Saturday, January 29, 2011

भावनाएं (मेरी कविताएँ )

  1. तुम्हारे लिए -१
अपनों के बीच तुम क्या जानो कैसे रहता हूँ,
अपने अपनों में बेगानों में भी अपना रहता हूँ .
सताने वालों  की क्या मर्ज़ी मैं   क्या   जानूँ ,
मैं तो दिल खोल सबको गले लगाना चाहता हूँ .
अपने पास रखें नफ़रत वाले  अपनी नफ़रत,
मैं तो प्रेम की दुनिया बसाना चाहता हूँ .
विश्वास नहीं तो आगे क्या कहूँ ,
मैं तो अपनी जिंदगी तुम पर लुटाना चाहता हूँ .
ऐ मेरे देश इन दरिंदों के हवाले तुझे कैसे कर दूँ ,
मैं तो देश से इन दरिंदों को मिटाना चाहता हूँ .
कहने के लिए केवल बात नहीं करता  ,
मैं तो तुम्हें दिल से अपनाना चाहता हूँ .
मानो  या न मानो , मेरी दुनिया तुम तक जाती है,
मैं  तो अपने आपको तुम पर मिटाना चाहता हूँ .

  1. अपनों के लिए
एक पंछी आकाश में उड़ रहा था
ऊँचे आकाश में उड़ने का हौसला और प्रेरणा
उसे अपनों ने दी थी
वह आकाश में दूर तक
ऊँचा जाना चाहता था; ताकि
वहां से वह ला सके
अपनों के लिए
सूरज की रौशनी
बादलों का पानी
चाँद की मुस्कराहट और
तारों की ऊंचाई .
मगर एक दिन
उसके अपनों ने
तोड़ दिए पंख उसके
ऊँचा, बहुत ऊँचा उड़ने का हौसला
छीन लिया
उन्हें उस पंखहीन पक्षी की लाचारी पर
हंसी आती थी,
मगर वह रो रहा था
उसे दुःख था कि वह
न ला सका -
सूरज की  रौशनी
बादलों का पानी
चाँद की मुस्कुराहट और
तारों की ऊंचाई
अपनों के लिए .


  1. तुम्हारे लिए -2
एक पंछी आकाश में उड़ रहा था
 आकाश में ऊँचा  उड़ने का हौसला और प्रेरणा
उसे तुमने  दी थी
वह आकाश में दूर तक
ऊँचा जाना चाहता था; ताकि
वहां से वह ला सके
तुम्हारे  लिए
सूरज की रौशनी
बादलों का पानी
चाँद की मुस्कराहट और
तारों की ऊंचाई .
मगर एक दिन
तुम  ने
तोड़ दिए पंख उसके
ऊँचा, बहुत ऊँचा उड़ने का हौसला
छीन लिया
तुम्हें  उस पंखहीन पक्षी की लाचारी पर
हंसी आती थी,
मगर वह रो रहा था
उसे दुःख था कि वह
न ला सका -
सूरज की  रौशनी
बादलों का पानी
चाँद की मुस्कुराहट और
तारों की ऊंचाई
तुम्हारे  लिए .


ज़िन्दगी
ऐ ज़िन्दगी क्या-क्या रंग दिकाएगी तू ,
मुसीबत में घिरे इन्सान को और कितना सताएगी तू .
आदमी हूँ  आदमी की तलास में निकला था ,
और कितने जानवरों से मिलेगी तू .
सर्वेश्वर कह गए मसाल जलाओ भेड़िया भगाओ,
मगर मसाल कब तक जलाएगी तू .
आज भी रोती व्यवस्था को इंतजार है तेरा ,
बता लौ  कब तक जलाएगी तू .
घबड़ाकर कदम सब रुक गए या पीछे हट गए,
बता कदम कब तक आगे बढ़ाएगी तू.


मेरे जीवन में तुम्हारा होना 


जब कभी
तुम्हें ढूंढता हूँ
यहीं अपने आस-पास 
ही पता हूँ
हृदय की अन्यतम गहराइयों  तक  
केवल तुम्ही होती हो.
पर जब कभी 
अपने आप को ढूंढता हूँ 
तुम्हारे आस-पास 
कहीं दूर तलक भी 
तुम्हारी अहसासों में 
नहीं दीखता मुझे अपना चेहरा .
फिर भी मैं 
मायूस नहीं होता 
क्योंकि जीवन जीने के लिए 
हर किसी को चाहिए होती है
मन की ख़ुशी
मेरे अहसासों में तुम्हारा होना ही 
देती है मुझे 
वह ख़ुशी
पाटती है मेरे जीवन की 
नीरसता को
एकाकी क्षणों में 
दाखिल होना तुम्हारा 
जीवन की एकरसता को 
भर देती है 
एक गहरे पुलक से.

   नीरस जीवन कोई जी नहीं सकता 
वह कर्मशील हो नहीं सकता . 

तुम्हारा आना 

हमारे जीवन में 
तुम्हारा क्या मायने है?
क्यों चली आई 
तुम एक दिन अचानक 
इस एकरस जीवन की 
एकरसता भंग करने?
तुम्हारे आने से मेरी
एकरसता टूटी 
इसका तुम्हें एहसास नहीं
क्योंकि तुम्हारा मुझसे मिलना 
बस केवल मिलना था 
तुम्हारे लिए--
शायद किसी भी एहसास से परे.
पर तुम्हारा मिलना 
मेरे लिए
केवल मिलना नहीं था
तुम्हारा मिलना 
एक संयोग भी नहीं था 
इसलिए तुम्हारा आना 
मायने बहुत रखता है
मेरे जीवन में.
तुम्हारे आने से ही 
समझा मैं 
सौंदर्य-बोध के मायने
जीवन में 
भौतिक -मोह को भी दी थोड़ी जगह
जिसे मैं एकदम छोड़ चला था 
मगर मेरा 
आदर्श और ऋषित्व
और निखरा तुम्हारे सानिध्य में
प्रेम!
जिसे मैं बेदखल कर दिया था 
अपने जीवन से
समझा उसके हर पहलू को
उसके व्यापक रूप को
केवल तुम्हारे आने से 
इसलिए तुम्हारा आना 
तुम्हारे लिए कोई 
मायने नहीं रखता हो बेशक ,
मगर मेरे लिए 
तुम्हारा वह आना 
केवल आना भर न था 
वह सबकुछ था मेरे लिए 
मेरे जीवन को 
अनुभवों के व्यापक संसार से 
समृद्ध करने के लिए 
आजीवन ऋणी रहूँगा तुम्हारा
और
तुम्हारा आना 
मेरे जीवन का 
वापस आना था 
जिसे मैं शायद 
भूलता चला जा रहा था 
मेरा मानव प्रेम
अब और 
व्यापक हो गया है
सिर्फ तुम्हारे 
एक बार आने से .

कभी मेरी गलियों से गुजर कर देखो

कभी मेरी गलियों से गुजर कर देखो.
बीत चुकी हैं जो यादें उनसे उबरकर देखो.
कुछ हसरतें मिटाने से भी नहीं मिटतीं, 
ऐ पत्थर दिल तुम उन्हें मिटाकर देखो.
तेरा आना और लौट जाना क्या तय था,
है हौसला तो एकबार और आके देखो.
कितनी हैं ऐसी अरमानें की जिनका कोई मतलब नहीं,
किसी अरमान को तुम मतलब बनाकर देखो.
देखते हैं कई कई आँखों से कितने ,
कभी तो  तुम आँखें नाम बनाकर देखो.
नौजवानों की जिंदगी में दखल देते रहते हो ,
कभी अपनी बेदखल उम्र भी देखो.


कोई प्रेम की नगरी बसो यारों 

आज तो प्रेम की कोई नगरी  बसाओ यारों,
अब तो नफरत की दुनिया हटाओ यारों.
कब तक झेलोगे इन वह्शिओं  को ,
अब तो चेहरे से वहशत  हटाओ यारों.
कब तक भटकते भटकाते रहोगे,
अब तो मकसद को मुकाम तक पहुँचाओ यारों.
जल गयीं हैं गरीबों की बस्तियां कितनी  देखो,
अब तो बस्तियां जलाने वालों को जलाओ यारों.
तमाम मसलेहत से जूझ रहा है देश आज,
कोई तो मसलेहत सुलझाओ यारों.
सर निचे किये कब तक चलते जाओगे,
अब तो तान कर सीना सर उठाओ यारों.
क्या पता कल कुछ भी न बचे यहाँ,
 जलती आग से कुछ तो बचाओ यारों.
ठंढ से सिकुड़ गये हैं पांव सबके,
अब तो थोड़ी आग जलाओ यारों.
शर्मो-हया नहीं इन वहशियों को ,
 किसी लुटती अस्मत को बचाओ यारों.
अब तक बहुत नीलाम होती रहीं बहु -बेटियां,
अब तो किसी की आबरू बचाओ यारों.
कब तक भागोगे मुंह छिपाओगे,
अब तो कमर कसके सामने आओ यारों.
रोकना नहीं आसां तो जुल्म करना भी आसां नहीं,
बस एकबार लड़ने का हौसला तो दिखाओ  यारों.

अब्दुल हलिम साबिरका शेर है--
अपनी नाकामी का गम रखते नहीं
हौसला जो दिल में कम रखते नहीं.
हम उनके पीछे-पीछे कैसे चलें,
कदम आगे आगे जो रखते नहीं.

  


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