Wednesday, June 29, 2011

महंगाई और भ्रष्टाचार

महंगाई और भ्रष्टाचार आज देश की गंभीरतम सम्सयाएँ हैं.खाते पीते लोगों के लिए अन्न पचाने का सर्वोत्तम मुद्दा .वास्तव में जो भूख से जूझ रहे हैं,उनके लिए दो वक्त की रोटी के लिए लड़ी जानेवाली रोज की लड़ाई मुश्किल होती जा रही है.भूख को मजाक समझनेवाली सरकार उनके लिए रात-दिन चिंतित  है.इसलिए वह कभी भी खाद्यानों का दाम नहीं बढाती.पेट्रोल,डीजल,रसोई गैस ,किरोसिन का दाम बढाती है.इन सब से भला गरीब का क्या लेना?.अमीरों पर बोझ बढेगा.जैसे पेट्रोल पम्प वाले सरकार द्वारा बढ़ाये गये दामो पर  खुद सरकार से खरीदेंगे और पब्लिक को पूर्व दाम पर ही दे देंगे.सरकार बड़ी भोली है.उसपर दोष लगाना पाप ही नहीं महापाप है.गरीबों की शुभ-चिन्तक सरकार.महंगाई के इस भीषण दौर में सरकार अपने गोदामों में अनाजों का संरक्षण करके रखी है.आखिर जो भूखों मरेंगे उनके श्राद्ध -कर्म में खानेवालो के लिए भी तो कुछ चाहिए .इस देश में भले कोई भूखे मरे ,मगर श्राद्ध में तो लोगों को खिलाना ही पड़ेगा.भई विधान है.इसे तो मानना  ही पड़ेगा.सरकार इसे जानती है.है न गरीबों की शुभ-चिन्तक? हाँ , यह दूसरी बात है कि संरक्षण के नाम पर लाखो टन अनाज सड़ जाता है,लाखो टन जमाखोरी की भेंट चढ़ जाती है.यह सब सरकार इसलिए करती है कि विपक्ष को भई कुछ तो मुद्दा हो झगड़ने के लिए.चुपचाप सरकार चलाने में  भला क्या  मज़ा  ?है न सरकार लोकतंत्र की शुभ-चिन्तक?
              सरकारी रिपोर्टो के अनुसार देश की लगभग 80 करोड़ जनता की रोज की आमदनी २० रूपये है.इसीलिए सरकार अनाजों का दाम नहीं बढाकर पेट्रोल -डीजल का दाम बढाती है.गरीब को भला पेट्रोल -डीजल पीना है?उसे इनसब से क्या कम?यह सब तो अमीरों की गाड़ी-वाडी  के काम आयेगा.रही बस भाडा की बात तो यह सरकार ने तो नहीं बढाया है?यह तो बस मालिको की सरारत है.सरकार की इसमें क्या सरारत?जिनके पास पैसे हों ,वे बस से जाएँ,वरना  टैक्सी  और प्राइवेट गाड़ियो की कमी है क्या?साले गारीब  टैक्सी  में नहीं जा सकते ? नहीं जाना है तो पैदल जाएँ. किसने मन किया है? अभी कुछ दिन पहले सरकार ने महंगाई पर बोलते हुए इसी भाषा का प्रयोग किया था-- जो महंगा अनाज नहीं खरीद सकते वे सस्ता खरीद कर खाएं ,महंगाई महंगाई न चिल्लाएं.सरकार के पास कोई जादुई छड़ी नहीं है.सरकार जी- जान से कोशिश कर रही है. सरकार बहुत सोच-समझ कर पेट्रोल-डीजल का दाम बढाई है, इससे महंगाई को कण्ट्रोल करने में काफी मदद मिलेगी. जनता से अपील है कि धैर्य रखे . ढोंगी बाबाओं और पाखंडी जनसेवकों (दिग्विजयिया का बयान ) के बहकावे में न आवे. अपने द्वारा चुन कर भेजे हुए लम्पट  ईमानदार नेताओं, जनता के सच्चे चोर सेवकों पर भरोसा  रखें.

    नमस्कार ,धन्यवाद
सरकार का माउथपिस  

Saturday, June 18, 2011

defined word (पारिभाषिक शब्दावली )

accountability  --
ad -hoc 
adjustment 
agenda 
agreement 
allotment 
allowance 
appendix 
approval             

lokpal ( लोकपाल )

सरकार द्वारा निर्मित लोकपाल सरकार के हितों के अनुरूप होगा.जनता के हितों के अनुरूप होता या सरकार के पक्ष में जनता होती तो इनसब मुद्दों पर वह अन्ना का खुलकर साथ नहीं देती.अन्ना की मांग सही ह.बेलगाम सरकार पर लगाम लगनी चाहिए.लेकिन प्रधानमंत्री को  इस दायरे से बाहर रखा जय.अगर अन्ना गलत हैं,या करप्ट हैं या जो गलतियाँ आप बता रहे हैं वह हिन्दुत्ववादी साम्प्रदायिकतावादी संगठनो की है.उनके खिलाफ मुहीम करनी चाहिए.मगर कहने से क्या होगा जरुरत है सड़क पर उनकी तरह प्रतिरोध करने की.अन्ना फ़िलहाल गलत चीजों के खिलाफ मुहीम कर रहे हैं.भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम भला गलत कैसे हो सकता है?इस मुहीम के सफल होने के बाद हिन्दुत्ववादी रवैये का प्रतिरोध होना चाहिए.मगर गलत का कोई प्रतिरोध कर रहा हो तो उसमे बौद्धिक खामी निलाल कर उसे कमजोर नहीं बनाना चाहिए.इस आन्दोलन की सफलता से देश मजबूत होगा.इसके बाद फिर किसी गलत चीज के खिलाफ मुहीम हो.अभी इसका विरोध सरकार की अजनतांत्रिक रुख का साथ देना ही है.