलोग खेत में तो नहीं पकडे गए ,मगर हेडमास्टर ने स्कूल में हमसब की खूब धुलाई की.बेचारा चंद्रभूषण तो अपने पिताजी के हाथों भी घर पर खूब पीटा गया.आज भी इस घटना की मधुर यादें स्कूल लाईफ़ में लौट जाने के लिए विवश कराती हैं .
हमारे स्कूल के पीछे एक पोखरा था .गरमी के दिनों में अक्सर हमलोग पोखरे के भिंडे पर बैठ कर ढंडी हवाएं खाया करते.जड़े के दिनों में स्कूल के पीछे कब्बडी खेला करते .कुछलोग सुल के आगे के फिल्ड में भी खेलते.स्कूल बिल्डिंग के दो भाग थे.मिडिल के पीछे पोखर था और प्राइमरी के पीछे जंगल . यह जंगल इतना शानदार था की इसकी अपनी अलग खूबसूरती थी.अन्दर जाने का एक ही द्वार था. अन्दर चले गए लोग बहार से नहीं दीखते .इसकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसके निचे पानी था.जिसको बैठना होता वह केवले के फुल कि तथा अन्य पेड़ों कि डालियों पर ही बैठ सकता था .डालियाँ कुछ इस तरह थीं कि उसपर दस-पंद्रह लोग आराम से बैठ सकते थे .अक्सर हम दस-पंद्रह लड़के -लड़की यही अपना टिफिन करते और अन्ताकछरी खेलते.
एक और रोचक प्रसंग .हमारे एक साइंस टीचर थे-दीनानाथ प्रसाद.बहुत पढ़े और बहुत नोबुल,बहुत अछे ,बहुत सीधे.हमारे इंग्लिश टीचर लियाकत अली उन्हें सोल्टी गाड़ी कहकर चिढाया करते .उनके देखा-देखी कुछ बच्चे भी दबे मुंह कहा करते .सहनशीलता कि प्रतिमूर्ति थे वे.मगर कभी- कभी सब्र का बांध टूट जाता और मौलवी साहब (लियाकत अली)को बहुत भला-बुरा सुनना पड़ता.मौलवी साहब तो चिढाने के लिए ही यह सब करते.दीनानाथ बाबु का घर स्कूल से लगभग 40 किलोमीटर कि दुरी पर था.इसलिए वे स्कूल से 4 -5 किलोमीटर कि दुरी पर डेरा लेकर रहते थे.खाना खुद बनाते थे . कभी-कभी देर होने कि वजह से माड़-भात खाकर ही आ जाते और अपने कलीग्स से कह देते कि आज तो देरी हो रही थी तो माड़ -भात खाकर ही चला आया.मौलवी साहब को मंत्र मिल जाता .अब वे रोज पूछते कि "क्या जी अजो माडे -भात पर कम चल गया क्या?"सोल्टी जी चिढ जाते और कहते कि "आपके पास सोचने के लिए और कुछ है कि नही.पढ़ाने आते हैं कि तमासा करने."कभी -कभी मजाक का यह सिलसिला इतना भयानक रूप धारण कर लेता कि दीनानाथ बाबू काफी दुखी हो जाते और हेडमास्टर से अपनी ट्रांसफर की मांग करते नहीं रिजाइन देने की बात करते.एक बार होली का त्यौहार था .मौलवी साहब रंग लाकर उनकी साईकिल की सीट ,हैंडल ,यहाँ तक कि पैडिल पर भी रंग लगा दिया.जब शाम को दीननाथ बाबू ने एक बच्चे से पीने के लिए पानी मंगाया तो रास्ते में मौलवी साहब ने पानी के ग्लास में रंग डाल दिया.एक घूंट पीने के बाद पानी का स्वाद थोडा तीखा लगा, तब उन्होंने देखा कि पानी में रंग है.अब वही ग्लास लेकर दौड़ पड़े मौलवी साहब पर डालने. आगे -आगे मौलवी साहब भाग रहें हैं और पीछे-पीछे दीनानाथ बाबू.काफी देर यह भाग -दौड़ चली.सारे टीचर हँसते रहे सारे बच्चे हँसते रहे गांव के लोग भी.अंत में मौलवी साहब पर रंग पड़ा .मगर मौलवी साहब मुस्कुरा रहे थे कि अच्छा जब साईकिल पर चढ़ेंगे तब पता चलेगा.दीनानाथ बाबू जब साईकिल पर चढ़े तो हाथ और धोती दोनों लाल.फिर हंसी का एक फवारा,लेकिन मालवी साहब हँसते हुए तेज़ गति से साईकिल चलाते निकल गए .इस प्रकार ढेरो हंसी- मजाक के प्रसंग हैं .
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