समर्पण
कितना खुबसूरत था वह पल
जब हमने न जाने कितने
खूबसूरत वायदे किये थे.
किये थे ढेर सारी अच्छी बातें
पर एक दिन बुरा समय भी आया,
बदले समय में तुम बदल गयी
वह अच्छा पल
इस बुरे पल पर बलि चढ़ गया
शायद उन अच्छे पलों का
अब तुम्हारे लिए कोई मायने नहीं था
बस नही बदला तो मैं
क्योंकि मेरे लिए किसी भी बुरे पल से
कीमती है
वह अच्छा पल
जिस पल में बंधकर
मैंने तुम्हारी भलाई के लिए
कर दिया था
अपना जीवन समर्पित
अगर मै भी बुरे समय के साथ हो जायूंkumar sankalp facebook .com
तो फिर क्या होगा मोल उस समर्पण का?
मेरी आरजू , मेरी मिन्नतों की गुहार थी तुम ,
मंदिर की सीढ़ियों पर पटक कर सर
मांगी गयी फरियाद थी तुम ,
मेरी आँखों से गिरे आंसुओं की
हरेक बून्द की गर्माहट में छुपा दर्द थी तुम ,
नींद में भी मेरी जुबाँ से
निकलने वाली नाम थी तुम ,
रात को बंद होती आँखों
का भरोसा थी तुम ,
सुबह खुलती हुयी आँखों
की रौशनी थी तुम ,
मेरे चलते हुए कदमों
का उत्साह थी तुम ,
मेरे लिखते हुए कलम
की शक्ति थी तुम ,
मेरे पढ़ते हुए मन
की समझ थी तुम ,
तुम समझ रही हो कि
मेरे लिए क्या थी तुम ?
आज की दुनिया में
रूप से अधिक मूल्यवान
केवल पैसा है।
ये दोनों अगर
आपके पास नहीं हैं
तो आप अपनी
अच्छाई और सच्चाई
को गर्दन में लटकाये
धोती-कुरता पहने
टैलेंट को काँख में दबाये
घूमते रहिये
लोग आपको
बेवकूफ और मुर्ख ही समझेंगे
क्योंकि आपके लिए
बाज़ारवाद ने यही तय किया है।
और एक गधे को भी
ताज पहना दीजिए
लोग माथा टेकेंगे
और उसके मुरीद होंगे।
और अगर आप रूपवान हैं तो
स्क्रिप्ट देखकर
फटाफट डाइलॉक बोलिए
और दर्शक
राइटर के नहीं
परदे पर दिखने वाली
हीरोइन के मुरीद होंगे
क्योंकि ,
भई , रूप चलता है
अगर राइटिंग चलती तो
हीरोइन को जानने से पहले
लोग राइटर को जानते ,
जो लोग भ्रम के शिकार हैं
इसे कुंठा कह सकते हैं।
जिसके कारण मैंने वह घर छोड़ दिया
उस घर के ज़र्रे -ज़र्रे से चिपकी थी
तुम्हारी याद।
सोचा ,
घर छोड़ देने से
तुम्हारी याद छुट जाएगी
मगर जहाँ गया , वहीँ
वह साये की तरह साथ आ गयी
जहाँ ठहरा
वह मुझसे पहले ही वहां
जमा लिया अपना डेरा।
जब तुम पूछती हो कि
'' कैसे हैं ?''
तो
ज़िंदा हूँ कि तुम्हारी यादें साथ हैं
या तो पहले तुम्हारी यादें जाएंगी या तो मैं
अब तुम सोच सकती हो कि
पहले कौन जायेगा !
तुम
मेरी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा ख़ाब थी तुम ,मेरी आरजू , मेरी मिन्नतों की गुहार थी तुम ,
मंदिर की सीढ़ियों पर पटक कर सर
मांगी गयी फरियाद थी तुम ,
मेरी आँखों से गिरे आंसुओं की
हरेक बून्द की गर्माहट में छुपा दर्द थी तुम ,
नींद में भी मेरी जुबाँ से
निकलने वाली नाम थी तुम ,
रात को बंद होती आँखों
का भरोसा थी तुम ,
सुबह खुलती हुयी आँखों
की रौशनी थी तुम ,
मेरे चलते हुए कदमों
का उत्साह थी तुम ,
मेरे लिखते हुए कलम
की शक्ति थी तुम ,
मेरे पढ़ते हुए मन
की समझ थी तुम ,
तुम समझ रही हो कि
मेरे लिए क्या थी तुम ?
रूप
मैं जान गया हूँ किआज की दुनिया में
रूप से अधिक मूल्यवान
केवल पैसा है।
ये दोनों अगर
आपके पास नहीं हैं
तो आप अपनी
अच्छाई और सच्चाई
को गर्दन में लटकाये
धोती-कुरता पहने
टैलेंट को काँख में दबाये
घूमते रहिये
लोग आपको
बेवकूफ और मुर्ख ही समझेंगे
क्योंकि आपके लिए
बाज़ारवाद ने यही तय किया है।
और एक गधे को भी
ताज पहना दीजिए
लोग माथा टेकेंगे
और उसके मुरीद होंगे।
और अगर आप रूपवान हैं तो
स्क्रिप्ट देखकर
फटाफट डाइलॉक बोलिए
और दर्शक
राइटर के नहीं
परदे पर दिखने वाली
हीरोइन के मुरीद होंगे
क्योंकि ,
भई , रूप चलता है
अगर राइटिंग चलती तो
हीरोइन को जानने से पहले
लोग राइटर को जानते ,
जो लोग भ्रम के शिकार हैं
इसे कुंठा कह सकते हैं।
तुम्हारी याद
वह तुम्हारी याद थीजिसके कारण मैंने वह घर छोड़ दिया
उस घर के ज़र्रे -ज़र्रे से चिपकी थी
तुम्हारी याद।
सोचा ,
घर छोड़ देने से
तुम्हारी याद छुट जाएगी
मगर जहाँ गया , वहीँ
वह साये की तरह साथ आ गयी
जहाँ ठहरा
वह मुझसे पहले ही वहां
जमा लिया अपना डेरा।
जब तुम पूछती हो कि
'' कैसे हैं ?''
तो
ज़िंदा हूँ कि तुम्हारी यादें साथ हैं
या तो पहले तुम्हारी यादें जाएंगी या तो मैं
अब तुम सोच सकती हो कि
पहले कौन जायेगा !