Sunday, November 28, 2010

अपने बारे में

साथी , अपने बारे में क्या बताना .बस थोड़ी- सी बातें यूँ ही कह रहा हूँ.  बिहार प्रान्त के सीवान जिले के एक छोटे से गाँव  रतौली में मेरा जन्म वसंत पंचमी (सरस्वती पूजा )के दिन पता नहीं किस सन में हुआ था . मेरे दादाजी और स्कूल के इंग्लिश टीचर मौलवी साहब ने मेरी जन्मतिथि १५ जून १९८४ स्कूल के रजिस्टर में दर्ज कर दी .तबसे वही मान्य है.आदर्श राजकीय मध्य विद्यालय बिठुना ,जो  मेरे घर से आधे किलोमीटर की दूरी पर है ,वही मेरी प्रारंभिक शिक्षा शुरू हुई .
                                     स्कूल के दिनों की यादें आज भी ताज़ी हैं . डेढ़ से दो बजे तक आधे घंटे की टिफिन होती.मेरा एक  दोस्त था चंद्रभूषण सिंह .(पता नहीं आजकल कहा है,वह मैट्रिक के बाद ही पढाई छोड़ दिया था.) करीब हम  छः -सात दोस्त जिसमे वह भी रहता था ,स्कूल के पीछे लगभग दस मिनट की दुरी पर उसके एक बीघा  वाले चने के खेत में चले जाते और कच्चे चने उखाड़ कर खूब खाते.चूकी खेत उसी का था सो उतना डर नहीं था ,मगर उसके पिताजी के आने का डर लगा रहता .आखिर किसी ने एक दिन देख लिया.हमलोग खेत में तो नहीं पकडे गए ,मगर हेडमास्टर ने स्कूल में हमसब की खूब धुलाई की.बेचारा  चंद्रभूषण तो अपने पिताजी के हाथों भी घर पर खूब पीटा गया.आज भी इस घटना की मधुर यादें स्कूल लाईफ़ में लौट जाने के लिए विवश कराती हैं . 
       हमारे स्कूल के पीछे एक पोखरा था .गरमी के दिनों में अक्सर हमलोग पोखरे के भिंडे पर बैठ कर ढंडी हवाएं खाया करते.जड़े के दिनों में स्कूल के पीछे कब्बडी खेला करते .कुछलोग सुल के आगे के फिल्ड में भी खेलते.स्कूल बिल्डिंग के दो भाग थे.मिडिल के पीछे पोखर था और प्राइमरी के पीछे जंगल . यह जंगल इतना शानदार था की इसकी अपनी अलग खूबसूरती थी.अन्दर जाने का एक ही द्वार था. अन्दर चले गए लोग बहार से नहीं दीखते .इसकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसके निचे पानी था.जिसको बैठना होता वह केवले के फुल कि तथा अन्य पेड़ों कि डालियों पर ही बैठ सकता था .डालियाँ कुछ इस तरह थीं  कि उसपर दस-पंद्रह लोग आराम से बैठ सकते थे .अक्सर हम दस-पंद्रह लड़के -लड़की यही अपना टिफिन करते और अन्ताकछरी खेलते. 
           एक और रोचक प्रसंग .हमारे एक साइंस टीचर थे-दीनानाथ प्रसाद.बहुत पढ़े और बहुत नोबुल,बहुत अछे ,बहुत सीधे.हमारे इंग्लिश टीचर लियाकत अली उन्हें सोल्टी गाड़ी कहकर चिढाया करते .उनके देखा-देखी कुछ बच्चे भी दबे मुंह कहा करते .सहनशीलता कि प्रतिमूर्ति थे वे.मगर कभी- कभी सब्र का बांध टूट जाता और मौलवी साहब (लियाकत अली)को बहुत भला-बुरा सुनना पड़ता.मौलवी साहब तो चिढाने के लिए ही यह सब करते.दीनानाथ बाबु का घर स्कूल से लगभग 40 किलोमीटर कि दुरी पर था.इसलिए वे स्कूल से 4 -5 किलोमीटर कि दुरी पर डेरा लेकर रहते थे.खाना खुद बनाते थे . कभी-कभी देर होने कि वजह से माड़-भात खाकर ही आ जाते और अपने कलीग्स से कह देते कि आज तो देरी हो रही थी तो माड़ -भात खाकर ही चला आया.मौलवी साहब को मंत्र मिल जाता .अब वे रोज पूछते कि "क्या जी अजो माडे -भात पर कम चल गया क्या?"सोल्टी जी चिढ जाते और कहते कि "आपके पास सोचने के लिए और कुछ है कि नही.पढ़ाने आते हैं  कि तमासा करने."कभी  -कभी  मजाक का यह सिलसिला इतना भयानक रूप धारण कर लेता कि दीनानाथ बाबू काफी दुखी हो जाते और हेडमास्टर से अपनी ट्रांसफर की मांग करते नहीं  रिजाइन देने की बात करते.एक बार होली का त्यौहार था .मौलवी साहब रंग  लाकर उनकी साईकिल की सीट ,हैंडल ,यहाँ तक कि पैडिल पर भी रंग लगा दिया.जब शाम को दीननाथ बाबू ने एक बच्चे से पीने के लिए पानी मंगाया तो रास्ते में मौलवी साहब ने पानी के ग्लास में रंग डाल दिया.एक घूंट पीने के बाद पानी का स्वाद थोडा तीखा लगा, तब उन्होंने देखा  कि पानी में रंग है.अब वही ग्लास लेकर दौड़ पड़े मौलवी साहब पर डालने. आगे -आगे मौलवी साहब भाग रहें हैं  और पीछे-पीछे दीनानाथ बाबू.काफी देर यह भाग -दौड़ चली.सारे टीचर हँसते रहे सारे बच्चे हँसते रहे गांव के लोग भी.अंत में मौलवी साहब पर रंग पड़ा .मगर मौलवी साहब मुस्कुरा रहे थे कि अच्छा जब साईकिल पर चढ़ेंगे तब पता चलेगा.दीनानाथ बाबू जब साईकिल पर चढ़े तो हाथ और धोती दोनों लाल.फिर हंसी का एक फवारा,लेकिन मालवी साहब हँसते हुए तेज़ गति से साईकिल चलाते निकल गए .इस प्रकार ढेरो हंसी- मजाक  के प्रसंग हैं . 

उपन्यास इन्सैक्लोपिडिया

1.परीक्षा गुरू ----- लाला श्रीनिवास दास-----  1882   -- हिंदी का पहला उपन्यास 
२. चंद्रकांता ---
३. नूतन ब्रह्मचारी --- बालकृष्ण भट्ट ---
४. प्रणयिनी परिणय ---  किशोरीलाल गोस्वामी का पहला उपन्यास --- 1887
५. विधवा विपत्ति(कुल 17  पेज) --- देवी प्रसाद शर्मा ----- 1888
  

कवि -काव्य संग्रह और प्रकाशन वर्ष


निराला:-
१. अनामिका-   १९२३ ईस्वी (पहला काव्य संग्रह)
२. परिमल--    १९२९
३. गीतिका--   १९३६
४. अनामिका-- १९३८ (द्वितीय)
५. तुलसीदास --१९३९, रचना-काल -- - १९३४; 'सुधा' में १९३५ में प्रकाशित ; पुतकर १९३९ में प्रकाशित
६. कुकुर्मुत्त्ता -- १९४३
७. अणिमा -- १९४३
८. बेला -- १९४६
९. नए पत्ते -- १९४६
१०. अर्चना -- १९५०
११. आराधना  -- १९५३
१२. गीत कुञ्ज -- १९५४
13. सांध्य काकली -- 1969




धूमिल (१९३१-1976)
काव्य-संग्रह 
संसद से सड़क तक - -- 1972
कल सुनना मुझे    ----  1977
सुदामा पाण्डे का प्रजातंत्र --- 1984

पुरस्कार 

1975 में मध्यप्रदेश सरकार के साहित्य परिषद् द्वारा 'संसद से सड़क तक ' पर मुक्तिबोध पुरस्कार दिया .
1979 में कल सुनना मुझे पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला .
संग्रहों में संकलित रचनाएँ 
संसद से सड़क तक --- कविता, बीस साल बाद, जनतंत्र के सूर्योदय में, अकाल दर्शन, बसंत, एकांत कथा, शांति पाठ, उस औरत की बगल में लेटकर, राजकमल चौधरी के लिए, मोचीराम, शहर में सूर्यास्त , प्रौढ़ शिक्षा, मकान, एक आदमी, पतझड़, कवि 1970 , नक्सलबाड़ी, कुत्ता, शहर, शाम और एक बूढ़ा मैं, सच्ची बात, हत्यारी संभावनाओं के नीचे, मुनासिब करवाई, भाषा की रात, पटकथा.
नोट :-  इस संग्रह में 1966  से 1970  तक की कुल  25 कविताएँ संकलित हैं.इस संकलन का नाम तीन बार परिवर्तित किया गया.इसका पहला नाम  भाषा की रात, दूसरा नाम हत्यारी संभावनाओं के नीचे, तथा तीसरा नाम संसद से सड़क तक  ,रखा  गया. उनकी इस रचना पर सन 1975  में मध्यप्रदेश सरकार के साहित्य परिषद् द्वारा मुक्तिबोध पुरस्कार प्रदान किया गया. 

कल सुनना मुझे :-   जवाहर लाल नेहरु  की मृत्यु पर, आस्था, दस्तक, देश प्रेम:मेरे लिए, किस्सा जनतंत्र, प्रजातंत्र के विरुद्ध, कविता श्री काकुलम, आतिश के आनर-सी वह लड़की, मुक्ति के तुरंत बाद, एक कविता : कुछ सूचनाएं, सुदूर पूर्व में, रोटी और संसद , लेनिन का सिर, शब्द जहाँ सक्रिय हैं, अंतर, बारिश में भींगकर , दूसरे का घर, कल, दिनचर्या, नगर कथा, गृहस्थी : चार आयाम, सापेक्ष्य संवेदन, युवा सदी गति है,उसके बारे में, खेवली, खून के बारे में कविता, मैं हूँ, मेरी कविता, आलोचक, कविता के द्वारा हस्तक्षेप, आज मैं  लड़ रहा हूँ, पराजय बोध, मृत्यु चिंता, प्रवेश-पत्र, गाँव में कीर्तन , ओ बैरागी : पंडित शांतिप्रिय द्विवेदी , धूमिल की अंतिम कविता.
  नोट :- इस काव्य-संग्रह पर सन 1979 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला (मरणोपरांत).

सुदामा पांडे का प्रजातंत्र :-  सुदामा पांडे का प्रजातंत्र :एक, सुदामा पाण्डेय का प्रजातंत्र : दो, ट्यूशन पर जाने से पहले, न्यू गरीब हिन्दू होटल, कविता के भ्रम में , बसंत से बातचीत का एक लमहा, रणनीति, ताज़ा खबर, कोडवर्ड, सूखे की छायाएं और एक शिशिर संध्या, संसद समीक्षा, संयुक्त मोर्चा, कर्फ्यू में एक घंटे की छुट, घर में वापसी, गृह - युद्ध, रोटियों का शहर , मेमन सिंह, लोकतंत्र, मैंने घुटने से कहा, अगली कविता के लिए, पर्वतारोहण : नवम्बर 1971 , बीसवीं शताब्दी का सातवां दशक, मैं सहज होना चाहता हूँ, मेरा गाँव, शिविर नंबर तीन, चानमारी से गुजरते हुए, नौजवान, जनतंत्र : एक हत्या सन्दर्भ, मुक्ति का रास्ता, गुफ्तगू, मतदाता, चुनाव, सिलसिला, 'स' और 'त' का खेल, निहत्थे आदमी से कहा , हरित क्रांति, हरित क्रांति : एक, हरित क्रांति : दो, हत्यारे : एक, हत्यारे : दो, वापसी, अब मैं अगली योजना  पर बात करूँगा, लोहसाँय , कमरा, आदम इरादों से बित्ता भर उठी हुई पृथ्वी, खून का हिसाब, नींद के बाद, रात्रिभाषा, भूख, प्रस्ताव, 20  मादा कविताएँ, एक : पि सुदामा और मूर्ति के लिए, दो : पत्नी के लिए, तीन : सत्यभामा, चार : पुरबिया सूरज, पाँच : पाँचवें पुरखे की कथा, छ: : चमड़े को गाने दो प्यार, सैट : प्यार, आठ : स्त्री, नौ... .

      

हिंदी कहानियों का प्रकाशन वर्ष

१.   रानी केतकी की कहानी ---- इंशा  अल्लां खां --- 1803  
२,. ग्यारह वर्ष का समय ------- आचार्य शुक्ल ----      
३. वीर सिंह का वृतांत ---- राजा शिवप्रसाद सिंह ----1855  
४.  राजा भोज का सपना ------- रजा शिवप्रसाद सिंह ----1856
 ५. लड़कों की कहानी --- राजा शिवप्रसाद सिंह ---1860  
 ६. सोजे वतन (कहानी संग्रह) ---- प्रेमचंद---       1908
7. गुजरा हुआ जमाना --- सैयद अहमद खां -- उर्दू की पहली कहानी --1870
 ८.  देवरानी जेठानी की कहानी -------
९.  भाग्यवती   ------- .
१०.सिल्के गौहर ------- इंशा अल्लां खां ---

साम्प्रदायिकता सम्बन्धी हिंदी उपन्यास

शीर्षक --        चंद्रकिशोर जायसवाल ---१९९६--सांप्रदायिक दंगों पर
-जिंदगीनामा--कृष्ण सोबती -------------१९७९--पंजाब का सांस्कृतिक ऐतिहासिक जीवन और हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्ध
कलिकथा वाया वैपस
३.धर्मपुत्र -------------------आ० चतुरसेनशास्त्री--हिन्दू-मुस्लिम समस्या                      --- सन -१९५४
४.वह फिर नहीं आई --भगवतीचरणवर्मा- विभाजन के  बाद की विस्फोटक स्थितियां    --- सन -१९६०
५ अमृत और विष ----अमृतलाल नागर- युवा संघर्ष और सांप्रदायिक समस्या   --- सन 1966

बाबरी मस्ज़िद सम्बन्धी हिंदी उपन्यास

भारत विभाजन सम्बन्धी हिंदी उपन्यास

1.कठपुतली-------  देवेन्द्र सत्यार्थी -------- 1954 
२. लौटे हुए मुसाफिर ------ कमलेश्वर ------- 1961 
३. तमस ------          भीष्म सहनी --------   1973 
४. छको की वापसी  ----- बदिउज्मा --------
५.    

Saturday, November 20, 2010

शहर, जहाँ अपना गावं छोड़कर हम बसते हैं.गावं स्वप्नभूमि है और शहर कर्मभूमि .एक कर्मस्थली है तो दूसरी प्रेरणा-स्थली .दोनों को त्यागना संभव नहीं है .शहरी जीवन की नीरसता को गावं की याद सरसता से भर देती है.साथी  शहर में गावं को जीना आसन तो नहीं मगर नामुमकिन भी नहीं है.हम सब गवंही(गावं से आए )मिलकर अपने शहर में अक गावं बना सकते हैं और एक लोकसंस्कृति विकसित कर सकते हैं,अपने लिए ,अपने सहज जीवन के लिए और शहरी अपसंस्कृति के बरक्स एक मजबूत जीवन संस्कृति विकसित करने के लिए .इस ब्लॉग का नाम साथी गावं चलें रखने के पीछे यही सोच थी.