Thursday, November 6, 2014

यही सच है और मछलियाँ : एक  तुलनात्मक अध्ययन
 '' उसे लगा कि जैसे इस बीच विजी ने अपने को थोेड़ा -सा और दूर हटा लिया  है। दोनों के बीच की दुरी , अनकही बातों की दीवार बढाती जा रही है। ''  - 95
           कहानी के ये संवाद  वे बिंदु हैं जहाँ से कहानी के कई आयाम खुलते हैं।

'' वाशिंगटन में मैंने  एक नाटक देखा था ,  जो बहुत पसंद आया।  'छोटी मछली , बड़ी मछली' . जिसमे  बड़ी मछली छोटी मछलियों को निगलती रहती है। तब से कभी कभी सोचती हूँ कि  क्या छोटी मछली उलटकर वार  नहीं कर सकती ?'' -- ९५
नत्रजन विजी से पूछता है -- ''घर में सब ठीक है? पिता, भाई -बहन.?
वीजी ने इस पर्श्न पर चकित आँखें उठायी और कहा , '''"वे लोग मुझे चिट्ठी ही कहाँ लिखते हैं .'' -- ९५

'' अच्छा नटराजन , वह तुम्हें वह बहुत पसंद है ?बहुत अच्छी लगती है ?'' - ९५

यह स्थिति क्यों है।  क्यों वह मनीष  का इंतजार करना चाहती हैै? क्यों चाहती है कि नटराजन शादी न करे।  क्यों  नटरान मूकी और वीजी किसी के भी साथ सम्पूर्णतः अटैच  नहीं है। कुछ ऐसी  ही स्थिति वीजी की  भी  है।  क्यों?

ऐसा क्यों है कि अपने दोस्त की गर्ल फ्रेंड  के प्रति   आकर्षण  को लेकर नटराजन के मन में कोई नैतिक बोध नहीं  है? यह जानते हुए भी कि मनीष अच्छा लडका नहीं वह उससे दोस्ती नहीं तोडता क्यों? वह  वीजी को भी मनीष का सच क्यों नहीं बताता ? वीजी मनीष  का सच जानकर भी उससे अलग क्यों नही हो पाती ?  यह अवचेतन में निहित भोगवाद है या ह्रदय जगत का मूल्य विहिन हो जाना है अथवा प्रेम  है ? अवचेतन मन से काटकर इस कहानी को   नहीं पढा जा सकता , क्योंकि नटराजन और वीजी दोनों में कम्प्लेक्स हैै।  उनके इस काम्प्लेक्स में उनकी उलझन का  एक बडा रहस्य छिपा है।  मनीष  और मूकी में यह कम्प्लेक्स नहीं है। इसीलिए वे जटिल उलझन में नहीं हैं।  प्रमाण कि नटराजन सोचता है कि उसमें ऐसा है क्या कि वह मूकी को रिझा सके , बांध सके ?  मनीष  के प्रति सब सहज आकृष्ट  हैं ,। मनीष  इन दोनों लड़कियों को भोग चुका है। जरा सोचिये यह बात सोचकर ही  नटराजन  को कितनी फ़्रस्ट्रेशन होती होगी ? फ़्रस्ट्रेशन इसलिए कि  नटराजन  तेज है , प्रतिभावान है , मेहनती है , अछा और ईमानदार इंसान  है , सचा है , कमिटेड है , यानि मनुष्यता  की कमी नही फिर भी उपेक्षित है , इसके विपरीत मनीष  धोखेबाज़ है  , हर लड़की को केवल भोग की निगाह से देखता है  , किसी के प्रति कमिटेड नही है, गुणवान और कामयाब भी नही है , केवल सुन्दर है और इस एक क्वालिटी पर  सारी  मनुष्यता कुर्वान ?   विजय लक्ष्मी मनीष के  लिए पागल है , घर और  अपनों को छोड़कर उसके पीछे भागी आई , मुकी भी मनीष के ही  पीछे- पीछे घूमती रही। इसमें   में नटराजन  को क्या मिला? मनीष का फेका जूठा ! अगर नटराजन  जैसे लड़के इन्हे अपनाने से इंकार कर दें तो इधर ये गहरे अकेलेपन की शिकार होंगे   और उधर वे  गहरी  अकेलेपन की  शिकार होंगी  ! सवाल मूल्यों के  विगलन का है। बाजार और पूंजी के खेल ने दुनिया को भोगवादी बना दिया है। जीवन के केंद्र में मूल्यों  की  जगह भोग स्थापित हो गया है।  फलस्वरूप शरीर , रूप और पैसा जीवन के केंद्र  में आ गये हैं  और बाकी  हर चीज गहरे तौर पर उपेक्षित हो गयी है। पूरी दुनिया भोग वनाम मूल्य के संघर्ष से गुजर रही  है।  चुकि  शक्ति पूंजी केंद्रित है और पूंजी भोग के दर्शन को बढ़ावा देती है फलस्वरुप  जीवन की ये सारी  विसंगतियां मनुष्य की अनेकशः कुंठाओं और उपेक्षाओं  से भर रही है। सवाल यह  नही कि  जिनके पास रूप और पैसा है वे सबकुछ हासिल कर लेंगे , और जिस इस खाने में फिट नहीं बैठते उन्हें कुछ नहीं मिलेगा बल्कि एक वक्त के बाद विजी और मुकी जैसी हर लड़की  उपेक्षा की शिकार होगी क्योंकि  रूप और भोग की दुनिया ही ऐसी है कि जहाँ  कोई लॉन्ग लाइव नही होता। यहाँ जो ज्यादा चमकता है उसीकी मार्केट  होती है , चमक फीकी पड़ी ,बाजार से आउट। ऐसा इसलिए की इस बाजार में मूल्य नही चमक देखी  जाती है। यह स्त्री मुक्ति का ऐसा प्रलोभन है  जहाँ  सबसे अधिक दर्द  स्त्रियों को ही मिलता है ,सबसे अधिक वही  उपेक्षित होती  हैं , बाजार से आउट डेटेड होती हैं।
नटराजन को यह सवाल बहुत परेशान करते हैं , शायद नटराजन  जैसे हर पुरुष को करेंगे -- ''और ऐसी साधना मनीष के लिए ! मनीष , जिसने की एक दिन बहुत ठंढे , अनासक्त भाव से कह दिया था : विजी के   लिए मेरे मन में अब कुछ नहीं बचा।  सीधी , सरल , अनकम्प्लीकेटेड  लड़की है। मुझे बांध सके , संतुष्टि दे सके ऐसी मानसिक गहराइयाँ नहीं हैं उसमे।मुझे पत्नी चाहिए तो मुकी जैसी  कलात्मक , स्फूर्तिदायक , इंटलैक्टुअल। ' फिर उसे मुकी भी  बांध न सकी। '' - ९७
सवाल है कि  स्त्रियों को  मनीष जैसे लोग अधिक क्यों पसंद हैं ? उनकी आँखों में मनीष के लेकर ही  क्यों दर्द है? ? उनका अंतर्जगत   मनीष  के दर्द को क्यों संजोये है (मुकी) . समाज मनीष के रास्ते पर क्यों चल पड़ा है? मनीष का मार्ग ही एक मात्र सत्य क्यों बनता जा रहा है आज के समय में ?नटराजन  के रास्ते के लिए कितनी  जगह बची है आज की दुनिया में ?
विजी नटराजन से कहती है --'' न जाने क्यों तुम्हें सम्मुख पाकर मैं बिखरने लगती हूँ --  जो कुछ  तहों में छिपा छिपाकर रखती हूँ , तुम्हारे आगे चीख-चीख कर कहना चाहती हूँ। -  - ९७
मुकी नटराजन और बीजी की तरह पूरी दुनिया ही साथ रहते हुए भी गहरे अकेलेपन से भर गयी है। इसके पीछे का कारण  क्या है?  बीजी और नटराजन  बेस्ट फ्रेंड हैं , हर बात  शेयर करते हैं , मुकी उसकी पत्नी बनने जा रही है,  , फिर भी सब  अकेलापन क्यों फील कर रहें हैं ? इसकी गहराई   में गए बिना आप भारतीयों समाज की इन विकट  समस्याओं को समझ नहीं सकते।

Thursday, June 19, 2014

मोदी महाभिनिष्क्रमण

जशोदा बेन SAID ----

                  राजनीतिक महाभिनिष्क्रमण पर जाते
                  प्रिय हमसे पूछकर न सही
                  कहकर तो जाते।
क्या मुझको अपनी पथ-बाधा  ही पाते ?
                 संघ के महाबोधि के निचे ,
                 अपने पाया कुर्सी का मार्ग,
                 आप मेरे लिए पलभर भी नहीं पछताते ,
                 प्रिय ! एकबार कहकर तो जाते।
वर्षों रहे सन्यास जीवन में ,
राजनीतिक सत्य तलासते।
गोधरा ने दिया वह मार्ग
                जनसंहार के लिए तनिक न पछताते
                 प्रिय ! एकबार कहकर तो जाते।
हिंदुत्व  और साम्प्रदायिकता
का मिला सत्य महान
आपने दिया राष्ट्र को
नव हिंदुत्वा का नया मार्ग
                  गर्व से आपकी पीठ राजनाथ थपथपाते
                  प्रिय ! एकबार कहकर तो जाते।
आडवाणी की कुर्सी छीनी ,
अडानी को गले लगाया
देश की महिलाओं को सुरक्षा देते
बस भूल गए हमारा मार्ग
                एकबार इधर भी तो आते
                प्रिय ! एकबार कहकर तो जाते।
मैं आपकी  सफलता के लिए करती उपवास
करती कठोर कई व्रत
तीर्थ करती निभाती रही पतिव्रत
              क्या आपकी  आँखों में कभी आंसू नहीं आते
              प्रिय ! एकबार कहकर तो जाते।
मोदी---
राजनीतिक महाभिनिष्क्रमण पर जाते
गोपा , हम तुम्हे कैसे ले जाते ?
जशोधरा ----
                 राहुल तू निर्णय कर इसका
                 न्याय पक्ष लेता है किसका
               माँ मेरी क्या बानी
               मैं तो बस देख रहा कहानी


नेताजी तुम्हरे घर पैसा कहाँ से आया ?

नेताजी तुम्हरे घर पैसा कहाँ से आया ?
देशभर में बेकारी ने है मुँह फैलाया ,
                 नेताजी तुम्हरे घर .............
गरीबों के बच्चे हैं भूखे ,
प्रसूतियों के होठ हैं सूखे ,
अपने भविष्य से नवयुवक हैं हताश ,
महंगाई ने है अपना रंग दिखलाया ,
नेताजी तुम्हरे घर सोना-चांदी कहाँ से आया ?
                     नेताजी तुम्हरे घर .............

लुटती इज्जत से युवतियाँ हैं हताश ,
अपनी सुरक्षा से खुद पुलिस भी है निराश ,
हर जगह असुरक्षा ने है मुँह फैलाया ,
नेताजी तुम्हरे लिए जेड (z) प्लस कहाँ से आया ?
                    नेताजी तुम्हरे घर .............

युवकों को मिलता नहीं रोजगार ,
सब लूट लेता है बाजार ,
बाजार की माया ने है जाल फैलाया ,
नेताजी तुम्हरी  मुट्ठी में  बाजार कहाँ से आया ?
                   नेताजी तुम्हरे घर .............

क्यों सब (जनता ) तुम्हरे जैसा नहीं ,
बस-भाड़े के पैसे नहीं पब्लिक को,
यह राज समझ नहीं आया कि
तुम्हरे निकम्मे लाडले के पास
मर्सिडीज कहाँ से आया ?
नेताजी तुम्हरे घर इतना माल कहाँ से आया ?
                नेताजी तुम्हरे घर .............

गाँव में हमारे एक जिगरी दोस्त हैं -- सुशील शास्त्री। उन्होंने बच्चन जी की कविता पढ़कर अपनी कविता बना डाली है।  खुश होकर उन्होंने फोन पर मुझे सुनाया, सोचा आपसब से शेयर करूँ।

इस पार प्रिय तुम हो
इस पार प्रिय तुम हो , मोबाईल है ,
उस पार न जाने क्या होगा !
तुम भेजकर मैसेज मेरा मन बहला देती हो ,
तुम्हारे बिना जीवन का हश्र न जाने क्या होगा!
तेरे मैसेज से दिल की धड़कन बढ़ जाती है
सोचो  तेरे कॉल से क्या होगा !
अभी तो इतनी ख़ुशी है , चहक है ,
फिर न जाने क्या होगा !
आँखें देख जहाँ तक पाती हैं,
तुम ही तुम नज़र आती हो ,
तुम लहराकर अपना नीला दुपट्टा
मेरा मन -सागर लहरा देती हो ,
इस पार प्रिय ....

तुम्हारी तस्वीर
आंसुओं  से खाली हो जाती हैं जब आँखें
उनमें भरने की कोशिश करता हूँ
तुम्हारी तस्वीर।
दिल में जगह नहीं हैं
वहाँ ठूस - ठूस कर भरी हैं
तुमसे जुड़ीं तमाम भावनाएँ।  

Thursday, June 5, 2014

दंगे और उनके कारण ( riots and their causes/ data of riots )

   दंगे और उनके कारण

सन ------------  सितम्बर 1924
 स्थान ------------ पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त
मृतकों की संख्या --------------155
कारण ------------- यह एक हिन्दू-विरोधी उपद्रव था , कारणों का मुझे ठीक ठीक पता नहीं।

 सन ------------  1926 अप्रैल से जुलाई के बीच 3 दंगे हुए।
 स्थान ------------ कोलकाता
मृतकों की संख्या --------------138
कारण -------------

सन ------------  1924
 स्थान ------------ ढाका , पटना , रावलपिंडी , दिल्ली 
मृतकों की संख्या --------------
कारण -------------

सन ------------ 1923 -1927  ( 91 दंगे )
 स्थान ------------  संयुक्त प्रान्त ( यह उस समय सर्वाधिक दंगा प्रभावित इलाका था )
मृतकों की संख्या-------
कारण ------------- हिन्दू कहते थे कि गो-हत्या बंद हो और मुस्लिम कहते थे कि मस्ज़िदों के सामने बाजे न बजाएं जाएं। कितना नॉनसेंस झगड़ा था।  क्या कोई पढ़ा-लिखा समाज इन नॉनसेंस बातों के लिए सैकड़ों की जानें ले सकता है ?

सन ------------  
 स्थान ------------ 
मृतकों की संख्या-------
कारण -------------

सन ------------  
 स्थान ------------ 
मृतकों की संख्या-------
कारण -------------

संस्कृति और सौंदर्य -- डॉ० नामवर सिंह ( culture and aesthetics )

संस्कृति और सौंदर्य -- डॉ० नामवर सिंह 

'दूसरी परम्परा की खोज' नामवर जी की प्रसिद्द पुस्तक है। इस पुस्तक में नामवर जी द्विवेदी जी को दूसरी परम्परा का जनक मानते हुए उनके समस्त सैद्धांतिक और व्यवहारिक आलोचना का सारगर्भित विवेचन प्रस्तुत करते हैं।  इसी क्रम में उन्होंने 'संस्कृति और सौंदर्य' नामक निबंध में  द्विवेदी जी के संस्कृति एवं सौंदर्य सम्बन्धी दृष्टिकोण की व्यापकता और प्रासंगिकता का उद्घाटन किया है। इस लेख में डॉ० नामवर सिंह ने दो बातों -- संस्कृति और सौंदर्य पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया है ।सन्दर्भ उन्होंने द्विवेदी जी का ही दिया है , मगर उसी बहाने इन विषयों पर डॉ सिंह ने अपना  विचार  भी रखा है जो इन  विषयों को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं। यह अनायास नहीं है कि प्रत्येक प्रगतिशील विचारकों के लिए संस्कृति और सौंदर्य का प्रश्न प्रमुख रूप से विचारणीय रहा है , क्योंकि इनपर संस्कृति-विरोधी होने के साथ साथ सौंदर्य विरोधी होने का भी आरोप लगता रहा है। असल में ये न तो कभी संस्कृति विरोधी रहे और न ही सौंदर्य विरोधी। बल्कि ये इन दोनों में जो अभिजात्यपन का अतिरेक था या यूँ कहें कि संस्कृति और सौंदर्य को अभिजात्य का हिस्सा मान लिया गया था , उससे इनका विरोध था। इनकी विवेचनाओं से संस्कृति और सौंदर्य का असली रूप सामने आया और पारम्परिक गलत व्याख्याओं और धारणाओं से मुक्ति मिली।
              संस्कृति को लेकर समय समय पर तरह- तरह से विचार -विमर्श होता रहा है। कुछ राजनीति प्रेरित तो कुछ स्वार्थ प्रेरित।  इस विमर्श में द्विवेदी जी ने संस्कृति के जिन बुनियादी गुणों की ओर इशारा किया था , उसपर पर्दा डालकर सभी विश्लेषक खुद को संस्कृति के  नए विमर्शकार के रूप में स्थापित करने लगे।एक राजनीति से प्रेरित होकर दिनकरजी ने ''संस्कृति के चार अध्याय'' की रचना की और मिश्र संस्कृति के स्वरुप को स्थापित किया तो दूसरी राजनीति के तहत अज्ञेय ने संस्कार-धर्मी संग्राहक संस्कृति की वकालत की। नामवरजी लिखते हैं -- '' यदि दिनकर की ' मिश्र संस्कृति ' की एक राजनीती है तो अज्ञेय की संस्कार-धर्मी संग्राहक संस्कृति भी किसी और राजनीति के अनुषंग से बच नहीं जाती।  '' ( 105 )नामवर जी का इशारा साफ समझा जा सकता है।
द्विवेदी जी ने भारतीय संस्कृति का सच उजागर करते हुए कहा था कि वह गन्धर्व , यक्ष , किन्नर आदि आर्येतर जातियों के विश्वासों और सौंदर्य कल्पनाओं का सबसे अधिक ऋणी है।  (103 ) उनकी यह स्थापना किसी खास मकसद की उपज नहीं थी और न ही किसी तरह की राजनीति से प्रेरित।  वह तो उनके अतीतकालीन  साहित्य के अध्ययन और चिंतन की स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी। असल में संस्कृति को लेकर दक्षिणपंथी सोच हमेसा विशुद्धतावाद पर जोर देती  रही  है। इस विशुद्धता पर न केवल वह गर्व करती  रही  है बल्कि इस आर्य संस्कृति को वह सर्वश्रेष्ठ भी मानती  रही  है और इसके लिए वह तरह -तरह का तर्क भी गढ़ती  रही  है। इसका विरोध करते हुए द्विवेदी जी लिखते हैं -- '' देश और जाति की विशुद्ध संस्कृति केवल बात की बात है।  सबकुछ में मिलावट है , सबकुछ अविशुद्ध है। '' द्विवेदी जी यह भलीभांति समझते थे कि भारतीय संस्कृति का स्वरुप आर्येतर जातियों की देंन को स्वीकार किये बिना निर्मित नहीं होता। मगर आर्य संस्कृति के विशुद्धतावादी पक्षधर इसे कत्तई स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। द्विवेदी जी ने इसी सोच पर हमला किया था। नामवर जी ने ठीक लिखा है --'' और सच कहा जय तो आर्य संस्कृति की शुद्धता के अहंकार पर चोट करने के लिए ही ' अशोक के फूल ' लिखा गया है , प्रकृति-वर्णन के लिए नहीं। यह निबंध द्विवेदी जी के शुद्ध पुष्प -प्रेम का प्रमाण नहीं , बल्कि संस्कृति-दृष्टि का अनूठा दस्तावेज है। '' (१०४)

                       दिनकर जी के संस्कृति-चिंतन ( संस्कृति के चार अध्याय ) को अज्ञेय जी ने 'मिश्र संस्कृति ' का आग्रह करार देते हुए उसे राजनीति प्रेरित बताया था। अज्ञेय जी का स्पष्ट मानना था कि '' संस्कृतियाँ प्रभाव ग्रहण करती हैं , अपने अनुभव को समृद्धतर बनाती हैं , लेकिन यह प्रक्रिया मिश्रण की नहीं है। '' (104 ) अज्ञेय जी संस्कृति की संग्राहकता पर जोर देते हैं और उसके मूल रूप को शुद्ध मानते हैं। द्विवेदी जी का मत इन दोनों से भिन्न है। द्विवेदी जी संस्कृति के दोनों पक्षों -- 'संग्राहकता और त्याग' दोनों पर जोर देते हैं --- '' हमारे सामने समाज का आज जो रूप है वह न जाने कितने ग्रहण और त्याग का रूप है। '' (105 ) द्विवेदी जी के चिंतन को आगे बढ़ाते हुए नामवर जी समकालीन सन्दर्भों में संस्कृति के प्रति आसक्ति या मोह को जड़ता बताते हैं।  वे इस सन्दर्भ में द्विवेदी जी को कोट करके दरअसल संस्कृति के विषय में अपने प्रगतिशील पक्ष को ही वाणी देते हैं -- '' आज हमारे भीतर जो मोह है , संस्कृति और कला के नाम पर जो आसक्ति है , धर्माचार और सत्यनिष्ठा के नाम पर जो जड़िमा है ( द्विवेदीजी) 'उसे किस प्रकार ध्वस्त किया जाय (नामवरजी)?'' द्विवेदी जी ने संस्कृति के प्रति जिस 'मोह और जड़ता' को बाधक तत्वों के रूप में विश्लेषित किया था , उन बाधक तत्वों को ध्वस्त करने की चिंता दरअसल समय की प्रगतिशील चिंता थी जो तब और प्रांसगिक हो उठी थी जब दो ध्रुवीय राजनीति से प्रेरित मिश्र और शुद्ध संस्कृति  की टकराहट आकार ग्रहण करने लगी थी। राजनीति की एक धारा से प्रेरित होकर दिनकर जी ने मिश्र संस्कृति का आग्रह प्रस्तुत किया तो दूसरी धारा से प्रेरित होकर अज्ञेय जी ने उसकी संग्राहकता पर जोर देते हुए कहीं न कहीं उसकी शुद्धता की वकालत की। शुद्धतावादी खेमे वालों का स्पष्ट मानना था कि '' अतर्क्य भावों , अनुभूतियों और आध्यात्मिक उपलब्धियों के स्तर पर संस्कृतियों का वास्तविक मिलन अत्यंत कठिन होता है। ''( डॉ. गोविंदचंद्र पांडे , 106 ) उनलोगों का मानना था कि संस्कृति की   तथाकथित सामासिकता वास्तव में सभ्यता के क्षेत्र में ही लागू होती है। (106 ) संस्कृति के प्रति इस तरह के जड़ आग्रह से कोई भी प्रगतिशील खेमे का चिंतक सहमत नहीं हो सकता।नामवर जी ने मिश्र संस्कृति और विशुद्ध संस्कृति की राजनीति पर प्रहार करते हुए लिखा -- '' यदि दिनकर की सामासिक संस्कृति का सम्बन्ध राजनीति के एक पक्ष से है तो स्वयं अज्ञेय और गोविनचन्द्र पांडे की 'शुद्ध संस्कृति' का सम्बन्ध भी राजनीति के दूसरे पक्ष से जोड़ा जा सकता है। '' (106 )
         कुल मिलाकर नामवर जी द्वारा इस निबंध के माध्यम से द्विवेदी जी के संस्कृति चिंतन को उजागर करने का मूल उद्देश्य यही था कि तथाकथित खुद को आधुनिक और प्रगतिशील समझने वाले  संस्कृति को लेकर कितने जड़ हैं जबकि संस्कार एवं विचार  से पूर्णतः धार्मिक और सवभाव से आचार्य और कुछ हद तक दक्षिणपंथी समझे जाने वाले द्विवेदी जी का संस्कृति- चिंतन कितना प्रगतिशील एवं उदार है ।द्विवेदी जी के अनुसार 'शुद्ध संस्कृति' का आग्रह एक प्रकार का मोह है जो बाधा उपस्थित करता है।  यह संस्कृति के क्षेत्र में वर्जनशीलता को जन्म देता है।  पुराने के प्रति संस्कारवश मोह होता है , परन्तु यह भी सच है कि प्राचीन काल की बहुत सारी उपयोगी एवं संगत मान्यताएँ समय के प्रवाह में अनुपयोगी एवं अप्रासंगिक हो जाती हैं।  अतीत के प्रति यह श्रद्धाभाव अन्य देश और अन्य जाति के साहित्य और संस्कृति को समझने में बाधक बनते हैं।  द्विवेदी जी को मोहासक्त संस्कृति-भक्तों से बार - बार टकराना पड़  रहा था  ( कभी तुलसी और सूर  को भी टकराना पड़ा था ) और उसी चिंतन - परम्परा को आगे बढ़ाते हुए डॉ. नामवर सिंह भी इस मोहासक्ति पर प्रहार कर रहे हैं और इस विश्लेषण में द्विवेदी जी की हिन्दू आचार्य वाली छवि की जगह एक प्रगतिशील विचारक वाली छवि भी बनती चलती है और इसके ठीक विपरीत अस्तित्ववादी , नास्तिक आस्थावाले समय के प्रवाह में कैसे दक्षिणपंथ की ओर झुकते गए , इस ओर भी संकेत होता चलता है।

         द्विवेदी जी का संस्कृति संघर्ष पंडितों की इकहरी परम्परा की संकीर्णता के विरुद्ध भारतीय संस्कृति की विविधता , जटिलता , परस्पर विरोधी जीवंतता और समृद्धि के पुनःसृजन के स्वरुप को उद्घाटित करने का संघर्ष है। द्विवेदी जी के पहले प्रसाद को भी ऐसे ही संघर्ष से गुजरना पड़ा था -- '' सुरुचि- सम्बन्धी विचित्रताओं को बिना देखे ही अत्यांत शीघ्रता में आजकल अमुक वस्तु अभारतीय है अथवा भारतीय संस्कृति की सुरुचि के विरुद्ध है , कह देने की परिपाटी चल पड़ी है।  ..... ये सब भावनाएँ साधारणतः हमारे विचारों की संकीर्णता से और प्रधानतः अपनी स्वरुप - विस्मृति से उत्पन्न हैं। '' (१०८)
               
सौंदर्य को, प्रगतिशील चिंतन के आरम्भ के  पहले तक केवल अभिजात्य का ही हिस्सा समझा जाता रहा।  पहली बार प्रेमचंद ने सौंदर्य के अभिजात्य परिभाषा और चिंतन को चुनौती देते हुए लिखा कि सौंदर्य केवल महलों में ही नहीं बल्कि मेड़ पर बैठी , बच्चे को दूध पिलाती उस पिचकी गाल वाली औरत में भी हो सकती है। जब सर्वेश्वर ने कहा कि '' भूख से लड़ने जब कोई खड़ा हो जाता है / सुन्दर दिखने लगता है'' , तब उनका इशारा इसी प्रगतिशील सौंदर्य चेतना की ओर था।  परम्परावादी कहे जाने वाले द्विवेदी जी की सोच भी इस प्रगतिशील चेतना की पूर्ववर्ती कड़ी थी , जिसको व्याख्यायित करने का प्रयास यहाँ डॉ नामवर जी ने किया है।

                   सौंदर्य को परिभाषित करते हुए द्विवेदी जी कहते हैं -- '' जो सम्पति परिश्रम से नहीं अर्जित की जाती , और जिसके संरक्षण के लिए मनुष्य का रक्त पसीने में नहीं बदलता , वह केवल कुत्सित रूचि को प्रश्रय देती है।  सात्विक सौंदर्य वहां है , जहाँ चोटी का पसीना एड़ी तक आता है और नित्य समस्त विकारों को धोता रहता है। ''(112 -113 ) द्विवेदी जी की इस सौंदर्य-परम्परा को डॉ नामवर सिंह निराला के सौंदर्य-बोध --'' श्याम तन भर बंधा यौवन '' से जोड़ते हैं और प्रगतिशील सौंदर्य चेतना का आधुनिक क्रम निर्धारित करते हैं। द्विवेदी जी की इस सौंदर्य-चेतना का स्रोत लोक संस्कार था। किन्तु इस लोक में सौंदर्य-चेतना सुसुप्त अवस्था में पड़ी है क्योंकि जिस सामान्य जनता को पेटभर अन्न नहीं मिलता , वह सौंदर्य का सम्मान नहीं कर सकती।  (114 )लेकिन इसके साथ ही द्विवेदी जी का यह भी स्पष्ट मानना था कि '' जो जाति 'सुन्दर' का सम्मान नहीं कर सकती , वह यह भी नहीं जानती कि बड़े उद्देश्य के लिए प्राण देना क्या चीज है। '' (114 ) नामवर जी इस चिंतन को विस्तार देते हुए लिखते हैं कि ''कोई जाति क्रांति जैसे बड़े उद्देश्य के लिए जान की बाज़ी लगाती है तो इसलिए कि वह सिर्फ जीना नहीं चाहती , बल्कि 'सुन्दर ' ढंग से जीना चाहती है। ''(115 )

                               द्विवेदी जी के अनुसार सौंदर्य रूप नहीं है , परन्तु वह रूप के बिना रह नहीं सकता। वे क्रियाशीलता को जीवन का रूप मानते हैं। वे लिखते हैं -- जीवन को सुन्दर ढंग से बिताने के लिए भी जीवन का एक रूप होना चाहिए। बहुत से लोग कुछ भी न करने को भलापन समझते हैं। यह गलत धारणा है। सुन्दर जीवन क्रियाशील होता है ; क्योंकि क्रियाशीलता ही जीवन का रूप है।  क्रियाशीलता को छोड़कर जीवन का 'सौंदर्य' टिक नहीं सकता। ''(115 )

   द्विवेदीजी सौंदर्यशास्त्र पर 'लालित्य-मीमांसा' नाम से एक पुस्तक भी लिख रहे थे जो दुर्भाग्यवश अधूरी रह गयी।  नामवर जी कहते हैं कि 'द्विवेदी जी इस पुस्तक के माध्यम से लालित्यशास्त्र पर व्यवस्थित और सांगोपांग विचार करना चाहते थे जो उनके जीवन की सुदीर्घ सौंदर्य-चिंता और सौंदर्य-साधना की स्वाभाविक परिणति थी। ''(116 ) नामवरजी ने द्विवेदी जी की 'लालित्य-मीमांसा' के तीन सूत्रों की चर्चा की है। पहले सूत्र के अनुसार द्विवेदी जी सौंदर्य को सौंदर्य न कहकर 'लालित्य' कहना चाहते थे क्योंकि उनकी नज़र में मानव-रचित सौंदर्य का विशेष महत्व था।  इसे और स्पष्ट करते हुए नामवर जी लिखते हैं -- '' समष्टिगत और व्यष्टिगत दोनों ही स्तरों पर द्विवेदी जी की सौंदर्य-दृष्टि मूलतः मानव केंद्रित ही है। इसका अर्थ सिर्फ यही नहीं कि सौंदर्य का स्रष्टा मनुष्य है , बल्कि यह भी कि सौंदर्य की सृष्टि करने के कारण ही मनुष्य मनुष्य है। '' (117 )

            द्विवेदी जी की 'लालित्य-मीमांसा' का दूसरा सूत्र नामवर जी बंधन के विरुद्ध विद्रोह को मानते हैं अर्थात द्विवेदी जी की दृष्टि में कला और सौंदर्य की सृष्टि विलास मात्र नहीं बल्कि बंधनों के विरुद्ध विद्रोह है। 'लालित्य-मीमांसा' के तीसरे सूत्र की चर्चा करते हुए नामवर जी लिखते हैं - '' द्विवेदी जी की 'लालित्य-मीमांसा' का तीसरा सूत्र है कि सौंदर्य एक सर्जना है -- मनुष्य की सिसृक्षा का परिणाम है। ''(118 ) द्विवेदी जी सबसे अधिक बल इसी सिसृक्षा अर्थात मनुष्य की सृजनशीलता पर देते थे। तीनों सूत्रों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के पश्चात् डॉ नामवर सिंह द्विवेदी जी के सौंदर्य सम्बन्धी चिंतन का सार प्रस्तुत करते हुए कहते हैं -- ''  जीवन का समग्र विकास ही सौंदर्य है।  यह सौंदर्य वस्तुतः एक सृजन - व्यापार है।  इस सृजन की क्षमता मनुष्य में अंतर्निहित है।  वह सौंदर्य- सृजन की क्षमता के कारण ही मनुष्य है। इस सृजन-व्यापार का अर्थ है बंधनों से विद्रोह। इस प्रकार सौंदर्य विद्रोह है -- मानव-मुक्ति का प्रयास है। ''(118 )

                                                                                                -- प्रो० कुमार संकल्प - 

Wednesday, June 4, 2014

' बाघ '( केदारनाथ सिंह ) का प्रतीकार्थ( bagh- kedarnath singh )

' बाघ '( केदारनाथ सिंह ) का प्रतीकार्थ 

समाज के प्रगतिशील तत्वों और मानव के उच्चतर मूल्यों को बचाने की चिंता ही कवि केदारनाथ सिंह के काव्य की केंद्रीय चिंता है।  तीसरे सप्तक से अपनी पहचान कायम करनेवाले कवि केदारनाथ सिंह कविता में बिम्ब-विधान को लेकर काफी चर्चित रहे।  ' बाघ' शीर्षक कविता उनकी सबसे लम्बी कविता है।  यह 16 खण्डों में विभक्त है।  प्रत्येक खण्ड स्वतंत्र भी हैं और परस्पर सम्बद्ध भी। इसका दसवाँ खण्ड एक स्वतंत्र कविता के रूप में ' अकाल में सारस' संग्रह में ' सड़क पर दिख गए कवि त्रिलोचन ' शीर्षक से भी संकलित है।  ' बाघ ' के बारे में डॉ. नंदकिशोर नवल की टिप्पणी है -- '' अब तक केदार जी जिस मूल्य को उपलब्ध करने के लिए काव्य-रचना करते आरहे थे , यह कविता वस्तुतः उसी को ' बाघ ' के रूप में मूर्त वा प्रतीकीत करती है। '' (159 ) स्पष्ट है डॉ. नंदकिशोर नवल बाघ को कवि की रचनात्मक उपलब्धि और  उसकी काव्य-यात्रा की उपलब्धि के रूप में देखते हैं।
                            बाघ केदारजी की कई कविताओं में आया है।  यह बाघ उनके लिए भय या हिंसा का प्रतीक नहीं है।  डॉ नंदकिशोर नवल ने लिखा है -- '' यह बाघ उनकी कविता में सौंदर्य का एक बहुत पूर्ण प्रतीक बनकर अपने पूरे बाघ-पन , इंसान-पन और सुन्दर-पन के साथ उपस्थित हुआ है। ''(159 ) अर्थात उनके हिसाब से बाघ यहाँ सौंदर्य , इंसानपन और सुंदरपन का प्रतीक है।  वे इस बाघ की विशेषता को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि  वह सबसे पहले एक बाघ है। अपने बाघपन में ही उसका बिम्ब सहज ग्राह्य हो पाता है। उसके बाद वह इंसानपन के प्रतीक के रूप में दाखिल होता है -- एक बेहद संवेदनशील इंसान के तौर पर जिसे शहर से इसलिए घृणा है कि यहाँ ' हार्दिकता'  नहीं है ,  केवल औपचारिकता और व्यवसायिकता है।(160 )  यहीं अज्ञेय की 'सांप'  कविता याद आती है , जिसमें शहर की इसी अमानवीय स्थिति की ओर ईशारा है। यह अनायास नहीं है कि बाघ को गाँव का ट्रैक्टर , खेत , अनाज के दाने और किसान-जीवन के तमाम बिम्ब अभिभूत करते हैं और दाने की तरह किसी गरीब की तसली में पकना चाहता है --
                                              '' और खुदबखुद
                                                एक बुढ़िया की बटुली में
                                               पकने की इच्छा से
                                              हो गया लाल ''
ऐसी इच्छा कोई बेहद संवेदनशील ही कर सकता है। इसलिए यहाँ बाघ कवि की समस्त रचनाशीलता के लक्ष्य का प्रतीक है। एक रचनाकार हमेसा जनसरोकार को अपनी रचना के केंद्र में रखता है। वह कभी दाना बनना चाहता है तो कभी अन्याय के विरुद्ध  न्याय- शक्ति। इस रूप में बाघ मूल्यों का , जनवादी और मानवीय मूल्यों का प्रतीक है जिन्हें हर हल में बचाने की बेचैनी कवि में देखी जा सकती है।  

                         बाघ को गाँव से विशेष लगाव है। वह बूढ़े बरगद , उसके नीचे सुस्ताते बटोही , विश्राम-आश्रित पक्षी को आत्मीय संवाद की स्थिति में पाता है।आज उनकी जगह संवादहीनता , व्यवहारिकता और बेगानापन घर करते गया है।  यह कवि के अंदर का मूल्यबोध है कि   जो एक समय के समाज के लिए सत्य था जो समय के ही प्रवाह में कहीं खोते चला गया उसे वह आज भी प्रासंगिक मानता है क्योंकि ऐसे मानवीय मूल्य बाजार द्वारा पूर्णतः ध्वस्त नहीं किये जा सकते , उन्हें बचाने की आकांक्षा हर कवि में होती है और वह उसके लिए तरह - तरह से संघर्षरत भी रहता है। लेकिन इसका कत्तई यह मतलब नहीं कि कवि अतीतजीवी या अतीत-मूल्यों के प्रति मोहासक्त होता है , बल्कि केवल इतना कि संवेदनशीलता बची रहे और बचे  रहें सहज और जोड़ने वाले वे तमाम मूल्य ताकि युगों तक बची रहे इंसानियत। कवि परिवर्तन का पक्षधर होता है। उसे निरंतर वर्तमान या यथास्थितिवाद से बोरियत और चिढ़ होती है। कवि केदार जी भी 'पहाड़ का मस्तक फाड़कर' नदी लाना चाहते हैं अर्थात घोर जड़ता को भी तोड़कर परिवर्तन लाने की आकांक्षा और साहस उनमें है। यहाँ दुष्यंत की ग़ज़ल की पंक्तियाँ याद आती हैं --'' हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए / इस हिमालय से अब कोई गंगा निकलनी चाहिए। ''
                                                        'बाघ' केवल परिवर्तन और इंसानपन का ही प्रतीक नहीं है , वह सौंदर्यबोध का भी प्रतीक है। संसार में वह हिंसा का प्रतीक होते हुए भी कविता में वह  हिंसा का प्रतिलोम रचता है। ऐसा नहीं कि कवि यहाँ आकर गांधीवादी हो गया है , बल्कि आतंकवाद , हिंसा आदि का प्रतिलोम रचना समय की अनिवार्य मांग है। इसलिए कवि बाघ को बच्चों का खिलौना बना देता है। उसका आशय रहा होगा कि हिंसा फैलानेवाले समाज को सुन्दर बनाने का कार्य करें -- हिंसा का मार्ग त्यागकर ! आतंक की जगह आनंद की सृष्टि करें, क्योंकि आतंक कभी जीवन-मूल्य नहीं बन सकता। यह कवि की आंतरिक इच्छा है ,मानवीय मूल्यों को स्थापित करने का उसका हाइपोथीसिस है , जिसे वह साकार होते देखना चाहता है।  जरा सोचिये हिंसा का व्यापार करनेवाले अगर आनंद का सृजन करने लगें तो समाज कितना सुन्दर होगा ! हिंसा वाचिक एवं कायिक दोनों होती है।  समाज इससे मुक्त होगा तब  धरती की खूबसूरती का  वह आलम होगा जो स्वर्ग से भी बेहतर होगा। यह है कवि का सौंदर्यबोध। यह अनायास नहीं है कि जब बाघ खरगोश के मुलायम रोओं को सहलाता है तब वह रक्त और मांस की खुशबू नहीं महसूस करता बल्कि कोमलता का आनंद महसूस करता है। आनंद ही हिंसा का प्रतिलोम हो सकता है जिसे रचने की कोशिश कवि यहाँ करता है। क्रंदन की जगह आनंद हो , यह तभी संभव है जब हिंसा का व्यापर करनेवाले आनंद का साधक बनें  --जहाँ बाघ भी बच्चों का खिलौना बन जाये। जहाँ साम्राज्यवादी शक्तियाँ बच्चों के हाथ में बंदूक थमा रही हैं वही कवि द्वारा बाघ को बच्चों का खिलौना बना देने की कल्पना समाज को हिंसामुक्त बनाने की कल्पना है , मानवीय मूल्यों की स्थापना की कल्पना है। इस रूप में बाघ सौंदर्यबोध का एक नया प्रतिमान रचता है जो आतंकवाद के जड़ ज़माने के  दौर में ही उसका प्रतिलोम बनकर उभरता है। यह कवि की फैंटसी हो सकती है , मगर इसकी आवश्यकता , प्रासंगिकता और अर्थवत्ता का अंदाज़ा तब होगा  जब  दंगों की श्रृंखला , "84' , '91',  '92 -93 '  और आज तक के तमाम हिंसा और आतंक को ध्यान में रखा जाय। अतः कवि की साधना हिंसा के विरुद्ध आनंद की स्थापना की साधना है।  बाघ यहाँ इसका भी प्रतीक है।
                                                                  कविता में 'बाघ' मनुष्य का भी रूपक है।  डॉ. नंदकिशोर नवल ने लिखा है कि '' यहाँ यह पूछा जा सकता है कि उसने (कवि ने ) सौंदर्यात्मक प्रतीक बनाने के लिए हरिण जैसे सुन्दर जानवर या किसी सुन्दर पक्षी को क्यों नहीं चुना ? इसका उत्तर यह है कि मनुष्य हरिण या किसी सुन्दर पक्षी की अपेक्षा बाघ से अधिक मिलता है -- स्वार्थी और हिंसक। ''(161 -162 ) मैं इसमें केवल इतना और जोड़ना चाहूंगा कि हिरण या अन्य सुन्दर पक्षी जहाँ पारम्परिक सौंदर्य और अभिजात्य सौंदर्य के प्रतिमान होते हैं , वहीं बाघ सौंदर्यबोध का एक एकदम नया प्रतिमान गढ़ता है। एक प्रगतिशील-जनवादी कवि का सौंदर्यबोध थोड़ा भिन्न तो होगा ही। प्रेमचंद ने प्रगतिशील- सौंदर्यबोध की जो कसौटी निर्मित की थी , उसी के अनुरूप सर्वेश्वर ने अपने काव्य का सौंदर्यबोध गढ़ते हुए लिखा था कि ''जब कोई आदमी भूख से लड़ने खड़ा हो जाता है / सुन्दर दिखने लगता है'' , और उसी सौंदर्यबोध की अगली कड़ी यहाँ 'बाघ' बनता है।

                   'बाघ' कहीं आशा का प्रतीक है तो कहीं निराशा का। इन दोनों के बीच कवि की अदम्य जिजीविषा कविता को अद्वितीयता प्रदान करती है --
                                                          '' दोस्तों, हमें जीना होगा
                                                            जीना होगा बाघ के साथ
                                                            और बाघ के बिना भी जीना होगा। ''
अतः कवि का सौंदर्यबोध उसकी जिजीविषा का भी प्रतीक है। एक बार केदार जी ने कहा था ---'' दुनिया को बदलना दुनिया को सुन्दर बनाने का ही दूसरा नाम है।  कविता इसी गहरे अर्थ में दुनिया को बदलती है। वह हर बार शब्द के 'बेहद्दी मैदान' में असुंदर से लड़ती है और लहूलुहान सुन्दर को विनाश के जबड़ों से खींचकर बाहर लाती है। '' (पर्वग्रह -अंक -73 -74 )इस प्रकार केदार जी का सौंदयबोध विद्रोह का भी प्रतीक है।  नंदकिशोर नवल ने केदार जी के सौंदर्यबोध के बारे में लिखा है कि वह विद्रोह सामाजिक परिवर्तन और क्रांति का पर्याय है। (164 ) खुद केदार जी ने एक कविता में लिखा है --- ठंढ से नहीं मरते शब्द / वे मर जाते हैं साहस की कमी से। ''

Tuesday, May 20, 2014

उपन्यास पर आलोचनात्मक पुस्तकें ( criticism on novels)

आत्मकथा और उपन्यास -- ज्ञानेन्द्र कुमार संतोष -- राजकमल
विनोद कुमार शुक्ल : खिड़की के अंदर और बहार --- योगेश तिवारी -- राजकमल
हिंदी कथा साहित्य : एक दृष्टि --- सत्यकेतु सांकृत -- राजकमल
भूमंडलीकरण और हिंदी उपन्यास --- डॉ ० पुष्पाल सिंह -- राजकमल
उपन्यासों के सरोकार -- डॉ० इ ० विजयलक्ष्मी -- राजकमल
समकालीन हिंदी उपन्यास : समय से साक्षात्कार -- डॉ० इ ० विजयलक्ष्मी -- राजकमल
अठारह उपन्यास -- राजेंद्र यादव -- राजकमल
उपन्यास का काव्यशास्त्र --- बच्चन सिंह
प्रेमचंद के आयाम --- ए० अरविंदाक्षन
कथा समय ---- विजय मोहन  ---- राजकमल
निर्मल वर्मा और उत्तर - उपनिवेशवाद  -- सुधीश पचौरी -- राजकमल
प्रेमचंद : एक विवेचन -- इंद्रनाथ मदान -- राजकमल
राजेंद्र यादव के उपन्यासों में मध्यवर्गीय जीवन -- अर्जुन चौहाण -- राजकमल
उपन्यासों के रचना-प्रसंग -- कुसुम वार्ष्णेय -- राजकमल

Wednesday, May 14, 2014

प्रसिद्द उक्तियाँ  (BEST QUOTATION) 

चाणक्य 

१. इस बात को किसी के सामने वयक्त मत होने  दीजिए कि आपने क्या करने के लिये सोचा है।  बुद्धिमानी से इसे रहस्य बनाए रखिये और इस काम को करने के लिये दृढ रहिये।

भगवान बुद्ध 

१. क्रोध को पाले रखना गरम कोयले को क़िसी और पर फेंकने की नीयत से पकड़े रहने के समान है। इसमें आप ही जलते रहते हैं।

स्वामी विवेकानंद 

१. जो तुम सोचते हो , वह हो जाओगे , यदि तुम खुद को कमजोर सोचते हो , तुम कमजोर हो जाओगे , अगर खुद को ताकतवर सोचते हो , तुम ताकतवर हो जाओगे।