तुम्हारे साथ रहकर
तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे लगा है
कि हम असमर्थताओं से नहीं
संभावनाओं से घिरे हैं .
सर्वेश्वर
लोकतंत्र को जूते की तरह लटकाए
भागे जा रहें हैं ,
सभी सीना फुलाए .
सर्वेश्वर
लीक पर वे चलें
लीक पर वे चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारें हैं
हमें तो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पथ प्यारे हैं .
सर्वेश्वर
साम्यवाद हो या पूंजीवाद
मैं दोनों पर थूकता हूँ ,
और पूछता हूँ
जिसके पैरों में तुम
जूते नहीं दे सकते
उनके हाथ में तुम्हें
बंदूक देने का क्या अधिकार है ?
-सर्वेश्वर-
प्रार्थना
नहीं नहीं प्रभु तुमसे
शक्ति नहीं मांगूंगा
अर्जित करूँगा उसे मरकर बिखरकर
आज नहीं कल सही आऊंगा उबर कर
कुचला भी गया तो लज्जा किस बात की
रोकूंगा पहाड़ गिरता , शरण नहीं मांगूंगा .
- सर्वेश्वर-
अब मैं यह खिड़की नहीं खोलूँगा .
हवा को यदि आना हो तो तो आए
दरवाजे भडभडाये , तोड़ जाए ,
अन्यथा सीकंचों पर सिर टिका
रो- रो कर चली जाए.
किसी असमर्थ की प्रतीक्षा से
बंद कमरे की घुटन बेहतर है
जिसने खुद अपनी जबान काट ली हो
उससे नहीं बोलूँगा .
अब मैं यह खिड़की नहीं खोलूँगा .
-सर्वेश्वर-
हरो मत, साहस मत छोडो
इससे भी अथाह शून्य में
बौने ने तीन पगों में धरती नापी.
- धर्मवीर भारती -
अभी न हारो , अच्छी आत्मा
मैं हूँ , तुम हो और
अभी मेरी आस्था है .
-अज्ञेय -
दर्द के इस महानगर से कहो
सामने मेरे, न चीखे
मैं अकेला हूँ .
-सर्वेश्वर-
एक सूनी नाव
बार बार अपने भीतर दोहराता हूँ -
मैंने जो कुछ किया
ठीक किया ,
जो कुछ कर रहा हूँ
ठीक कर रहा हूँ,
जो कुछ करूँगा ठीक करूँगा .
अपने पर मेरी आस्था
इतनी छोटी नहीं है
कि वह इश्वर के कन्धों पर बैठ कर ही
इन पहाड़ियों के पार देख सकें .
- सर्वेश्वर-
धूल हो जिंदगी की सीलन से दीमक बनों
रातों -रात सदियों से बंद इन दरवाजों
दीवारों की खिड़कियाँ
और रोशनदान चल दो .
-सर्वेश्वर-
हल की तरह
कुदाल की तरह
या खुरपी की तरह पकड़ भी लूँ कलम को
तो भी फसल काटने को मिलेगी नहीं हमको
हम तो जमीन ही तैयार कर पाएंगे
क्रांति बीज बोने कुछ विरले आयेंगे
हरा-भरा वही करेंगे श्रम को
सिलसिला मिलेगा आगे मेरे क्रम को .
-सर्वेश्वर-
रो-गाकर आज़ादी लाये,पहन लंगोटी खादी
चार कदम चल नहीं पाए इतनी बढ़ गयी बादी
रंग तरबूजे का, महक खरबूजे की .
-सर्वेश्वर-
उसकी हर चोट मेरी हो
उसका हर घाव पहले मैं झेलूं
उसका हर संघर्ष मेरा हो
मैं उसके लिए होऊं
इतना ही मेरा होना है.
-सर्वेश्वर-
मैं उन पैरों के साथ रहूँ
उन्हें गर्म रखूँ
और जूते के कठोर स्पर्श को खुद झेल सकूँ .
-सर्वेश्वर-
मैं नहीं जनता कि इन गीतों में
आज और कितना जुड़ रहा है
केवल इतना जनता हूँ
कि अब जंगल और वहशी होते जा रहें हैं
और चाबुक और दर्दनाक .
-सर्वेश्वर-
यह बंद कमरा
सलामी मंच है
जहाँ मैं खड़ा हूँ
पचास करोड़ आदमी खली पेट
बजाते ठठरियां खडखड़ाते
हर क्षण मरे सामने से निकल जातें हैं.
-सर्वेश्वर -
--सर्वेश्वर---
तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे लगा है
कि हम असमर्थताओं से नहीं
संभावनाओं से घिरे हैं .
सर्वेश्वर
लोकतंत्र को जूते की तरह लटकाए
भागे जा रहें हैं ,
सभी सीना फुलाए .
सर्वेश्वर
लीक पर वे चलें
लीक पर वे चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारें हैं
हमें तो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पथ प्यारे हैं .
सर्वेश्वर
साम्यवाद हो या पूंजीवाद
मैं दोनों पर थूकता हूँ ,
और पूछता हूँ
जिसके पैरों में तुम
जूते नहीं दे सकते
उनके हाथ में तुम्हें
बंदूक देने का क्या अधिकार है ?
-सर्वेश्वर-
प्रार्थना
नहीं नहीं प्रभु तुमसे
शक्ति नहीं मांगूंगा
अर्जित करूँगा उसे मरकर बिखरकर
आज नहीं कल सही आऊंगा उबर कर
कुचला भी गया तो लज्जा किस बात की
रोकूंगा पहाड़ गिरता , शरण नहीं मांगूंगा .
- सर्वेश्वर-
अब मैं यह खिड़की नहीं खोलूँगा .
हवा को यदि आना हो तो तो आए
दरवाजे भडभडाये , तोड़ जाए ,
अन्यथा सीकंचों पर सिर टिका
रो- रो कर चली जाए.
किसी असमर्थ की प्रतीक्षा से
बंद कमरे की घुटन बेहतर है
जिसने खुद अपनी जबान काट ली हो
उससे नहीं बोलूँगा .
अब मैं यह खिड़की नहीं खोलूँगा .
-सर्वेश्वर-
हरो मत, साहस मत छोडो
इससे भी अथाह शून्य में
बौने ने तीन पगों में धरती नापी.
- धर्मवीर भारती -
अभी न हारो , अच्छी आत्मा
मैं हूँ , तुम हो और
अभी मेरी आस्था है .
-अज्ञेय -
दर्द के इस महानगर से कहो
सामने मेरे, न चीखे
मैं अकेला हूँ .
-सर्वेश्वर-
एक सूनी नाव
बार बार अपने भीतर दोहराता हूँ -
मैंने जो कुछ किया
ठीक किया ,
जो कुछ कर रहा हूँ
ठीक कर रहा हूँ,
जो कुछ करूँगा ठीक करूँगा .
अपने पर मेरी आस्था
इतनी छोटी नहीं है
कि वह इश्वर के कन्धों पर बैठ कर ही
इन पहाड़ियों के पार देख सकें .
- सर्वेश्वर-
धूल हो जिंदगी की सीलन से दीमक बनों
रातों -रात सदियों से बंद इन दरवाजों
दीवारों की खिड़कियाँ
और रोशनदान चल दो .
-सर्वेश्वर-
हल की तरह
कुदाल की तरह
या खुरपी की तरह पकड़ भी लूँ कलम को
तो भी फसल काटने को मिलेगी नहीं हमको
हम तो जमीन ही तैयार कर पाएंगे
क्रांति बीज बोने कुछ विरले आयेंगे
हरा-भरा वही करेंगे श्रम को
सिलसिला मिलेगा आगे मेरे क्रम को .
-सर्वेश्वर-
रो-गाकर आज़ादी लाये,पहन लंगोटी खादी
चार कदम चल नहीं पाए इतनी बढ़ गयी बादी
रंग तरबूजे का, महक खरबूजे की .
-सर्वेश्वर-
उसकी हर चोट मेरी हो
उसका हर घाव पहले मैं झेलूं
उसका हर संघर्ष मेरा हो
मैं उसके लिए होऊं
इतना ही मेरा होना है.
-सर्वेश्वर-
मैं उन पैरों के साथ रहूँ
उन्हें गर्म रखूँ
और जूते के कठोर स्पर्श को खुद झेल सकूँ .
-सर्वेश्वर-
मैं नहीं जनता कि इन गीतों में
आज और कितना जुड़ रहा है
केवल इतना जनता हूँ
कि अब जंगल और वहशी होते जा रहें हैं
और चाबुक और दर्दनाक .
-सर्वेश्वर-
यह बंद कमरा
सलामी मंच है
जहाँ मैं खड़ा हूँ
पचास करोड़ आदमी खली पेट
बजाते ठठरियां खडखड़ाते
हर क्षण मरे सामने से निकल जातें हैं.
-सर्वेश्वर -
खूंटियों पर ही टंगा रह जायेगा क्या आदमी ?
सोचता उसका नहीं नहीं , यह खूंटियों का दोष है.
--सर्वेश्वर---
एक तेंदुआ
सरे जंगल को
काले तेंदुए में बदल रहा है.
---तेंदुआ-- जंगल का दर्द (1976 )-सर्वेश्वर-
जब भी भूख से लड़ने
कोई खड़ा हो जाता है
सुन्दर दिखने लगता है
--भूख- जंगल का दर्द-- सर्वेश्वर
कंकडों में रेंग रहा है साँप
लाठियाँ मारने पर भी
वह सुरक्षित है.
जंगल का दर्द--
अब तुम मशाल उठा
भेड़िए के करीब जाओ
भेड़िया भागेगा
करोड़ों हाथों में मशाल लेकर
एक एक झाड़ी की ओर बढ़ो
सब भेड़िए भागेंगे .
भेड़िए--जंगल का दर्द--
तुम अभी फैसला नहीं ले प् रहे हो
मैं ले चूका हूँ, जाता हूँ.
पर यद् रखो
फैसले पर न पहुंचा हुआ आदमी
फैसले पर पहुंचे हुए आदमी से
ज्यादा खतनाक होता है.
--कुआनो नदी (1973 )--सर्वेश्वर-
मैं न घृणा करता हूँ. न प्यार
केवल समझना चाहता हूँ.
--कुआनो नदी-- सर्वेश्वर-
दिनभर तपते पत्थर पर बैठा हुआ मेरा विवेक
संभावनाओं की टूटती लहरों को फिर -फिर जोड़ता है.
--बांस का पुल(१९६३) -- सर्वेश्वर--
आदमी के प्यार पर विश्वास कर
एक लावारिश कुत्ता
एक घर की देहरी से बंधा रहा
और कल शीत में ठिठुर कर मर गया.
-- बांस का पुल -- सर्वेश्वर--
भीड़ में अकेला यदि खड़ा रहा
सब अपनी रह गये
कोई मेरे लिए रुका नहीं
किसी ने हाथ नहीं गहा
टूटे वायलिन -सा एक कोने में पड़ा
बजता सज सुनता रहा ,
अपने मन के अथाह सूनेपन में
मकड़ी -सा जल बुनता रहा .
-- बांस का पुल-- सर्वेश्वर--
संभावनाओं की टूटती लहरों को फिर -फिर जोड़ता है.
--बांस का पुल(१९६३) -- सर्वेश्वर--
आदमी के प्यार पर विश्वास कर
एक लावारिश कुत्ता
एक घर की देहरी से बंधा रहा
और कल शीत में ठिठुर कर मर गया.
-- बांस का पुल -- सर्वेश्वर--
भीड़ में अकेला यदि खड़ा रहा
सब अपनी रह गये
कोई मेरे लिए रुका नहीं
किसी ने हाथ नहीं गहा
टूटे वायलिन -सा एक कोने में पड़ा
बजता सज सुनता रहा ,
अपने मन के अथाह सूनेपन में
मकड़ी -सा जल बुनता रहा .
-- बांस का पुल-- सर्वेश्वर--
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