संस्कृति और सौंदर्य -- डॉ० नामवर सिंह
'दूसरी परम्परा की खोज' नामवर जी की प्रसिद्द पुस्तक है। इस पुस्तक में नामवर जी द्विवेदी जी को दूसरी परम्परा का जनक मानते हुए उनके समस्त सैद्धांतिक और व्यवहारिक आलोचना का सारगर्भित विवेचन प्रस्तुत करते हैं। इसी क्रम में उन्होंने 'संस्कृति और सौंदर्य' नामक निबंध में द्विवेदी जी के संस्कृति एवं सौंदर्य सम्बन्धी दृष्टिकोण की व्यापकता और प्रासंगिकता का उद्घाटन किया है। इस लेख में डॉ० नामवर सिंह ने दो बातों -- संस्कृति और सौंदर्य पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया है ।सन्दर्भ उन्होंने द्विवेदी जी का ही दिया है , मगर उसी बहाने इन विषयों पर डॉ सिंह ने अपना विचार भी रखा है जो इन विषयों को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं। यह अनायास नहीं है कि प्रत्येक प्रगतिशील विचारकों के लिए संस्कृति और सौंदर्य का प्रश्न प्रमुख रूप से विचारणीय रहा है , क्योंकि इनपर संस्कृति-विरोधी होने के साथ साथ सौंदर्य विरोधी होने का भी आरोप लगता रहा है। असल में ये न तो कभी संस्कृति विरोधी रहे और न ही सौंदर्य विरोधी। बल्कि ये इन दोनों में जो अभिजात्यपन का अतिरेक था या यूँ कहें कि संस्कृति और सौंदर्य को अभिजात्य का हिस्सा मान लिया गया था , उससे इनका विरोध था। इनकी विवेचनाओं से संस्कृति और सौंदर्य का असली रूप सामने आया और पारम्परिक गलत व्याख्याओं और धारणाओं से मुक्ति मिली।
संस्कृति को लेकर समय समय पर तरह- तरह से विचार -विमर्श होता रहा है। कुछ राजनीति प्रेरित तो कुछ स्वार्थ प्रेरित। इस विमर्श में द्विवेदी जी ने संस्कृति के जिन बुनियादी गुणों की ओर इशारा किया था , उसपर पर्दा डालकर सभी विश्लेषक खुद को संस्कृति के नए विमर्शकार के रूप में स्थापित करने लगे।एक राजनीति से प्रेरित होकर दिनकरजी ने ''संस्कृति के चार अध्याय'' की रचना की और मिश्र संस्कृति के स्वरुप को स्थापित किया तो दूसरी राजनीति के तहत अज्ञेय ने संस्कार-धर्मी संग्राहक संस्कृति की वकालत की। नामवरजी लिखते हैं -- '' यदि दिनकर की ' मिश्र संस्कृति ' की एक राजनीती है तो अज्ञेय की संस्कार-धर्मी संग्राहक संस्कृति भी किसी और राजनीति के अनुषंग से बच नहीं जाती। '' ( 105 )नामवर जी का इशारा साफ समझा जा सकता है।
द्विवेदी जी ने भारतीय संस्कृति का सच उजागर करते हुए कहा था कि वह गन्धर्व , यक्ष , किन्नर आदि आर्येतर जातियों के विश्वासों और सौंदर्य कल्पनाओं का सबसे अधिक ऋणी है। (103 ) उनकी यह स्थापना किसी खास मकसद की उपज नहीं थी और न ही किसी तरह की राजनीति से प्रेरित। वह तो उनके अतीतकालीन साहित्य के अध्ययन और चिंतन की स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी। असल में संस्कृति को लेकर दक्षिणपंथी सोच हमेसा विशुद्धतावाद पर जोर देती रही है। इस विशुद्धता पर न केवल वह गर्व करती रही है बल्कि इस आर्य संस्कृति को वह सर्वश्रेष्ठ भी मानती रही है और इसके लिए वह तरह -तरह का तर्क भी गढ़ती रही है। इसका विरोध करते हुए द्विवेदी जी लिखते हैं -- '' देश और जाति की विशुद्ध संस्कृति केवल बात की बात है। सबकुछ में मिलावट है , सबकुछ अविशुद्ध है। '' द्विवेदी जी यह भलीभांति समझते थे कि भारतीय संस्कृति का स्वरुप आर्येतर जातियों की देंन को स्वीकार किये बिना निर्मित नहीं होता। मगर आर्य संस्कृति के विशुद्धतावादी पक्षधर इसे कत्तई स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। द्विवेदी जी ने इसी सोच पर हमला किया था। नामवर जी ने ठीक लिखा है --'' और सच कहा जय तो आर्य संस्कृति की शुद्धता के अहंकार पर चोट करने के लिए ही ' अशोक के फूल ' लिखा गया है , प्रकृति-वर्णन के लिए नहीं। यह निबंध द्विवेदी जी के शुद्ध पुष्प -प्रेम का प्रमाण नहीं , बल्कि संस्कृति-दृष्टि का अनूठा दस्तावेज है। '' (१०४)
दिनकर जी के संस्कृति-चिंतन ( संस्कृति के चार अध्याय ) को अज्ञेय जी ने 'मिश्र संस्कृति ' का आग्रह करार देते हुए उसे राजनीति प्रेरित बताया था। अज्ञेय जी का स्पष्ट मानना था कि '' संस्कृतियाँ प्रभाव ग्रहण करती हैं , अपने अनुभव को समृद्धतर बनाती हैं , लेकिन यह प्रक्रिया मिश्रण की नहीं है। '' (104 ) अज्ञेय जी संस्कृति की संग्राहकता पर जोर देते हैं और उसके मूल रूप को शुद्ध मानते हैं। द्विवेदी जी का मत इन दोनों से भिन्न है। द्विवेदी जी संस्कृति के दोनों पक्षों -- 'संग्राहकता और त्याग' दोनों पर जोर देते हैं --- '' हमारे सामने समाज का आज जो रूप है वह न जाने कितने ग्रहण और त्याग का रूप है। '' (105 ) द्विवेदी जी के चिंतन को आगे बढ़ाते हुए नामवर जी समकालीन सन्दर्भों में संस्कृति के प्रति आसक्ति या मोह को जड़ता बताते हैं। वे इस सन्दर्भ में द्विवेदी जी को कोट करके दरअसल संस्कृति के विषय में अपने प्रगतिशील पक्ष को ही वाणी देते हैं -- '' आज हमारे भीतर जो मोह है , संस्कृति और कला के नाम पर जो आसक्ति है , धर्माचार और सत्यनिष्ठा के नाम पर जो जड़िमा है ( द्विवेदीजी) 'उसे किस प्रकार ध्वस्त किया जाय (नामवरजी)?'' द्विवेदी जी ने संस्कृति के प्रति जिस 'मोह और जड़ता' को बाधक तत्वों के रूप में विश्लेषित किया था , उन बाधक तत्वों को ध्वस्त करने की चिंता दरअसल समय की प्रगतिशील चिंता थी जो तब और प्रांसगिक हो उठी थी जब दो ध्रुवीय राजनीति से प्रेरित मिश्र और शुद्ध संस्कृति की टकराहट आकार ग्रहण करने लगी थी। राजनीति की एक धारा से प्रेरित होकर दिनकर जी ने मिश्र संस्कृति का आग्रह प्रस्तुत किया तो दूसरी धारा से प्रेरित होकर अज्ञेय जी ने उसकी संग्राहकता पर जोर देते हुए कहीं न कहीं उसकी शुद्धता की वकालत की। शुद्धतावादी खेमे वालों का स्पष्ट मानना था कि '' अतर्क्य भावों , अनुभूतियों और आध्यात्मिक उपलब्धियों के स्तर पर संस्कृतियों का वास्तविक मिलन अत्यंत कठिन होता है। ''( डॉ. गोविंदचंद्र पांडे , 106 ) उनलोगों का मानना था कि संस्कृति की तथाकथित सामासिकता वास्तव में सभ्यता के क्षेत्र में ही लागू होती है। (106 ) संस्कृति के प्रति इस तरह के जड़ आग्रह से कोई भी प्रगतिशील खेमे का चिंतक सहमत नहीं हो सकता।नामवर जी ने मिश्र संस्कृति और विशुद्ध संस्कृति की राजनीति पर प्रहार करते हुए लिखा -- '' यदि दिनकर की सामासिक संस्कृति का सम्बन्ध राजनीति के एक पक्ष से है तो स्वयं अज्ञेय और गोविनचन्द्र पांडे की 'शुद्ध संस्कृति' का सम्बन्ध भी राजनीति के दूसरे पक्ष से जोड़ा जा सकता है। '' (106 )
कुल मिलाकर नामवर जी द्वारा इस निबंध के माध्यम से द्विवेदी जी के संस्कृति चिंतन को उजागर करने का मूल उद्देश्य यही था कि तथाकथित खुद को आधुनिक और प्रगतिशील समझने वाले संस्कृति को लेकर कितने जड़ हैं जबकि संस्कार एवं विचार से पूर्णतः धार्मिक और सवभाव से आचार्य और कुछ हद तक दक्षिणपंथी समझे जाने वाले द्विवेदी जी का संस्कृति- चिंतन कितना प्रगतिशील एवं उदार है ।द्विवेदी जी के अनुसार 'शुद्ध संस्कृति' का आग्रह एक प्रकार का मोह है जो बाधा उपस्थित करता है। यह संस्कृति के क्षेत्र में वर्जनशीलता को जन्म देता है। पुराने के प्रति संस्कारवश मोह होता है , परन्तु यह भी सच है कि प्राचीन काल की बहुत सारी उपयोगी एवं संगत मान्यताएँ समय के प्रवाह में अनुपयोगी एवं अप्रासंगिक हो जाती हैं। अतीत के प्रति यह श्रद्धाभाव अन्य देश और अन्य जाति के साहित्य और संस्कृति को समझने में बाधक बनते हैं। द्विवेदी जी को मोहासक्त संस्कृति-भक्तों से बार - बार टकराना पड़ रहा था ( कभी तुलसी और सूर को भी टकराना पड़ा था ) और उसी चिंतन - परम्परा को आगे बढ़ाते हुए डॉ. नामवर सिंह भी इस मोहासक्ति पर प्रहार कर रहे हैं और इस विश्लेषण में द्विवेदी जी की हिन्दू आचार्य वाली छवि की जगह एक प्रगतिशील विचारक वाली छवि भी बनती चलती है और इसके ठीक विपरीत अस्तित्ववादी , नास्तिक आस्थावाले समय के प्रवाह में कैसे दक्षिणपंथ की ओर झुकते गए , इस ओर भी संकेत होता चलता है।
द्विवेदी जी का संस्कृति संघर्ष पंडितों की इकहरी परम्परा की संकीर्णता के विरुद्ध भारतीय संस्कृति की विविधता , जटिलता , परस्पर विरोधी जीवंतता और समृद्धि के पुनःसृजन के स्वरुप को उद्घाटित करने का संघर्ष है। द्विवेदी जी के पहले प्रसाद को भी ऐसे ही संघर्ष से गुजरना पड़ा था -- '' सुरुचि- सम्बन्धी विचित्रताओं को बिना देखे ही अत्यांत शीघ्रता में आजकल अमुक वस्तु अभारतीय है अथवा भारतीय संस्कृति की सुरुचि के विरुद्ध है , कह देने की परिपाटी चल पड़ी है। ..... ये सब भावनाएँ साधारणतः हमारे विचारों की संकीर्णता से और प्रधानतः अपनी स्वरुप - विस्मृति से उत्पन्न हैं। '' (१०८)
सौंदर्य को, प्रगतिशील चिंतन के आरम्भ के पहले तक केवल अभिजात्य का ही हिस्सा समझा जाता रहा। पहली बार प्रेमचंद ने सौंदर्य के अभिजात्य परिभाषा और चिंतन को चुनौती देते हुए लिखा कि सौंदर्य केवल महलों में ही नहीं बल्कि मेड़ पर बैठी , बच्चे को दूध पिलाती उस पिचकी गाल वाली औरत में भी हो सकती है। जब सर्वेश्वर ने कहा कि '' भूख से लड़ने जब कोई खड़ा हो जाता है / सुन्दर दिखने लगता है'' , तब उनका इशारा इसी प्रगतिशील सौंदर्य चेतना की ओर था। परम्परावादी कहे जाने वाले द्विवेदी जी की सोच भी इस प्रगतिशील चेतना की पूर्ववर्ती कड़ी थी , जिसको व्याख्यायित करने का प्रयास यहाँ डॉ नामवर जी ने किया है।
सौंदर्य को परिभाषित करते हुए द्विवेदी जी कहते हैं -- '' जो सम्पति परिश्रम से नहीं अर्जित की जाती , और जिसके संरक्षण के लिए मनुष्य का रक्त पसीने में नहीं बदलता , वह केवल कुत्सित रूचि को प्रश्रय देती है। सात्विक सौंदर्य वहां है , जहाँ चोटी का पसीना एड़ी तक आता है और नित्य समस्त विकारों को धोता रहता है। ''(112 -113 ) द्विवेदी जी की इस सौंदर्य-परम्परा को डॉ नामवर सिंह निराला के सौंदर्य-बोध --'' श्याम तन भर बंधा यौवन '' से जोड़ते हैं और प्रगतिशील सौंदर्य चेतना का आधुनिक क्रम निर्धारित करते हैं। द्विवेदी जी की इस सौंदर्य-चेतना का स्रोत लोक संस्कार था। किन्तु इस लोक में सौंदर्य-चेतना सुसुप्त अवस्था में पड़ी है क्योंकि जिस सामान्य जनता को पेटभर अन्न नहीं मिलता , वह सौंदर्य का सम्मान नहीं कर सकती। (114 )लेकिन इसके साथ ही द्विवेदी जी का यह भी स्पष्ट मानना था कि '' जो जाति 'सुन्दर' का सम्मान नहीं कर सकती , वह यह भी नहीं जानती कि बड़े उद्देश्य के लिए प्राण देना क्या चीज है। '' (114 ) नामवर जी इस चिंतन को विस्तार देते हुए लिखते हैं कि ''कोई जाति क्रांति जैसे बड़े उद्देश्य के लिए जान की बाज़ी लगाती है तो इसलिए कि वह सिर्फ जीना नहीं चाहती , बल्कि 'सुन्दर ' ढंग से जीना चाहती है। ''(115 )
द्विवेदी जी के अनुसार सौंदर्य रूप नहीं है , परन्तु वह रूप के बिना रह नहीं सकता। वे क्रियाशीलता को जीवन का रूप मानते हैं। वे लिखते हैं -- जीवन को सुन्दर ढंग से बिताने के लिए भी जीवन का एक रूप होना चाहिए। बहुत से लोग कुछ भी न करने को भलापन समझते हैं। यह गलत धारणा है। सुन्दर जीवन क्रियाशील होता है ; क्योंकि क्रियाशीलता ही जीवन का रूप है। क्रियाशीलता को छोड़कर जीवन का 'सौंदर्य' टिक नहीं सकता। ''(115 )
द्विवेदीजी सौंदर्यशास्त्र पर 'लालित्य-मीमांसा' नाम से एक पुस्तक भी लिख रहे थे जो दुर्भाग्यवश अधूरी रह गयी। नामवर जी कहते हैं कि 'द्विवेदी जी इस पुस्तक के माध्यम से लालित्यशास्त्र पर व्यवस्थित और सांगोपांग विचार करना चाहते थे जो उनके जीवन की सुदीर्घ सौंदर्य-चिंता और सौंदर्य-साधना की स्वाभाविक परिणति थी। ''(116 ) नामवरजी ने द्विवेदी जी की 'लालित्य-मीमांसा' के तीन सूत्रों की चर्चा की है। पहले सूत्र के अनुसार द्विवेदी जी सौंदर्य को सौंदर्य न कहकर 'लालित्य' कहना चाहते थे क्योंकि उनकी नज़र में मानव-रचित सौंदर्य का विशेष महत्व था। इसे और स्पष्ट करते हुए नामवर जी लिखते हैं -- '' समष्टिगत और व्यष्टिगत दोनों ही स्तरों पर द्विवेदी जी की सौंदर्य-दृष्टि मूलतः मानव केंद्रित ही है। इसका अर्थ सिर्फ यही नहीं कि सौंदर्य का स्रष्टा मनुष्य है , बल्कि यह भी कि सौंदर्य की सृष्टि करने के कारण ही मनुष्य मनुष्य है। '' (117 )
द्विवेदी जी की 'लालित्य-मीमांसा' का दूसरा सूत्र नामवर जी बंधन के विरुद्ध विद्रोह को मानते हैं अर्थात द्विवेदी जी की दृष्टि में कला और सौंदर्य की सृष्टि विलास मात्र नहीं बल्कि बंधनों के विरुद्ध विद्रोह है। 'लालित्य-मीमांसा' के तीसरे सूत्र की चर्चा करते हुए नामवर जी लिखते हैं - '' द्विवेदी जी की 'लालित्य-मीमांसा' का तीसरा सूत्र है कि सौंदर्य एक सर्जना है -- मनुष्य की सिसृक्षा का परिणाम है। ''(118 ) द्विवेदी जी सबसे अधिक बल इसी सिसृक्षा अर्थात मनुष्य की सृजनशीलता पर देते थे। तीनों सूत्रों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के पश्चात् डॉ नामवर सिंह द्विवेदी जी के सौंदर्य सम्बन्धी चिंतन का सार प्रस्तुत करते हुए कहते हैं -- '' जीवन का समग्र विकास ही सौंदर्य है। यह सौंदर्य वस्तुतः एक सृजन - व्यापार है। इस सृजन की क्षमता मनुष्य में अंतर्निहित है। वह सौंदर्य- सृजन की क्षमता के कारण ही मनुष्य है। इस सृजन-व्यापार का अर्थ है बंधनों से विद्रोह। इस प्रकार सौंदर्य विद्रोह है -- मानव-मुक्ति का प्रयास है। ''(118 )
-- प्रो० कुमार संकल्प -
'दूसरी परम्परा की खोज' नामवर जी की प्रसिद्द पुस्तक है। इस पुस्तक में नामवर जी द्विवेदी जी को दूसरी परम्परा का जनक मानते हुए उनके समस्त सैद्धांतिक और व्यवहारिक आलोचना का सारगर्भित विवेचन प्रस्तुत करते हैं। इसी क्रम में उन्होंने 'संस्कृति और सौंदर्य' नामक निबंध में द्विवेदी जी के संस्कृति एवं सौंदर्य सम्बन्धी दृष्टिकोण की व्यापकता और प्रासंगिकता का उद्घाटन किया है। इस लेख में डॉ० नामवर सिंह ने दो बातों -- संस्कृति और सौंदर्य पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया है ।सन्दर्भ उन्होंने द्विवेदी जी का ही दिया है , मगर उसी बहाने इन विषयों पर डॉ सिंह ने अपना विचार भी रखा है जो इन विषयों को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं। यह अनायास नहीं है कि प्रत्येक प्रगतिशील विचारकों के लिए संस्कृति और सौंदर्य का प्रश्न प्रमुख रूप से विचारणीय रहा है , क्योंकि इनपर संस्कृति-विरोधी होने के साथ साथ सौंदर्य विरोधी होने का भी आरोप लगता रहा है। असल में ये न तो कभी संस्कृति विरोधी रहे और न ही सौंदर्य विरोधी। बल्कि ये इन दोनों में जो अभिजात्यपन का अतिरेक था या यूँ कहें कि संस्कृति और सौंदर्य को अभिजात्य का हिस्सा मान लिया गया था , उससे इनका विरोध था। इनकी विवेचनाओं से संस्कृति और सौंदर्य का असली रूप सामने आया और पारम्परिक गलत व्याख्याओं और धारणाओं से मुक्ति मिली।
संस्कृति को लेकर समय समय पर तरह- तरह से विचार -विमर्श होता रहा है। कुछ राजनीति प्रेरित तो कुछ स्वार्थ प्रेरित। इस विमर्श में द्विवेदी जी ने संस्कृति के जिन बुनियादी गुणों की ओर इशारा किया था , उसपर पर्दा डालकर सभी विश्लेषक खुद को संस्कृति के नए विमर्शकार के रूप में स्थापित करने लगे।एक राजनीति से प्रेरित होकर दिनकरजी ने ''संस्कृति के चार अध्याय'' की रचना की और मिश्र संस्कृति के स्वरुप को स्थापित किया तो दूसरी राजनीति के तहत अज्ञेय ने संस्कार-धर्मी संग्राहक संस्कृति की वकालत की। नामवरजी लिखते हैं -- '' यदि दिनकर की ' मिश्र संस्कृति ' की एक राजनीती है तो अज्ञेय की संस्कार-धर्मी संग्राहक संस्कृति भी किसी और राजनीति के अनुषंग से बच नहीं जाती। '' ( 105 )नामवर जी का इशारा साफ समझा जा सकता है।
द्विवेदी जी ने भारतीय संस्कृति का सच उजागर करते हुए कहा था कि वह गन्धर्व , यक्ष , किन्नर आदि आर्येतर जातियों के विश्वासों और सौंदर्य कल्पनाओं का सबसे अधिक ऋणी है। (103 ) उनकी यह स्थापना किसी खास मकसद की उपज नहीं थी और न ही किसी तरह की राजनीति से प्रेरित। वह तो उनके अतीतकालीन साहित्य के अध्ययन और चिंतन की स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी। असल में संस्कृति को लेकर दक्षिणपंथी सोच हमेसा विशुद्धतावाद पर जोर देती रही है। इस विशुद्धता पर न केवल वह गर्व करती रही है बल्कि इस आर्य संस्कृति को वह सर्वश्रेष्ठ भी मानती रही है और इसके लिए वह तरह -तरह का तर्क भी गढ़ती रही है। इसका विरोध करते हुए द्विवेदी जी लिखते हैं -- '' देश और जाति की विशुद्ध संस्कृति केवल बात की बात है। सबकुछ में मिलावट है , सबकुछ अविशुद्ध है। '' द्विवेदी जी यह भलीभांति समझते थे कि भारतीय संस्कृति का स्वरुप आर्येतर जातियों की देंन को स्वीकार किये बिना निर्मित नहीं होता। मगर आर्य संस्कृति के विशुद्धतावादी पक्षधर इसे कत्तई स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। द्विवेदी जी ने इसी सोच पर हमला किया था। नामवर जी ने ठीक लिखा है --'' और सच कहा जय तो आर्य संस्कृति की शुद्धता के अहंकार पर चोट करने के लिए ही ' अशोक के फूल ' लिखा गया है , प्रकृति-वर्णन के लिए नहीं। यह निबंध द्विवेदी जी के शुद्ध पुष्प -प्रेम का प्रमाण नहीं , बल्कि संस्कृति-दृष्टि का अनूठा दस्तावेज है। '' (१०४)
दिनकर जी के संस्कृति-चिंतन ( संस्कृति के चार अध्याय ) को अज्ञेय जी ने 'मिश्र संस्कृति ' का आग्रह करार देते हुए उसे राजनीति प्रेरित बताया था। अज्ञेय जी का स्पष्ट मानना था कि '' संस्कृतियाँ प्रभाव ग्रहण करती हैं , अपने अनुभव को समृद्धतर बनाती हैं , लेकिन यह प्रक्रिया मिश्रण की नहीं है। '' (104 ) अज्ञेय जी संस्कृति की संग्राहकता पर जोर देते हैं और उसके मूल रूप को शुद्ध मानते हैं। द्विवेदी जी का मत इन दोनों से भिन्न है। द्विवेदी जी संस्कृति के दोनों पक्षों -- 'संग्राहकता और त्याग' दोनों पर जोर देते हैं --- '' हमारे सामने समाज का आज जो रूप है वह न जाने कितने ग्रहण और त्याग का रूप है। '' (105 ) द्विवेदी जी के चिंतन को आगे बढ़ाते हुए नामवर जी समकालीन सन्दर्भों में संस्कृति के प्रति आसक्ति या मोह को जड़ता बताते हैं। वे इस सन्दर्भ में द्विवेदी जी को कोट करके दरअसल संस्कृति के विषय में अपने प्रगतिशील पक्ष को ही वाणी देते हैं -- '' आज हमारे भीतर जो मोह है , संस्कृति और कला के नाम पर जो आसक्ति है , धर्माचार और सत्यनिष्ठा के नाम पर जो जड़िमा है ( द्विवेदीजी) 'उसे किस प्रकार ध्वस्त किया जाय (नामवरजी)?'' द्विवेदी जी ने संस्कृति के प्रति जिस 'मोह और जड़ता' को बाधक तत्वों के रूप में विश्लेषित किया था , उन बाधक तत्वों को ध्वस्त करने की चिंता दरअसल समय की प्रगतिशील चिंता थी जो तब और प्रांसगिक हो उठी थी जब दो ध्रुवीय राजनीति से प्रेरित मिश्र और शुद्ध संस्कृति की टकराहट आकार ग्रहण करने लगी थी। राजनीति की एक धारा से प्रेरित होकर दिनकर जी ने मिश्र संस्कृति का आग्रह प्रस्तुत किया तो दूसरी धारा से प्रेरित होकर अज्ञेय जी ने उसकी संग्राहकता पर जोर देते हुए कहीं न कहीं उसकी शुद्धता की वकालत की। शुद्धतावादी खेमे वालों का स्पष्ट मानना था कि '' अतर्क्य भावों , अनुभूतियों और आध्यात्मिक उपलब्धियों के स्तर पर संस्कृतियों का वास्तविक मिलन अत्यंत कठिन होता है। ''( डॉ. गोविंदचंद्र पांडे , 106 ) उनलोगों का मानना था कि संस्कृति की तथाकथित सामासिकता वास्तव में सभ्यता के क्षेत्र में ही लागू होती है। (106 ) संस्कृति के प्रति इस तरह के जड़ आग्रह से कोई भी प्रगतिशील खेमे का चिंतक सहमत नहीं हो सकता।नामवर जी ने मिश्र संस्कृति और विशुद्ध संस्कृति की राजनीति पर प्रहार करते हुए लिखा -- '' यदि दिनकर की सामासिक संस्कृति का सम्बन्ध राजनीति के एक पक्ष से है तो स्वयं अज्ञेय और गोविनचन्द्र पांडे की 'शुद्ध संस्कृति' का सम्बन्ध भी राजनीति के दूसरे पक्ष से जोड़ा जा सकता है। '' (106 )
कुल मिलाकर नामवर जी द्वारा इस निबंध के माध्यम से द्विवेदी जी के संस्कृति चिंतन को उजागर करने का मूल उद्देश्य यही था कि तथाकथित खुद को आधुनिक और प्रगतिशील समझने वाले संस्कृति को लेकर कितने जड़ हैं जबकि संस्कार एवं विचार से पूर्णतः धार्मिक और सवभाव से आचार्य और कुछ हद तक दक्षिणपंथी समझे जाने वाले द्विवेदी जी का संस्कृति- चिंतन कितना प्रगतिशील एवं उदार है ।द्विवेदी जी के अनुसार 'शुद्ध संस्कृति' का आग्रह एक प्रकार का मोह है जो बाधा उपस्थित करता है। यह संस्कृति के क्षेत्र में वर्जनशीलता को जन्म देता है। पुराने के प्रति संस्कारवश मोह होता है , परन्तु यह भी सच है कि प्राचीन काल की बहुत सारी उपयोगी एवं संगत मान्यताएँ समय के प्रवाह में अनुपयोगी एवं अप्रासंगिक हो जाती हैं। अतीत के प्रति यह श्रद्धाभाव अन्य देश और अन्य जाति के साहित्य और संस्कृति को समझने में बाधक बनते हैं। द्विवेदी जी को मोहासक्त संस्कृति-भक्तों से बार - बार टकराना पड़ रहा था ( कभी तुलसी और सूर को भी टकराना पड़ा था ) और उसी चिंतन - परम्परा को आगे बढ़ाते हुए डॉ. नामवर सिंह भी इस मोहासक्ति पर प्रहार कर रहे हैं और इस विश्लेषण में द्विवेदी जी की हिन्दू आचार्य वाली छवि की जगह एक प्रगतिशील विचारक वाली छवि भी बनती चलती है और इसके ठीक विपरीत अस्तित्ववादी , नास्तिक आस्थावाले समय के प्रवाह में कैसे दक्षिणपंथ की ओर झुकते गए , इस ओर भी संकेत होता चलता है।
द्विवेदी जी का संस्कृति संघर्ष पंडितों की इकहरी परम्परा की संकीर्णता के विरुद्ध भारतीय संस्कृति की विविधता , जटिलता , परस्पर विरोधी जीवंतता और समृद्धि के पुनःसृजन के स्वरुप को उद्घाटित करने का संघर्ष है। द्विवेदी जी के पहले प्रसाद को भी ऐसे ही संघर्ष से गुजरना पड़ा था -- '' सुरुचि- सम्बन्धी विचित्रताओं को बिना देखे ही अत्यांत शीघ्रता में आजकल अमुक वस्तु अभारतीय है अथवा भारतीय संस्कृति की सुरुचि के विरुद्ध है , कह देने की परिपाटी चल पड़ी है। ..... ये सब भावनाएँ साधारणतः हमारे विचारों की संकीर्णता से और प्रधानतः अपनी स्वरुप - विस्मृति से उत्पन्न हैं। '' (१०८)
सौंदर्य को, प्रगतिशील चिंतन के आरम्भ के पहले तक केवल अभिजात्य का ही हिस्सा समझा जाता रहा। पहली बार प्रेमचंद ने सौंदर्य के अभिजात्य परिभाषा और चिंतन को चुनौती देते हुए लिखा कि सौंदर्य केवल महलों में ही नहीं बल्कि मेड़ पर बैठी , बच्चे को दूध पिलाती उस पिचकी गाल वाली औरत में भी हो सकती है। जब सर्वेश्वर ने कहा कि '' भूख से लड़ने जब कोई खड़ा हो जाता है / सुन्दर दिखने लगता है'' , तब उनका इशारा इसी प्रगतिशील सौंदर्य चेतना की ओर था। परम्परावादी कहे जाने वाले द्विवेदी जी की सोच भी इस प्रगतिशील चेतना की पूर्ववर्ती कड़ी थी , जिसको व्याख्यायित करने का प्रयास यहाँ डॉ नामवर जी ने किया है।
सौंदर्य को परिभाषित करते हुए द्विवेदी जी कहते हैं -- '' जो सम्पति परिश्रम से नहीं अर्जित की जाती , और जिसके संरक्षण के लिए मनुष्य का रक्त पसीने में नहीं बदलता , वह केवल कुत्सित रूचि को प्रश्रय देती है। सात्विक सौंदर्य वहां है , जहाँ चोटी का पसीना एड़ी तक आता है और नित्य समस्त विकारों को धोता रहता है। ''(112 -113 ) द्विवेदी जी की इस सौंदर्य-परम्परा को डॉ नामवर सिंह निराला के सौंदर्य-बोध --'' श्याम तन भर बंधा यौवन '' से जोड़ते हैं और प्रगतिशील सौंदर्य चेतना का आधुनिक क्रम निर्धारित करते हैं। द्विवेदी जी की इस सौंदर्य-चेतना का स्रोत लोक संस्कार था। किन्तु इस लोक में सौंदर्य-चेतना सुसुप्त अवस्था में पड़ी है क्योंकि जिस सामान्य जनता को पेटभर अन्न नहीं मिलता , वह सौंदर्य का सम्मान नहीं कर सकती। (114 )लेकिन इसके साथ ही द्विवेदी जी का यह भी स्पष्ट मानना था कि '' जो जाति 'सुन्दर' का सम्मान नहीं कर सकती , वह यह भी नहीं जानती कि बड़े उद्देश्य के लिए प्राण देना क्या चीज है। '' (114 ) नामवर जी इस चिंतन को विस्तार देते हुए लिखते हैं कि ''कोई जाति क्रांति जैसे बड़े उद्देश्य के लिए जान की बाज़ी लगाती है तो इसलिए कि वह सिर्फ जीना नहीं चाहती , बल्कि 'सुन्दर ' ढंग से जीना चाहती है। ''(115 )
द्विवेदी जी के अनुसार सौंदर्य रूप नहीं है , परन्तु वह रूप के बिना रह नहीं सकता। वे क्रियाशीलता को जीवन का रूप मानते हैं। वे लिखते हैं -- जीवन को सुन्दर ढंग से बिताने के लिए भी जीवन का एक रूप होना चाहिए। बहुत से लोग कुछ भी न करने को भलापन समझते हैं। यह गलत धारणा है। सुन्दर जीवन क्रियाशील होता है ; क्योंकि क्रियाशीलता ही जीवन का रूप है। क्रियाशीलता को छोड़कर जीवन का 'सौंदर्य' टिक नहीं सकता। ''(115 )
द्विवेदीजी सौंदर्यशास्त्र पर 'लालित्य-मीमांसा' नाम से एक पुस्तक भी लिख रहे थे जो दुर्भाग्यवश अधूरी रह गयी। नामवर जी कहते हैं कि 'द्विवेदी जी इस पुस्तक के माध्यम से लालित्यशास्त्र पर व्यवस्थित और सांगोपांग विचार करना चाहते थे जो उनके जीवन की सुदीर्घ सौंदर्य-चिंता और सौंदर्य-साधना की स्वाभाविक परिणति थी। ''(116 ) नामवरजी ने द्विवेदी जी की 'लालित्य-मीमांसा' के तीन सूत्रों की चर्चा की है। पहले सूत्र के अनुसार द्विवेदी जी सौंदर्य को सौंदर्य न कहकर 'लालित्य' कहना चाहते थे क्योंकि उनकी नज़र में मानव-रचित सौंदर्य का विशेष महत्व था। इसे और स्पष्ट करते हुए नामवर जी लिखते हैं -- '' समष्टिगत और व्यष्टिगत दोनों ही स्तरों पर द्विवेदी जी की सौंदर्य-दृष्टि मूलतः मानव केंद्रित ही है। इसका अर्थ सिर्फ यही नहीं कि सौंदर्य का स्रष्टा मनुष्य है , बल्कि यह भी कि सौंदर्य की सृष्टि करने के कारण ही मनुष्य मनुष्य है। '' (117 )
द्विवेदी जी की 'लालित्य-मीमांसा' का दूसरा सूत्र नामवर जी बंधन के विरुद्ध विद्रोह को मानते हैं अर्थात द्विवेदी जी की दृष्टि में कला और सौंदर्य की सृष्टि विलास मात्र नहीं बल्कि बंधनों के विरुद्ध विद्रोह है। 'लालित्य-मीमांसा' के तीसरे सूत्र की चर्चा करते हुए नामवर जी लिखते हैं - '' द्विवेदी जी की 'लालित्य-मीमांसा' का तीसरा सूत्र है कि सौंदर्य एक सर्जना है -- मनुष्य की सिसृक्षा का परिणाम है। ''(118 ) द्विवेदी जी सबसे अधिक बल इसी सिसृक्षा अर्थात मनुष्य की सृजनशीलता पर देते थे। तीनों सूत्रों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के पश्चात् डॉ नामवर सिंह द्विवेदी जी के सौंदर्य सम्बन्धी चिंतन का सार प्रस्तुत करते हुए कहते हैं -- '' जीवन का समग्र विकास ही सौंदर्य है। यह सौंदर्य वस्तुतः एक सृजन - व्यापार है। इस सृजन की क्षमता मनुष्य में अंतर्निहित है। वह सौंदर्य- सृजन की क्षमता के कारण ही मनुष्य है। इस सृजन-व्यापार का अर्थ है बंधनों से विद्रोह। इस प्रकार सौंदर्य विद्रोह है -- मानव-मुक्ति का प्रयास है। ''(118 )
-- प्रो० कुमार संकल्प -
आपका लेख बहुत ही सुंदर लगा।सौंदर्य विमर्श में मेरी भी काफी रुचि है।मेरी एक पुस्तक प्रकाशित होनी है,सौंदर्यशास्त्र पर।आपका लेख भी उसमें शामिल होता तो अच्छा रहता।
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