Saturday, November 20, 2010

शहर, जहाँ अपना गावं छोड़कर हम बसते हैं.गावं स्वप्नभूमि है और शहर कर्मभूमि .एक कर्मस्थली है तो दूसरी प्रेरणा-स्थली .दोनों को त्यागना संभव नहीं है .शहरी जीवन की नीरसता को गावं की याद सरसता से भर देती है.साथी  शहर में गावं को जीना आसन तो नहीं मगर नामुमकिन भी नहीं है.हम सब गवंही(गावं से आए )मिलकर अपने शहर में अक गावं बना सकते हैं और एक लोकसंस्कृति विकसित कर सकते हैं,अपने लिए ,अपने सहज जीवन के लिए और शहरी अपसंस्कृति के बरक्स एक मजबूत जीवन संस्कृति विकसित करने के लिए .इस ब्लॉग का नाम साथी गावं चलें रखने के पीछे यही सोच थी.  

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